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समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर संविधान पीठ करेगी विचार

Updated at : 08 Jan 2018 3:34 PM (IST)
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समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर संविधान पीठ करेगी विचार

नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने दो वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से होने वाले यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने केलिए दायर याचिका आज संविधान पीठ के पास भेज दी. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहित […]

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नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने दो वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से होने वाले यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने केलिए दायर याचिका आज संविधान पीठ के पास भेज दी. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहित की धारा 377 से उठे इस मुद्दे पर वृहद पीठ द्वारा विचार करने की आवश्यकता है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 अप्राकृतिक अपराधों का हवाला देतेहुए कहती है कि जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति के विपरीत यौनाचार करता है तो इस अपराध केलिए उसे उम्र कैद की सजा होगी या एक निश्चित अवधि जो दस साल तक बढ़ाई जा सकती है और उस पर जुर्माना भी लगाया जायेगा.

पीठ धारा 377 को उस सीमा तक असंवैधानिक घोषित करने केलिए नवतेज सिंह जौहर की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें परस्पर सहमति से दो वयस्कों के यौनाचार में संलिप्त होने पर मुकदमा चलाने का प्रावधान है.

जौहर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि यह दंडनीय प्रावधान असंवैधानिक है, क्योंकि इसमें परस्पर सहमति से यौन संबंध बनाने वाले वयस्कों पर मुकदमा चलाने और सजा देने का प्रावधान है.

दातार ने कहा, आप परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने वाले दो वयस्कों को जेल में बंद नहीं कर सकते. इसके साथ ही उन्होंने अपनी दलील के समर्थन में नौ सदस्यीय संविधान पीठ की उस व्यवस्था का भी हवाला दिया जिसमें निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया गया है. उनका तर्क था कि यौनाचार केलिए अपने साथी का चयन करना मौलिक अधिकार है.

उन्होंने गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन की याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 के फैसले का भी हवाला दिया जिसमें इस प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया गया था. हालांकि बाद में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय का फैसला निरस्त करतेहुए इस प्रावधान को संवैधानिक बताया था.

शीर्ष अदालत के निर्णय पर पुनर्विचार केलिए दायर याचिका भी खारिज होने के बाद सुधारात्मक याचिका दायर की गयी थी जिसे वृहद पीठ को सौंप दिया गया था.

जौहर और अन्य की इसनयी याचिका पर भी अब संविधान पीठ ही विचार करेगी.

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