Agriculture: आम-लीची के पेड़ों को सल्फर के घोल से धोए, मक्के के पौधे में अधिक यूरिया का प्रयोग खतरनाक
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 22 Jan 2023 2:22 PM
Agriculture: पौधा संरक्षण विशेषज्ञ हेमचंद्र चौधरी ने बताया कि बेहतर फलन के लिए सल्फर का घोल बनाकर आम-लीची के पेड़ों को धोना जरूरी है. इससे पेड़ों में गरमी पैदा होंगे और मंजर निकलने में सहूलियत होगी.
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मुजफ्फरपुर. किसानों को खेती, बागवानी व पशुपालन से जुड़ी जानकारी को अपडेट कराने के लिए शनिवार को प्रभात खबर की ओर से ऑनलाइन कृषि काउंसेलिंग का आयोजन किया गया. इस मौके पर तिरहुत कृषि कॉलेज ढोली के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ धर्मेंद्र द्विवेदी, कृषि वैज्ञानिक गोविंद कुमार, कृषि विज्ञान केंद्र सरैया के पौधा संरक्षण विशेषज्ञ हेमचंद्र चौधरी, बागवानी विशेषज्ञ डॉ नीरज कुमार, पशुपालन विशेषज्ञ डॉ रंजन कुमार व किसानों में मंजीत चौधरी, इंदल शर्मा, राजा बाबू, अमरेंद्र कुमार, मधु कुमारी, पूनम देवी, राजीव कुमार, संजय कुमार, मुकेश कुमार, राजीव कुमार, अभय सिंह समेत कई लोग मौजूद थे.
पौधा संरक्षण विशेषज्ञ हेमचंद्र चौधरी ने बताया कि बेहतर फलन के लिए सल्फर का घोल बनाकर आम-लीची के पेड़ों को धोना जरूरी है. इससे पेड़ों में गरमी पैदा होंगे और मंजर निकलने में सहूलियत होगी. अभी केवल सल्फर का उपयोग करना है. इसके अलावा कुछ नहीं. किसी भी हाल में जिंक व बोरॉन का उपयोग नहीं करना है. सल्फेक्स चार ग्राम दवा प्रतिलीटर पानी में या सल्फर गोल्ड दो ग्राम दवा प्रतिलीटर पानी में घोल बनाकर पेड़ों को धो देना है. फूल खिलने पर किसी भी प्रकार का स्प्रे आम-लीची पर नहीं करना है. जब आम-लीची में दाने के आकार का फल दिखने लगे, तो कैल्शियम व बोरॉन मिश्रित दवा का स्प्रे करें.
जब फलों के फटने की समस्या समाप्त हो जायेगी और फलों के आकार बड़े व सुंदर होंगे. सात से 14 दिनों के अंतराल पर इस मिश्रण का स्प्रेकरना जरूरी है. आम लीची के पेड़ों पर मिलीबग का प्रकोप हो, तो एप्सा-80 या एग्री-80 नाम की दवा का स्प्रेकरना होगा. जिंक की कमी हो , तो जिनेब व मैगनीज की कमी हो , तो मैंकोजेब नाम की दवा का स्प्रेकर सकते हैं. यदि इस बीच वर्षा हो जाये , तो आम व लीची पर कॉपर मिश्रित फंगीसाइड या ब्लाइटॉक्स नाम की दवा तीन से चार ग्राम प्रतिलीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना है. मधुआ रोग लगने पर इमामेक्टिन बेंजोएट दवा का उपयोग होगा.
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मक्के की फसल में कीड़ा लगने की शिकायत पर डॉ धर्मेंद्र द्विवेदी ने बताया कि मक्के के पौधों में अधिक यूरिया का प्रयोग काफी खतरनाक होता है. गेहूं या मक्के में ज्यादा हरियाली पौधों को कमजोर करती है. पौधे को पूरे लाइफ में चार किलोग्राम यूरिया प्रति कट्ठेकी दर से उपयोग करनी है. ज्यादा हरा होने पर पत्तियां कोमल हो जाती है और कीड़े आकर्षित होते हैं. उन्होंने गेहूं में जरूरत के अनुसार सिंचाई करने की सलाह दी. कहा कि अगर गेहूं की फसल कमजोर हो, तो सिंचाई के बाद पोटाश व यूरिया का छिड़काव कर सकते हैं. पौधे अगर पीले हैं, तो अमोनियम सल्फेट का उपरिवेशन भी कर सकते हैं. इसमें 20 प्रतिशत नाइट्रोजन व 12 प्रतिशत सल्फर होते हैं.
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