Valentine Special Story: 1975 अ लव स्टोरी, सात समंदर पार 'साइकिल वाला प्यार'

Updated at : 14 Feb 2026 7:25 AM (IST)
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valentine special story

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Valentine Special Story: दलित परिवार में जन्मे प्रद्युम्न कुमार महानंदिया की यह सच्ची प्रेम कहानी आज के तेज-तर्रार रिश्तों के दौर में उम्मीद जगाती है. दिल्ली की सड़कों से लेकर स्वीडन तक, 11 हजार किलोमीटर का साइकिल सफर सिर्फ प्यार के भरोसे तय हुआ. यह कहानी बताती है कि सच्चा प्रेम, कला और विश्वास सरहदों से कहीं बड़ा होता है.

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Valentine Special Story: आज जहां साइबर लव के युग में झट से प्यार हो जाता है और खट से ब्रेकअप हो जाता है, जहां प्यार के नाम पर महंगे-महंगे तोहफे ही पहले जगह पाते हैं, जहां प्यार के लिए बाहरी आकर्षण ही महत्व रखता है, वहां हम आपके लिए लेकर आये हैं पवित्र प्रेम की एक सच्ची कहानी, जिसका नायक नौ देशों की सरहदें लांघ कर भारत से स्वीडन तक जा पहुंचता है, वह भी सिर्फ साइकिल पर. 1975 की अपनी लव स्टोरी को स्वीडन से खुद इसके नायक पीके ने प्रभात खबर से खास बातचीत में शेयर किया है.

अभावों के बीच जन्मी कला की चिंगारी

घुंघराले बालों वाला एक बच्चा, जिसे स्कूल में सभी बच्चों के साथ इसलिए बैठने नहीं दिया जाता था, क्योंकि वह दलित परिवार से था. जिसे लोग ‘अछूत’ कह कर ताने मारते थे. अभावों से लड़ते हुए आगे उसमें कला की ऐसी ललक जगी कि स्कॉलरशिप पाकर खल्लिकोटे कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट्स, शांति निकेतन और फिर दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट जा पहुंचा. मगर जीविका चलाने के लिए दिल्ली के व्यस्त सड़क कनॉट प्लेस पर स्केच बनाने की वजह से कई बार पुलिस उठा कर ले गयी, क्योंकि अनुमति नहीं थी. आगे प्रेम के प्रति सच्चाई व पागलपन में वह ऐसा कुछ कर गया, जिसकी वजह से हॉलीवुड में उसकी कहानी पर डॉक्यूमेंट्री तक बन गयी और आज पूरी दुनिया में वह ‘प्रेम का रियल हीरो’ बन चुका है. आगे की कहानी, पीके की जुबानी…

सेंट्रल पार्क के पास रोजी-रोटी की जंग

वर्ष 1975 में इमरजेंसी का दौर. नयी दिल्ली के व्यस्तम सड़क कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क (अब मेट्रो स्टेशन) के पास एक पोट्रेट आर्टिस्ट राहगीरों का स्केच बनाया करता था. लोग उसे पीके बुलाते थे, पूरा नाम- प्रद्युम्न कुमार महानंदिया. स्केच ऐसी बनाते, जिसे देखते कोई कहता- पीके की उंगलियों में जादू है. एक शाम में पीके रोजाना की तरह स्केच बना रहे थे, तभी सामने एक विदेशी लड़की आकर रुकती है. वह शार्लोट वॉन शेडविन थीं. 19 साल की स्वीडिश लड़की, जो भारत घूमने आयी थी. उन्होंने किसी अखबार में पीके के बारे में पढ़ा था कि वह लोगों का हूबहू चित्र बनाने में माहिर है और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, अंतरिक्ष यात्री वेलेंटीना तेरेश्कोवा और तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि तक का चित्र बना चुका है. ’10 मिनट, 10 रुपये’ उसका बिजनेस मंत्र था. शार्लोट भी अपना पोट्रेट बनवाने पहुंची थी.

नीली आंखों वाली लड़की और हवा में तैरता कलाका

पीके उस पहली मुलाकात को याद करते हुए कहते हैं- “मुझे आज भी अच्छे से याद है 17 दिसंबर, 1975 की वो सर्द शाम थी. एक सुंदर सुनहरे लंबे बालों वाली और नीली आंखों वाली लड़की मेरे सामने आयी और कहा- क्या आप मेरा चित्र बना सकते हैं? उसे देखते हुए मुझे लगा जैसे मैं हवा में तैर रहा हूं. उसकी सुंदरता को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. ”
उस दिन पीके चित्र पूरा नहीं कर पाये, क्योंकि वे नर्वस थे. उनका हाथ कांप रहा था. उन्होंने शार्लोट से कहा- ‘क्या आप कल वापस आ सकती हैं?’ शार्लोट ने ओके कहा और चली गयी. आगे पीके बताते हैं कि ‘अगले दिन जब मैंने उन्हें ट्रैफिक लाइट पर देखा, तो मेरे पेट में गुड़गुड़ाहट हुई. मैंने अपने ईजल (चित्र बनाने का स्टैंड) पर लिखा- आर्टिस्ट बीमार है.’
दरअसल, वे घबरा गये थे. उन्होंने कहा कि चित्र बनाने के लिए और समय चाहिए. शार्लोट ने मान लिया और अगले तीन दिनों तक वे आती रहीं. पीके ने हर चित्र के लिए उनसे 10 रुपये मांगे, लेकिन शार्लोट ने 20 रुपये दे दिये. पीके ने मजाक में कहा- “नहीं! आप अधिक नहीं दे सकतीं, क्योंकि आप बहुत सुंदर हैं और मैं ऐसी सुंदर महिला से अधिक पैसे नहीं लेता. ये बात चार्लोट को भा गयी.

