एकता की धारा जो कभी सूखी नहीं

Updated at : 30 Jun 2016 10:10 AM (IST)
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एकता की धारा जो कभी सूखी नहीं

-हरिवंश- आखिर क्या कारण हैं कि कुछ यूरोप व लैटिन अमेरिका और कुछ एशियाई देशों की अखंडता आंतरिक राजनीतिक आंदोलनों की आंच से खंडित हुई. इन देश तोड़क आंदोलनों में हमेशा अवाम की व्यापक साझेदारी रही हो, ऐसा भी नहीं है. इन महाद्वीपों में कुछ मुल्क ऐसे भी हैं, जो ऐसे आंदोलनों से बंटे तो […]

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-हरिवंश-

आखिर क्या कारण हैं कि कुछ यूरोप व लैटिन अमेरिका और कुछ एशियाई देशों की अखंडता आंतरिक राजनीतिक आंदोलनों की आंच से खंडित हुई. इन देश तोड़क आंदोलनों में हमेशा अवाम की व्यापक साझेदारी रही हो, ऐसा भी नहीं है. इन महाद्वीपों में कुछ मुल्क ऐसे भी हैं, जो ऐसे आंदोलनों से बंटे तो नहीं, लेकिन वहां जनतंत्र के स्वप्न का अधिनायकवाद ने गला घोंट दिया. साम्राज्यवाद के खिलाफ जूझने के बाद एशिया-अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक ऐसे देश आजाद हुए, जिनके लिए ‘राजनीतिक एकता’ नयी चीज थी.

भाषा और कबीलों के आधार पर बंटे हुए कुछ मुल्कों को साम्राज्यवादियों ने अपनी ‘राजनीतिक संस्थाओं’ और ‘समान न्यायप्रणाली’ के आधार पर एक किया. मार्क्सवादियों की यह दलील कि ‘पिछड़े और बिखरे’ देशों को साम्राज्यवादी ताकतों ने एक सूत्र में बांधा, आधुनिक बना कर उनकी अलग पहचान बनायी, ऐसे देशों के लिए किसी सीमा तक सही आकलन है. हालांकि ऐसे ही मुल्कों में या तो सर्व सत्तावादी व्यवस्था उभरी, या कुछ के टुकड़े हो गये, क्योंकि इन देशों में एकता ऊपर से थोपी गयी चीज थी. साम्राज्यवादियों की देन ‘न्यायप्रणाली’ या ‘राजनीतिक संस्थाएं’ इन मुल्कों को बांध कर नहीं रख सकीं.

लेकिन भारत की एकता साम्राज्यवादियों की देन नहीं है. मार्क्स समेत उनके बाद के अनुयायियों ने जोड़ा, तथ्यपरक नहीं है. इतिहास गवाह है कि विभिन्न टुकड़ों में बंटे होने के बाद भी इस देश की आत्मा एक रही. इसे एक करने में विभिन्न धर्मों-संस्कृतियों, समाज सुधारकों और सूफी-संतों की उल्लेखनीय भूमिका रही है. 11वीं शताब्दी से ही हमारे यहां धर्मनिरपेक्ष और समन्वयवादी ताकतें समाज को एक रखने और ‘आदर्श’ को साकार करने का प्रयास करती रही हैं. हालांकि विभिन्न समुदायों की कट्टर ताकतें हर संभव तरीके से ऐसे प्रयास को कुचलने का भी प्रयास करती रहीं, लेकिन यह क्षीण धारा कभी सूखी नहीं. आधुनिक युग में गांधी ने इस धारा को सशक्त बनाया. इस देश की एकता का मूल इसी धारा में है.
फिलहाल इस देश में जो अराजक शक्तियां सक्रिय हैं, वे इस तथ्य को अच्छी तरह जानती-समझती हैं. इस कारण इनका हमला राजनीतिक मुद्दों पर कम, धर्म, संस्कृति और इस देश को एक करनेवाली ताकतों पर ज्यादा है. पिछले दिनों बंबई में एक मराठी अखबार ने महाराष्ट्र में कार्यरत गैर मराठी केंद्रीय अधिकारियों की एक सूची प्रकाशित की और पाठकों से पूछा कि ये लोग यहां पदस्थापित क्यों हैं? महाराष्ट्र में ही एक दक्षिण भारतीय मंत्री हैं, उनके बारे में भी इस समाचार पत्र में सवाल उछाला गया कि इस राज्य में यह सज्जन मंत्री क्यों हैं? स्पष्ट है उक्त अखबार की मानसिकता के अनुसार महाराष्ट्र, मराठियों के लिए है. गैर मराठी लोगों की जगह वहां नहीं है.

