गुलामी की भाषा हेगड़े को मंजूर नहीं

Updated at : 01 Jul 2016 10:20 AM (IST)
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गुलामी की भाषा हेगड़े को मंजूर नहीं

-हरिवंश- जिस भाषा-विवाद को केंद्र सरकार 38 वर्षों से उलझाये हुए है, कर्णाटक सरकार ने उसे एक झटके में ही हल कर डाला. हाल ही में विभिन्न कॉलेजों के प्रधानाध्यापकों के नाम भेजे गये अपने परिपत्र में कर्णाटक सरकार ने चेतावनी दी है कि जो कॉलेज अपने कार्यालय से तत्काल अंगरेजी टंकण मशीन नहीं हटायेंगे, […]

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-हरिवंश-

जिस भाषा-विवाद को केंद्र सरकार 38 वर्षों से उलझाये हुए है, कर्णाटक सरकार ने उसे एक झटके में ही हल कर डाला. हाल ही में विभिन्न कॉलेजों के प्रधानाध्यापकों के नाम भेजे गये अपने परिपत्र में कर्णाटक सरकार ने चेतावनी दी है कि जो कॉलेज अपने कार्यालय से तत्काल अंगरेजी टंकण मशीन नहीं हटायेंगे, उन्हें दंडित किया जायेगा. अंगरेजी टंकण की जगह कन्नड टंकण मशीन खरीदना अनिवार्य है. अंगरेजी टंकण मशीन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. कॉलेजों में पढ़ाई का माध्यम कन्नड तय किया गया है. कर्णाटक सरकार ने सख्ती से कन्नड भाषा लागू करने का आदेश दिया है.

कर्णाटक सरकार के इस आदेश को मुल्क के विशिष्ट तबके के अंगरेजीदां लोग देश तोड़ने की दिशा में एक कदम मानते हैं. यह तर्क इस मान्यता पर आधारित है कि देश की एकता अंगरेजी की देन है, अंगरेजी जाननेवाला वर्ग ही राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार है. उधार के दर्शन पर जीनेवाले इस वर्ग की दलील है कि अंगरेजी आधुनिकता का पर्याय है. दुनिया में दर्शन, राजनीति और सभ्यता की प्रगति के पीछे भी अंगरेजी है. इन लोगों की दृष्टि में कांट हेगल, मार्क्स, माओ, लेनिन अंगरेजी सभ्यता की देन है.

मनोवैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि गुलामी की भाषा आदमी के मन, संकल्प और मौलिकता को नष्ट कर देती है और उसमें हीनता घर कर जाती है. इसके बाद वह चलती-फिरती मशीन मात्र रह जाता है. दूसरों के इशारे पर नाचनेवाला यंत्र. गुलाम बनानेवाली ताकतों का यही एकमात्र लक्ष्य था. अंगरेजी इस देश में शोषण का औजार रही है और शोषकों की भाषा है. इस देश के शासक-हुक्मरानों को एक करने का श्रेय अंगरेजी को अवश्य है, लेकिन इस देश की जनता को इस भाषा ने नहीं जोड़ा है. इसके हटने से टूट का सवाल कहां आता है? हमारे संविधान निर्माताओं की कल्पना थी कि सभी राज्यों में शासन संबद्ध क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से ही होगा. इससे दबे लोग शासन से एकाकार होंगे. वस्तुत: भारत में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में आपस में कोई स्पर्द्धा नहीं है. इन सबकी दुश्मन अंगरेजी है.

अब तक मानव इतिहास में शासकों और शासितों की भाषा एक नहीं रही. लोकतंत्र के मूल में पूरे अवाम की सहमति और साझेदारी है. इस कारण हेगड़े ने खुलेआम कहा है कि जनतंत्र की कल्पना को साकार करना है और इस देश की सत्ता से नीचे के आदमी को जोड़ना है, तो उसका एक ही माध्यम है कि शासन जनभाषा में हो. जनभाषा परिवर्तन की वाहक होती है और सृजन की फिजां बनाने का सबसे कारगर औजार. उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में सांस्कृतिक चेतना (पुनर्जागरण आंदोलन) जगाने का आंदोलन राजा राममोहन राय के नेतृत्व में हुआ. उस आंदोलन के सूत्रधारों ने जनभाषा की खूबियों को पहचाना और उसी के बल पर बुराइयों से लड़ने का संकल्प किया. गांधी के पूर्व कांग्रेस महज ‘पेटीशन, प्रेयर और रिजोल्यूशन’ पास करनेवाली संस्था थी. हिंदुस्तानी और क्षेत्रीय भाषाओं के बल पर ही कांग्रेस का दायरा बढ़ा और अंगरेजों के खिलाफ सशक्त आंदोलन हुआ.

