#WorldTourismDay: कुछ दिन तो गुजारिए झारखंड-बिहार में, इन पर्यटन स्थलों को देख हो जाएंगे बाग-बाग

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 27 Sep 2019 11:20 AM

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भारत की प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों को समेटनेवाले दो राज्य बिहार और झारखंड की छवि ज्यादातर लोगों के लिए नकारात्मक है. कारण इन दोनों की राज्यों में विकास की गति काफी मंथर है, लेकिन पर्यटन के दृष्टिकोण से इन दोनों ही राज्यों में कई सारी ऐसी जगहें हैं, जिनके बारे में अब तक आपने […]

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भारत की प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों को समेटनेवाले दो राज्य बिहार और झारखंड की छवि ज्यादातर लोगों के लिए नकारात्मक है. कारण इन दोनों की राज्यों में विकास की गति काफी मंथर है, लेकिन पर्यटन के दृष्टिकोण से इन दोनों ही राज्यों में कई सारी ऐसी जगहें हैं, जिनके बारे में अब तक आपने शायद ही जाना और सुना होगा. तो चलिए आज हम आपको लिए चलते हैं इन्हीं खूबसूरत और बेजोड़ पर्यटन स्थलों की सैर पर….

दुमका का मलूटी मंदिर

झारखंड की उप-राजधानी दुमका से करीब 60-70 कि‍लोमीटर दूर दुमका-रामपुर सड़क पर शि‍कारीपाड़ा के निकट स्थित है मलूटी गांव. इस गांव को ‘मंदिरों का गांव’ कहा जाता है. एक अनुमान के मुताबिक यहां एक ही जगह पर दुनिया के सबसे ज्यादा संख्या में मंदिर निर्मित हैं. यहां सड़क के दोनों ओर टेराकोटा से निर्मित मंदि‍र प्राचीन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना पेश करते हैं. इन मंदिरों में पूर्वोतर भारत में प्रचलि‍त लगभग सभी स्थापत्य शैलि‍यों के नमूने देखने को मिलते हैं, जिनकी ऊंचाई 15 फुट लेकर 60 फुट तक है. स्थानीय लोगों के अनुसार, शुरू में यहां कुल मि‍ला कर 108 मंदि‍र थे, जो अब घट कर 65 रह गये हैं. इनका निर्माण संभवत: वर्ष 1720 से 1845 के बीच करवाया गया था. अधिकतर मंदिरों में शिवलिंग स्थापित हैं और उनके सामने के भाग के ऊपरी हिस्से में संस्कृत या प्राकृत भाषा में प्रतिष्ठाता का नाम तथा स्थापना तिथि अंकित हैं. हर जगह करीब 20-20 मंदिरों का समूह है. हर समूह के मंदिरों की अपनी ही शैली और सजावट है, जैसे- शि‍खर मंदि‍र, समतल छतदार मंदि‍र, रेखा मंदि‍र यानी उड़ीसा शैली और रास मंच या मंच शैली के मंदि‍र आदि.

रामगढ़ का कैथा मंदिर

झारखंड के रामगढ़ जिले से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्राचीन कैथा शिव मंदिर को राष्ट्रीय धरोहर स्मारक घोषित कर दिया गया है. पुरातत्वविदों के अनुसार, वर्ष 1670 में जब रामगढ़ की राजधानी पदमा से रामगढ़ स्थानांतरित हुई, तब रामगढ़ के तत्कालीन महाराजा ने इस मंदिर का निर्माण कराया था. उस वक्त सैन्य कार्यों हेतु भी इसका उपयोग किया जाता था. करीब 347 वर्ष पुराना कैथा शिव मंदिर रामगढ़-बोकारो मार्ग पर एनएच-23 के कैथा गांव की सड़क के किनारे स्थित है. इस किलानुमा मंदिर की भव्य इमारत बंगाल, राजपूत और मुगल तीनों की मिश्रित कला पर आधारित है. इस दोमंजिला मंदिर में इसका बेलनाकार गुंबद, सुरक्षा प्रहरियों के लिए बना स्थान, सीढ़ियां, निचले तल की खास बनावट और लखीरी ईंटों का प्रयोग सहित अन्य कई चीजें खास हैं. मंदिर में मुख्य शिवलिंग की ऊंचाई 12 फीट है.

रोहतास का तुतला भवानी मंदिर

रोहतास जिला मुख्यालय से 38 किमी दूर तिलौथू प्रखंड में कैमूर की मनोरम पहाडियों में स्थित तुतला भवानी मंदिर स्थित है. फ्रांसिसी इतिहासकार बुकानन जब 14 सितंबर, 1812 ई के रोहतास यात्रा के दौरान इस मंदिर की खोज की थी. मंदिर के सटे पहाड़ी में कछुअर नदी बहती है. महिषासुर मंर्दिनी तुतला भवानी की प्रतिमा तुतराही जल प्रपात के मध्य में स्थापित है. मंदिर के आसपास की प्राकृतिक छटा मनोरम एवं अद्भुत है. प्रत्येक वर्ष यहां श्रावण माह में एक महीने का तथा नवरात्र में नौ दिनों का मेला आयोजित होता है.

सासाराम का मांझर कुंड

रोहतास (सासाराम) जिले के दक्षिण में कैमूर पहाड़ी पर स्थित मांझर कुंड मनोरम सुंदरता के लिए जाना जाता है. कैमूर पर्वत श्रृंखला में तीन किमी की परिधि में अवस्थित यह कुंड राज्य के रमणीक पर्यटन स्थलों में से हैं. इस पर्वत पर काव नदी का पानी ऊंचे पर्वत से एक धारा बना कर टेढ़े-मेढे रास्तों से गुजरते हुए मांझर कुंड के जलप्रपात में इकट्ठा होता है.