पंजाब से हिंदू भाग रहे हैं, मुसलमानों में असुरक्षा है, विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीयता की भावना सुनियोजित ढंग से उभारी जा रही है. महानगरों में बिहारियों-बंगालियों आदि की अलग-अलग शाखाएं बनी हैं. अगर कोई केंद्रीय बिहारी मंत्री किसी महानगर में जाता है, तो उसकी आवभगत-स्वागत-समारोह का काम बिहारी समुदाय द्वारा ही आयोजित होता है. अब कोई केंद्रीय नेता नहीं, जिसे सुनने सभी राज्यों-समुदायों के लोग उमड़ पड़ते हों. यह स्थिति हमारे वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व की देन है. इसका दोष महज शासक दल भी इसके लिए समान रूप से दोषी हैं. विभिन्न समुदायों के सह-अस्तित्व के मूल पर आज जो सुनियोजित हमला हो रहा है, उसके परिणाम घातक होंगे. लगता है शासक और विरोधी इससे वाकिफ नहीं हैं.


नयी पीढ़ी को हमने इस देश की एकता के मूल से परिचित नहीं कराया है. यह प्रचारित होना चाहिए कि बारहवीं शताब्दी से ले कर आज तक मुसलमानों ने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार और भूमिका में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. आठवीं शताब्दी में श्रीभद्भागवद गीता का अरबी में अनुवाद किया गया था. मुहम्मद गजनवी संस्कृत भाषा से काफी प्रभावित था. अपने सिक्कों पर उसने संस्कृत भाषा में चीजें लिखवायीं. कश्मीर के शासक शहाबुद्दीन के संरक्षण में रहे संस्कृत कवि अमृतदत्त ने तत्कालीन शासकीय पद्धति संस्कृत भाषा में लिखी. संस्कृत व फारसी के विद्वान मौलाना इमानुद्दीन ने ‘राजतरंगिणी’ का फारसी में अनुवाद किया. बंगाल के नसीरशाह ने पहली बार महाभारत एवं रामायण का बंगला भाषा में अनुवाद कराया. इस विषय पर उज्जैन के डॉ गुलाम खान ने महत्वपूर्ण शोध कार्य किया है.

अकबर ने भी एक सिक्का चलाया. उस सिक्के पर राम-सीता की छवि और ‘राम-सीय’ शब्द हैं. मुहम्मद बिन समिद ने अपने सिक्कों पर लक्ष्मी का चित्र भी अंकित कराया था. भारत में इसलामी राज्य के आगमन के इकसठ वर्षों बाद भारत में वह मुसलमान पैदा हुआ, जिसने प्रचलित जनभाषा में रचना करके हिंदी और उर्दू के भविष्य की राह खोल दी. वस्तुत: अमीर खुसरो ही खड़ी बोली हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं के जनक हैं.

राजा कुंभा के प्रसिद्ध कीर्ति स्तंभ में हिंदुओं के सभी देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं. बाबर और राणा सांगा की लड़ाई में सुलतान महमूद लोदी और मेवात के हसन खां राणा के साथ थे. इतिहास में ऐसे अनंत प्रसंग हैं, जो इस मुल्क की आपसी सौहार्दता-धर्मनिरपेक्षता और कौमी एकता के अकाट्य प्रमाण हैं. हमें इन तथ्यों को बार-बार प्रचारित करने की जरूरत है. यह काम स्वयंसेवी संस्थाओं से ही विश्वसनीय ढंग से हो सकता है. इस मुल्क में जो देश तोड़क शक्तियां सक्रिय हैं. उन्हें परास्त करने का यही एकमात्र रास्ता और विकल्प है.

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