नजरों से नजरों का पहला प्यार

इस दौरान जैसे-जैसे पीके कैनवास पर शार्लोट की चित्र उकेरते, दोनों के बीच एक अनकही कहानी भी आकार ले रही थी. शायद ये नजरों से नजर का पहला प्यार था. एक ऐसा प्यार, जो कैनवास की शीट पर कोयले की राख से पैदा हुआ, जिसमें आगे अभी बहुत कुछ होना शेष था. कुछ ही हफ्तों में ये छोटा-सा परिचय एक खूबसूरत रिश्ते में बदलने लगा. दरअसल, चित्र बनाने के दौरान पीके ने उनसे पूछा था- ‘आप की राशि क्या है?’ जवाब मिला- ‘वृषभ (Taurus).’ तब पीके को बचपन में मां की कही एक बात याद आयी कि एक ज्योतिषी ने कहा था कि उसकी शादी वृषभ राशि की लड़की से होगी, जो दूर देश से आयेगी. उसे संगीत का शौक होगा. उसके पास जंगल भी होगा. आगे उसने पूछा- ‘क्या आपके पास अपना जंगल है?’ शार्लोट ने कहा, ‘हां.’ ‘क्या आप संगीत जानती हैं?’ ‘हां’, मैं पियानो बजाती हूं.’ अब पीके समझ गये कि यह वही लड़की है, जिसे नियति ने उनसे मिलाया है.
पीके ने बेझिझक कहा- ‘आप मेरी जीवन संगिनी बनने वाली हैं. यह सब आकाश में तय है.’ शार्लोट ने ऊपर देखते हुए कहा- ‘आकाश में क्या तय है?’ पीके : ‘हमारी मुलाकात आकाश में तय थी.’
शार्लोट : ‘तुम यह कैसे जानते हो?’
पीके : ‘अगर तुम मुझ पर भरोसा नहीं करती, तो मैं अपनी कुंडली तुम्हें दिखा सकता हूं.’
फिर दोनों एक-दूजे के साथ पार्क में खुले आसमान के नीचे समय बिताने लगे. दोनों की भाषाएं भले अलग थीं, मगर दिल की भाषा एक थी, जो उन्हें करीब ला रहा था. एक रॉयल स्वीडिश परिवार की यह लड़की पीके की सादगी पर अपना दिल हार बैठी थी.

परिवार का आशीर्वाद, आदिवासी रीति से शादी

आगे इस रिश्ते को आगे बढ़ाने से पहले शार्लोट ने उनके साथ गांव कंधापड़ा (ओडिशा) जाने की इच्छा जतायी. पीके बताते हैं, ‘जब वह पहली बार मेरे पिता से मिलीं, तो उन्होंने साड़ी पहनी थी. मेरे पिता और परिवार के आशीर्वाद के साथ हमने आदिवासी परंपरा के अनुसार शादी कर ली. वहां पीके उन्हें प्रसिद्ध कोणार्क मंदिर ले गये. शार्लोट के मुताबिक, ‘जब पीके ने मुझे कोणार्क दिखाया, तो मैं भावुक हो गयी. लंदन में छात्र जीवन के दौरान मेरे कमरे में इसी मंदिर के पत्थर के पहिये की एक तस्वीर लगी हुई थी, लेकिन मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह जगह वास्तव में कहां है, और आज मैं उसी के सामने खड़ी थी. ‘गांव में कुछ दिन बिताने के बाद दोनों वापस दिल्ली लौट आये.’

जब खुशियों पर बिछड़ने की परछाईं पड़ी

हालांकि, ये खुशी ज्यादा दिन नहीं रहने वाली थी. फिर वो दिन आया, जब शार्लोट को पढ़ाई पूरी करने के लिए स्वीडन लौटना था. वह स्वीडन से 22 दिनों की यात्रा कर यूरोप, तुर्की, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार करते हुए दिल्ली आयी थीं.
उन्होंने पीके से साथ चलने को कहा और हवाई जहाज का टिकट देने की पेशकश की, लेकिन पीके के स्वाभिमान को यह गवारा नहीं था. उन्हें फाइनल इयर की पढ़ाई भी पूरी करनी थी. उन्होंने कहा- ‘मैं एक रोज खुद आऊंगा, तुम बस मेरा इंतजार करना.’
शार्लोट ने उन्हें अलविदा कहा और उनसे वादा लिया कि वे स्वीडन के टेक्सटाइल शहर बोरास में उनके घर जरूर पहुंचेंगे.