रामगढ़ का टूटी झरना मंदिर

झारखंड के रामगढ जिले में स्थित प्राचीन टूटी झरना मंदिर रामगढ़ शहर से करीब 10 किमी दूर कुजू की तरफ एनएच-33 के निकट स्थित है. वर्ष 1925 में बरकाकाना-गोमो के बीच रेललाइन बिछाने के क्रम में अंग्रेजों को रास्ते में सदियों पुराने इस मंदिर का गुंबद दिखायी दिया, जिसकी खुदाई करने पर यह मंदिर मिला. मंदिर में एक शिवलिंग स्थापित है, जिसके ऊपर सफेद रंग की एक प्रतिमा है. प्रतिमा की नाभि से स्वत: रूप से जल निकलता रहता है, जो उनके दोनों हाथों की हथेली से गुजरते हुए शिवलिंग पर गिरता है. ग्रामीणों का मानना है कि यह मां गंगा की प्रतिमा है. मंदिर के बाहर लगे दो हैंडपंप से भी हमेशा रहस्यमयी तरीके से स्वत: पानी गिरता रहता है, जबकि इसके समीप स्थित नदी सूखी हुई रहती है.

जमुई का भीमबांध

बिहार के जमुई जिले के लक्ष्मीपुर तथा मुंगेर के खड़गपुर सीमाओं के बीच स्थित भीमबांध जमुई व मुंगेर के अलावा लखीसराय, शेखपुरा, भागलपुर, नवादा व बांका के लोगों के लिए पर्यटन केंद्र है. 682 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह बांध खड़गपुर पहाड़ियों के बीच चारों ओर से उष्णकटिबंधीय घने जंगल से घिरा है. पौराणिक मान्यतानुसार, इसका निर्माण महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान भीम द्वारा किया गया था. इस बांध के नीचे जमे पानी की गहराई का अंदाजा लगाना संभव नहीं हो सका है.

रांची का रातू पैलेस

रांची, झारखंड में स्थित वर्तमान रातू पैलेस का निर्माण वर्ष 1899 में शुरू हुआ था, जो कि 1901 में बन कर तैयार हुआ. इसे कलकत्ता के ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स की देखरेख में बनाया गया था. 22 एकड़ क्षेत्र में फैले इस दो मंजिला पैलेस में 103 कमरे हैं. आज भी दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं. ब्रिटेन की शाही बकिंघम पैलेस के आर्किटेक्चर की झलक रातू पैलेस में भी मिलती है. इतिहासकारों की मानें, तो यहां कभी नागवंशी शासकों का शासन हुआ करता था, जो कि दुनिया का ऐसा पहला राजघराना था, जिसने जनता से कभी लगान नहीं वसूला. यहां की प्रजा उनको उनका खर्च चलाने के लिए त्योहारों तथा अन्य खास मौकों पर अपनी मर्जी से सामान दिया करती थी. साथ ही, इस राजघराने के राजा राजगद्दी पर ताजपोशी न करवा कर गद्दी खाली रखते थे. इसी वजह से इस राजघराने को ‘फकीरी गद्दी’ के नाम से भी जाना जाता है.

कावर झील पक्षी विहार

पटना से करीब 100 किमी पूर्व में एवं जिला मुख्यालय बेगूसराय से 22 किलोमीटर उत्तर में एशिया में ताजे मीठे पानी की सबसे बड़ी गोखुर झील (कावर झील) स्थित है. यह दुनिया का सबसे बड़ा वेटलैंड एरिया है, जो कि घरेलू और प्रवासी पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों का आश्रय है. वर्ष 1986 में राज्य सरकार ने इसे पक्षी विहार का दर्जा दे दिया. तब से यह ‘कावर झील पक्षी विहार’ के नाम से जाना जाता है. सर्दियों में यहां साइबेरिया और हिमालय क्षेत्र से पक्षी देखे सकते हैं. पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली यहां वर्षो शोध किया था.

पतरातूघाटी
ठण्ड का मौसम, सुबह की चमकती धुप, हलकी-हलकी चलती सर्द हवाएं, टेढे-मेढे रास्ते, घाटियां, ऊंची-नीची पहाड़ियां, सर्पीली सडक, वक्रनुमा पानी का किनारा…. इन शब्दों का प्रयोग प्राय: हिमालयी क्षेत्र की ओर इशारा करने के लिए होता है, लेकिन झारखण्ड में भी ऐसा नजारा आप देखने के लिए आ सकते हैं. जी हां, हम यहां बात कर रहे हैं पतरातू घाटी की…झारखंड की राजधानी रांची से उत्तर की ओर 35 किलोमीटर दूर की एक घाटी पतरातू है जो अछूते प्राकृतिक सौंदर्य का शानदार उदाहरण है.

इसके अलावा बिहार में नालंदा ,राजगीर, पावापुरी, बोधगया, वैशाली हर साल लाखों विदेशी पर्यटक आते हैं. यही नहीं झारखंड में ऊंचाई से गिरते झरने को देखने के लिए भी पर्यटक आते हैं. इसमें दसम फॉल पंचघाघ हिरणी फॉल जोन्हा फॉल आदि प्रमुख हैं.

देखें पतरातू घाटी का मनोरम दृश्‍य

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