बिहार: धनबाद में नया माफिया जन्म ले रहा है

-हरिवंश- बिहार का ‘बंबई’ धनबाद है. देश के राजनीतिज्ञों को बंबई से पैसा मिलता है, तो बिहार के राजनेताओं की आमदनी का मुख्य स्रोत कोयलांचल है. यहां तरह-तरह के गैरकानूनी धंधे चल रहे हैं. सार्वजनिक क्षेत्रों की खुली लूट हो रही है. लेकिन सरकार कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है. कारण, सरकार के […]
-हरिवंश-
इसमें वीट्रेन होता है, जो कोयले का सर्वश्रेष्ठ अंश माना जाता है. निम्नस्तर का कोयला यानी पथरीला भाग बैठ जाता है. ऊपरवाले हिस्से को फिर सेटलिंग टैंक में भेजा जाता है. वहां इसे 3-4 दिन तक छोड़ दिया जाता है. फिर वाल्व खोल कर पानी बहा दिया जाता है. नियमानुसार कोयले के स्थिर हो जाने के बाद ही बाल्ब खोलना चाहिए. लेकिन जिन्हें सलरी का ठेका मिला है. वे अंदर वाशरी के भ्रष्ट अधिकारियों को मिला कर पहले ही ‘बाल्ब’ खुलवा लेते है. इससे उच्च स्तर का अधिकांश कोयला बह कर बाहर निकल जाता है. बाहर आसपास की भूमि में यह फैल जाता है.
बाहर तैनात ठेकेदार के लोग इसे इकट्ठा कराते है. फिर गुल बनवाते हैं. इसके उत्पादन पर प्रतिटन खर्च 180 रुपये के आसपास पड़ता है. लेकिन बाजार में इसका मूल्य हैं 950 रुपये प्रतिटन. इस कोयले में राख मुश्किल से 8 फीसदी होती है. अत: उपयोग की दृष्टि से यह बहुत ही बढ़िया कोयला है. बीसीसीएल के एक इंजीनियर ने बांध बनाने का सुझाव दिया था. ताकि सलरी बाहर न बहे व इसका लाभ बीसीसीएल को ही मिले. बाद में निहित स्वार्थवाले लोगों ने उसका स्थानांतरण ही करा दिया.
इन दोनों करारों से अग्रहवाल को पाथरडीह, दुग्धा, कठारी व कारगली वाशरी प्लांट से सलरी इकट्ठा करने का अधिकार मिल गया. आरंभिक दो खदानों का प्रबंध बीसीसीएल द्वारा होता है. तथा कारगली व कठारी की देखरेख सीसीएल करता है. अग्रवाल ने इन खदानों के आसपास की जमीनों के असली हकदारों को परेशान किया. इस कार्य में उन्होंने अपने लठैतों व पहलवानों की मदद ली. दुग्धा पंचायत के मुखिया ने कुछ वर्षेां पूर्व अग्रवाल के खिलाफ एक फौजदारी मुकदमा भी दायर किया था. सलरी जब बाहर बहता है, तो काफी दूर तक फैल जाता है. आसपास के खेतों में भी पहुंच जाता है. ठेकेदार इसे इकट्ठा कराते हैं. अत: खेत में बुवाई बगैरह का काम नहीं हो पाता, न ही खेत मालिकों को बदले में कुछ मिलता है. खेत मालिक इसका विरोध करते हैं, तो उन्हें डराया-धमकाया जाता है.
कुछ बड़े पुलिस अधिकारियों के भाई-भतीजे सलरी निकालने के इस धंधे में लगे भी हैं. जो सलरी राज्य सरकार ने 40 पैसे प्रतिटन के ठेके पर दिया था. बाद में कीमत बढ़ा कर उसे 40 पैसे से 2.50 रुपये किया गया. फिर खदान आयुक्त की रिपोर्ट पर इसे 2.50 रुपये से बढ़ा कर 62 रुपये किया गया. थोड़े परिश्रम के बाद यही बाजार में 950 रुपये प्रतिटन के भाव से बिक रहा है.
इसके बाद भी तत्कालीन ‘ईमानदार’ मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह के समय पुन: यह ठेका परमेश्वर अग्रवाल को किन्हीं खास कारणों से मिला. 30 जून 1984 को बिहार सरकार के सहायक निदेशक, खदान (निगरानी एवं भ्रष्टाचार निरोध विभाग) ने दुग्धा कोयला वाशरी का निरीक्षण किया. जांच के दौरान उन्होंने पाया कि बोकारो स्टील प्लांट के सेक्टर नंबर एक के पास मेसर्स वेस्ट प्रोडक्ट रिक्लेमर (जी) लिमिटेड के तीन डिपो हैं. जहां ब्रिकिट (पिसे हुए कोयले को ईंट) की कीमत 241 रुपये प्रतिटन लिखी थी. वहां खड़े एक ट्रक संख्या यूएचएच 492 से तहकीकात करने पर निदेशक महोदय को पता चला कि वास्तविक कीमत 550 रुपये से अधिक है.
यहां से औसतन 20 ट्रक कोयला लेकर रोज रवाना होते हैं. स्टॉक रजिस्टर में कंपनी ने काफी कम मात्रा में सप्लाई दिखायी थी. कोई रिकॉर्ड ढंग से रखा नहीं मिला, ताकि अधिकारी जांच निरीक्षण कर सके. वाशरी प्लांट से बाहर आये सलरी में जब पानी कम हो जाता है, तो गुल तैयार किया जाता है. इसका उपयोग जलाने के लिए होता है, जिसे परमेश्वर अग्रवाल ने ‘ब्रिकिट’ नाम दिया है. यह नाम भ्रम उत्पन्न करता है. निदेशक महोदय की दृष्टि में यह कोयला घरेलू कोयले (गुल) से भिन्न नहीं है, अत: ‘ब्रिकिट’ नाम पर यह धंधा गलत है.
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