देवी को प्रसन्न करने के लिए महिलाओं के रूप में तैयार होते हैं पुरुष, जानें इसके पीछे क्या है मान्यता

Chamayamvilakku festival in Kerala: चमायाविलक्कू दो दिनों तक आयोजित किया जाता है, जो शाम को शुरू होता है और सुबह होने तक चलता है. इस उत्सव में अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए पुरुष महिलाओं के जैसे तैयार होकर देवी को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं.
Chamayamvilakku festival in Kerala: हर साल केरल के कोल्लम, चावरा में कोट्टनकुलनगर श्री देवी मंदिर में होने वाले वार्षिक चमयमविलक्कू उत्सव में, दर्जनों पुरुष अपनी मूंछें मुंडवाते हैं, अपनी भौहें थ्रेड करते हैं, मेकअप लगाते हैं और रंगीन साड़ियां पहनते हैं. यह उनके पवित्र प्रसाद का हिस्सा है. जो देवी को अपनी मनोकाना पूर्ति के लिए अर्पित करते हैं. उनमें से कुछ इतने आश्चर्यजनक रूप से तैयार हैं कि यह विश्वास करना मुश्किल है कि वे वास्तव में महिलाओं के रूप में तैयार एक पुरुष हैं.
केरल राज्य बिजली बोर्ड में काम करने वाले गणेशवरन जैसे लोगों के लिए छमायमविलक्कू उत्सव एक रिवाज और जीवन का तरीका है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल, मंदिर के त्योहार की शुरुआत से दो हफ्ते पहले वह एक नई साड़ी और आभूषण खरीदते हैं और ब्लाउज सिलवाने के लिए अपने गांव में दर्जी के पास जाते हैं. त्योहार के दिन उनकी पत्नी सायमा साड़ी और केश सज्जा में उनकी मदद करती हैं. गणेश्वरन एक विग, फूल और आभूषण पहनते हैं और मंदिर में जाते हैं. इस तरह चावरा, पुथुकड़, कुलंगरा और कोट्टाक्कम के चार ‘करस’ (शाब्दिक तट) के पुरुष पारंपरिक रूप से त्योहार से जुड़े होते हैं. गणेशवरन ने मीडिया को बताया कि मैंने इसे तब शुरू किया जब मैं एक बच्चा था. मेरी मां और बहनें मुझे तैयार करती थीं और मैं अपनी बहनों के कपड़े पहनकर उत्सव में शामिल होता था. तब कोई कृत्रिम बाल नहीं थे”, वह याद करते हैं.
उत्सव में, 10 वर्ष से कम उम्र के लड़के भी लड़कियों की तरह कपड़े पहनते हैं और दिन के समय आयोजित होने वाले ‘कक्काविलाक्कू’ में भाग लेते हैं. चमायाविलक्कू दो दिनों तक आयोजित किया जाता है, जो शाम को शुरू होता है और सुबह होने तक चलता है. गणेश्वरन कहते हैं कि उन्होंने अगले साल भी उत्सव में हिस्सा लेने की पेशकश की है क्योंकि उनकी बेटी कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में शामिल होगी.
सोशल मीडिया सदियों पुराने चमयमविलाक्कू उत्सव के धीमे-धीमे, आकर्षक वीडियो और जीवंत छवियों से भरा पड़ा है. गोपालकृष्ण पिल्लई कहते हैं, कई लोगों के लिए, यह उनके प्रसाद का हिस्सा है. चार स्थानों या करों के निवासी इस त्योहार के साथ निकटता से जुड़े हुए हैं. मेरी मां मुझे इस त्योहार पर एक लड़की के रूप में दीया जलाने के लिए ले जाती थी जब तक कि मैं आठ साल का नहीं था. जिन्होंने इस उत्सव का डॉक्यूमेंटेशन किया और एक ब्रोशर निकाला जो अभी भी लोकप्रिय है.
मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष वी जयचंद्रन के अनुसार इसे एक ट्रांसजेंडर त्योहार नहीं कहा जा सकता है, हालांकि अन्य राज्यों से भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति अच्छी संख्या में आते हैं. इस उत्सव में प्रमुख प्रतिभागी चार करों के पुरुष हैं जो अनुष्ठानों का सख्ती से पालन करते हैं.
मंदिर के मिथक के अनुसार, लड़कों का एक समूह एक बार एक तालाब के पास गायों को चरा रहा था जहां वर्तमान मूर्ति स्थापित है, मिट्टी के मंदिर बना रहे थे और उसके चारों ओर खेल रहे थे. उन्हें एक नारियल मिला और उनमें से एक ने उसे तोड़ने के लिए एक पत्थर से टकराने की कोशिश की. किंवदंती है कि पत्थर से खून बहा और लड़के डर गए. हालांकि, यह पता चला कि देवी लड़कों और उनके खेल से प्रसन्न थीं और उन्होंने वादा किया कि वह हर साल एक निश्चित दिन पर उस जगह का दौरा करेंगी. बाद में पुरुष – संभवतः देवी के आने पर देवी को प्रसन्न करने के लिए महिलाओं के रूप में तैयार होते हैं.
इससे पहले, ‘केट्टुकुथिरा’, मिट्टी या लकड़ी के घोड़े प्रत्येक काड़ा से 50 फीट तक ऊंचे होते थे, चमायविलक्कू के हिस्से के रूप में जुलूस में भाग लेते थे. बाद में, केट्टुकुथिरस को छोटे प्रतिकृतियों से बदल दिया गया.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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