अब प्यार के लिए कठिन परीक्षा : 11 हजार किमी का दूभर सफर

एक साल से ज्यादा समय बीत गया और दोनों पत्रों के जरिये संपर्क में रहे. उन दिनों न मोबाइल फोन हुआ करते थे और न इंटरनेट. इसके बाद पीके को जैसे अपने प्यार को पाने के लिए परीक्षा देनी थी. इसके बाद वो होने वाला था, जो अब तक हम सिर्फ फिल्मों में देखते आये हैं.
मन में अपने प्यार के लिए गहरी चाहत लिये पीके ने अपना सब कुछ बेच दिया और एक पुरानी साइकिल खरीदी. पीके कहते हैं- 22 जनवरी, 1977 को अपनी साइकिल पर एक छोटा बैग बांधा और नयी दिल्ली से स्वीडन (लगभग 10,000 किमी) के सफर पर अपने प्यार को पाने निकल पड़ा. लोगों ने मुझे पागल तक कहा. अमृतसर से वाघा बॉर्डर होते हुए काबुल पहुंचा. हर दिन करीब 70 किमी साइकिल चलाता था.
पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, बुल्गारिया, यूगोस्लाविया, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और डेनमार्क से होते हुए वह बेहद खतरनाक सफर था. तब कोई नक्शा या जीपीएस नहीं था, न ही कोई फोन. था तो बस प्यार, विश्वास और कागज पर लिखा स्वीडन में शार्लोट के घर का पता. कभी-कभी सड़कों पर सोना पड़ता, कोई खिला देता, तो कोई रात बिताने की जगह दे देता. कभी खर्चे के लिए राहगीरों के चित्र बनाता था. लगातार साइकिल चलाने से पैरों में भीषण दर्द होता, मगर मन में उमंग हावी था.
अपने इस कठिन अनुभव पर कहते हैं- ‘तब अधिकांश देशों में प्रवेश करने के लिए वीजा की जरूरत नहीं थी. हालांकि अच्छी बात ये रही कि तब मैं दुनिया के भूगोल से वाकिफ नहीं था, वरना शायद ही ऐसा करने की साहस कर पाता.
अफगानिस्तान कितना अलग, शांत और सुंदर देश था. लोग कला से प्रेम करते थे. एक बड़ा हिस्सा आबादी रहित था. लोग वहां हिंदी समझते थे, लेकिन ईरान में प्रवेश करते ही भाषाई समस्या आने लगी. एक बार तो मुझे लुटेरा समझा गया, फिर मेरी कला ने ही मुझे बचाया. मुझे लगता है कि प्रेम व कला ही एक ऐसी भाषा है, जिसे पूरी दुनिया के लोग समझते हैं.
चार महीने और तीन हफ्ते में 11,000 किमी सफर करके इस्तांबुल और वियना के रास्ते यूरोप पहुंचा. फिर ट्रेन से गोथेनबर्ग की यात्रा कर आखिरकार 28 मई, 1977 को स्वीडन की सीमा में दाखिल हुआ. पहले तो वहां के अधिकारियों को यकीन नहीं हुआ कि कोई भारत से साइकिल चलाकर यहां आ सकता है, लेकिन जब शार्लोट को फोन किया, तो ये सच साबित हुआ. कुछ ही घंटे बाद मैं शार्लोट के घर पर था. जब हम दोनों आमने-सामने हुए, तो कुछ पल कोई संवाद नहीं… सिर्फ आंसू थे, जो शार्लोट की आंखों से बह रहे थे.

स्वीडन में दोनों यूं बस गये…

फिर उनका सामना शार्लोट के माता-पिता से हुआ, जिसके बाद उनकी रजामंदी से अंततः स्वीडन में आधिकारिक तौर पर दोनों ने शादी कर ली. फिर उनके जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ. वे स्वीडन में ही बस गये. उनके दो बच्चे (सिद्धार्थ और एमेली) हुए. उन्हें वहां की संस्कृति में ढलने में समय लगा, लेकिन शार्लोट के प्यार ने सब आसान बना दिया. उन्होंने कला और योग सिखाना शुरू किया. 2012 में स्वीडन में प्रतिष्ठित ‘नॉर्डिक’ सम्मान से नवाजा गया.
आज 74 वर्षीय पीके स्वीडन में ओडिशा संस्कृति के राजदूत के रूप में जाने जाते हैं और स्वीडन सरकार के कला-संस्कृति सलाहकार रह चुके हैं. उनका प्यार भरा ये सफर आज भी जारी है. उनकी वो पुरानी साइकिल, पिट्ठू बैग व अन्य चीजें स्वीडन में म्यूजियम की धरोहर बन चुकी हैं.

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Rajnikant Pandey

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Rajnikant Pandey is a contributor at Prabhat Khabar.

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