‘अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो... भजन पर झूमे श्रद्धालु

Edited by JIYARAM MURMU
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मंझलाडीह में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन प्रतिनिधि, बिंदापाथर. मंझलाडीह गांव में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन नर-नारायण सेवा के साथ हुआ. अंतिम दिन कथावाचक श्रीहित

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मंझलाडीह में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन प्रतिनिधि, बिंदापाथर. मंझलाडीह गांव में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन नर-नारायण सेवा के साथ हुआ. अंतिम दिन कथावाचक श्रीहित कुलदीप कृष्ण जी महाराज ने द्वारका लीला, यदुवंश संहार, शुकदेव विदाई, राजा परीक्षित की मुक्ति तथा सुदामा चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया. उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत पुराण हिन्दू धर्म के अठारह प्रमुख पुराणों में से एक है, जिसका मुख्य विषय भक्ति योग है. इसमें भगवान श्रीकृष्ण को परम ब्रह्म के रूप में स्थापित करते हुए प्रेम और भक्ति के रस का सुंदर निरूपण किया गया है. परंपरागत रूप से इसके रचयिता महर्षि वेदव्यास माने जाते हैं. कथा के दौरान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का प्रसंग श्रोताओं को भावविभोर कर गया. बताया कि सुदामा अत्यंत गरीब ब्राह्मण थे, जो कठिन परिस्थितियों में जीवन-यापन कर रहे थे. पत्नी के आग्रह पर वे अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे. उपहार स्वरूप वे केवल चार मुट्ठी चावल ही ले जा सके. श्रीकृष्ण ने अपने मित्र का अत्यंत स्नेहपूर्वक स्वागत किया और उनके द्वारा लाए गए साधारण चावल को प्रेमपूर्वक स्वीकार किया. सुदामा बिना कुछ मांगे लौट आए, लेकिन श्रीकृष्ण ने उनकी निर्धनता दूर कर उन्हें समृद्ध जीवन प्रदान किया. यह प्रसंग सच्ची मित्रता, प्रेम और निस्वार्थ भाव का अनुपम उदाहरण है. कथा के साथ भजन-कीर्तन का भी आयोजन हुआ. ‘अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो…’ जैसे भजनों पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे.

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