‘औरत जात के शरीर से खून जाता है, सो मेरे शरीर से भी जाता है. ई काहे होता है. ऊ हम नहीं जानते’

Updated at : 29 Apr 2017 4:31 PM (IST)
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‘औरत जात के शरीर से खून जाता है, सो मेरे शरीर से भी जाता है. ई काहे होता है. ऊ हम नहीं जानते’

एक आम स्वस्थ महिला के जीवन में माहवारी की शुरुआत 12वर्ष की आयु में हो जाती है, लेकिन वह महिला जब 35 वर्ष की हो जाये और तब भी यह कहे कि उसे नहीं पता कि माहवारी क्यों होती है, तो यह चौंकाने वाली स्थिति है. लेकिन यह एक ऐसी सच्चाई है जिससे मुंह नहीं […]

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एक आम स्वस्थ महिला के जीवन में माहवारी की शुरुआत 12वर्ष की आयु में हो जाती है, लेकिन वह महिला जब 35 वर्ष की हो जाये और तब भी यह कहे कि उसे नहीं पता कि माहवारी क्यों होती है, तो यह चौंकाने वाली स्थिति है. लेकिन यह एक ऐसी सच्चाई है जिससे मुंह नहीं फेरा जा सकता है. झारखंड के चाईबासा जिले के बंदगांव प्रखंड की रहने वाली सुशीला ने बातचीत में कहा कि ‘ औरत जात के शरीर से खून जाता है, सो मेरे शरीर से भी जाता है. ई काहे होता है. ऊ हम नहीं जानते. ’

माहवारी को लेकर इस पंचायत में किस कदर ज्ञान का अभाव है, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सौ महिलाओं में से एक ने भी इस बात का जवाब नहीं दिया कि आखिर माहवारी है क्या और यह क्यों होती है.

लड़कियों को नहीं दी जाती माहवारी के बारे में जानकारी

भारतीय समाज में आज भी किशोरियों को माहवारी के संबंध में जानकारी नहीं दी जाती है. जो भी वे जानती समझती हैं, वो अधूरी जानकारी है. जब उन्हें पहली बार माहवारी होती है, तो घर में यही बता दिया जाता है कि हर लड़की को होता है, इसलिए तुम्हें भी हो रहा है. इसके वैज्ञानिक कारणों की जानकारी नहीं दी जाती है. बंदगांव प्रखंड के कई गांवों मेरोमगुटू, कटवा, कोंडाकेल, ईटी और सिटीबुरू की महिलाएं, यहां तक वृद्ध महिलाएं भी इससे अनभिज्ञ हैं. यहां तक की शहरों में भी लड़कियों को इसके बारे में घरों में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी जाती है.

जानकारी का अभाव बना परेशानी का सबब

माहवारी के बारे में सही जानकारी का ना होना लड़कियों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है. अगर उन्हें सही और वैज्ञानिक जानकारी होगी, तो किशोरियां माहवारी के दौरान सावधानी बरतेंगी और संक्रमण तथा अवसाद जैसी परेशानियों से बचकर रहेंगी.

जागरूकता का हो रहा है प्रयास

माहवारी के प्रति महिलाओं और किशोरियों को जागरूक करने के लिए सरकारी और कई स्वयंसेवी संस्थाएं सामने आयीं हैं. यूनिसेफ की ओर से भी कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. किशोरियों को जागरूक किया जा रहा है, लेकिन अभी इन प्रयासों को पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है. आंगनबाड़ी केंद्रों में भी जानकारी दी जा रहा है लेकिन इन कार्यक्रमों को विस्तार देने की जरूरत है.

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