अतीत में भी विशिष्ट वर्ग के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए जनभाषाओं को अपनाया गया. संस्कृत व्यवस्था की भाषा थी. पाली और प्राकृत जनभाषाएं थीं. ब्राह्मणवाद के खिलाफ बौद्ध और जैन सफलतापूर्वक उठ खड़े हुए, क्योंकि इन दोनों मतों के अनुयायियों ने जनभाषाओं को अपने आंदोलन का माध्यम बनाया.

स्वतंत्रता के बाद भी अंगरेजी और अंगरेजियत से लड़ने का माहौल इस देश में था. मधु लिमये जैसे प्रखर वक्ता संसद में हिंदी में ही अपनी बातें कहते थे. न्यायालय में बहस भी करते थे. मधु लिमये सरीखे अनेक समाजवादियों के लड़के-लड़कियां हिंदी माध्यम से ही पढ़े. अब हिंदी के क्षेत्र में नुमाइंदे अंगरेजी बोलते-बतियाते हैं और इसे गौरव मानते हैं. गुलामी की संस्कृति, अंगरेजी और अंगरेजियत के कारण आज जितनी मजबूत है, उतनी पहले कभी नहीं थी. अगर इस देश में सत्ता-सुविधाएं और अवसर दो फीसदी अंगरेजी जाननेवाले लोगों के हाथ से निकाल कर 98 फीसदी बहुमत के हाथ सौंपना है और देश को आर्थिक विकास के रास्ते पर ले जाना है, तो कर्णाटक द्वारा दिखाये गये रास्ते पर ही चलना होगा.

अपनी मिट्टी से लोगों को जोड़ने की दिशा में कर्णाटक सरकार ने यह साहसिक निर्णय लिया है. बहुत पहले विश्वविख्यात अर्थशास्त्री गुन्नार मर्डिल ने कहा था कि जब तक भारतीय संसद के वाद-विवाद अंगरेजी में चलते रहेंगे, तब तक देश की राजनीति से जनता का कोई सरोकार नहीं होगा.

राजभाषा के नाम पर हिंदी के साथ जो भद्दा मजाक सरकार कर रही है, उससे एक अपसंस्कृति फैल रही है. हाल ही में बैंक ऑफ इंडिया (परिपत्र संख्या 80/111 प्रधान कार्यालय, कार्मिक विभाग द्वारा जारी) ने अपने एक परिपत्र में भाईयों (भाइयों) महीला (महिला), पती (पति) शब्दों का इस्तेमाल किया है. एक महत्वपूर्ण परिपत्र में इतनी गंभीर गलतियां हों, तो इससे क्या जाहिर होता है? अच्छी तनख्वाह और सुविधाओं के बाद भी भाषा को शुद्ध और सही न लिखा जाये, अनुवाद में बेशुमार गलतियां हों, अनुवाद का अर्थ स्पष्ट न हो और राजभाषा के नाम पर करोड़ों रुपये का व्यय हो, इससे कौन-से उद्देश्य पूरे होते हैं? वस्तुत: सरकारी कार्यालयों-बैंकों में हिंदी के नाम पर लूट और स्वार्थ की राजनीति चल रही है. शहरों में टिके रहना है, तो अपने कार्यालय में हिंदी का काम संभाल लीजिए, वहां तबादले के मौके कम हैं, हिंदी के नाम पर जो गलतियां आप करते हैं, उनके लिए दंडित करनेवाला कोई नहीं है, यही कारण है कि हिंदी में जारी होनेवाले सरकारी परिपत्र या बैंकों के परिपत्र अस्पष्टता-अशुद्धियों के पर्याय बन गये हैं.

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