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काव्य-गीत: कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

Updated at : 12 Dec 2021 2:48 PM (IST)
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काव्य-गीत: कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

काव्य-गीत: मन की बातों को खूबसूरत अंदाज में बयां करने का तरीका होते हैं कविता और गीत. आप भी पढ़ें मशहूर लेखकों की प्रसिद्ध रचनाएं.

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अमीर खुसरो : छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के

अपनी छवि बनाय के जो मैं पी के पास गई
जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैनाँ मिलाय के
बात अधम कह दीन्हीं रे मोसे नैनाँ मिलाय के
बल-बल जाऊँ मैं तोरे रंग-रेजवा
अपनी सी रंग दीन्हीं रे मोसे नैनाँ मिलाइ के
प्रेम-भटी का मदवा पिलाय के मतवारी कर दीन्हीं रे
मोसे नैनाँ मिलाइ के
गोरी गोरी बइयाँ हरी हरी चूड़ियाँ
बईयाँ पकर धर लीन्हीं रे मोसे नैनाँ मिलाय के
‘ख़ुसरव’ ‘निजाम’ के बल-बल जइए
मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैनाँ मिलाइ के

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वंदना टेटे : सबसे सुन्दर स्त्री हो जाती हूँ

टाँगी,
हँसिया,
दाब,
दराँती
ये सब हमारी सुन्दरता के
प्रसाधन हैं
जिन्हें हाथ में पकड़ते ही
मैं दुनिया की
सबसे सुन्दर स्त्री हो जाती हूँ

तब कहीं दूर रैम्प पर
लड़खड़ाती हुई टाँगों वाली
तुम्हारी सारी विश्वसुन्दरी पुतलियाँ
पछ़ाड़ खाकर गिर जाती हैं
प्रायोजक भाग उठते हैं
टीवी डिसकनेक्ट हो जाता है
मोबाइल के टॉवर
ठप्प हो जाते हैं

जब मैं हाथ में ले लेती हूँ
टाँगी, हँसिया, दाब, दराँती
या इन जैसा कुछ भी…

फणीश्वर नाथ रेणु : बहुरूपिया

दुनिया दूषती है
हँसती है
उँगलियाँ उठा कहती है …
कहकहे कसती है –
राम रे राम!
क्या पहरावा है
क्या चाल-ढाल
सबड़-झबड़
आल-जाल-बाल
हाल में लिया है भेख?
जटा या केश?
जनाना-ना-मर्दाना
या जन …….
अ… खा… हा… हा.. ही.. ही…
मर्द रे मर्द
दूषती है दुनिया
मानो दुनिया मेरी बीवी
हो-पहरावे-ओढ़ावे
चाल-ढाल
उसकी रुचि, पसंद के अनुसार
या रुचि का
सजाया-सँवारा पुतुल मात्र,
मैं
मेरा पुरुष
बहुरूपिया।

निदा फ़ाज़ली : कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता

चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

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धर्मवीर भारती : कनुप्रिया – पहला गीत

ओ पथ के किनारे खड़े छायादार पावन अशोक-वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे तुम को क्या मालूम कि
मैं कितनी बार केवल तुम्हारे लिए-धूल में मिली हूँ
धरती में गहरे उतर जड़ों के सहारे
तु्म्हारे कठोर तने के रेशों में कलियाँ बन, कोंपल बन,सौरभ बन,लाली बन-
चुपके से सो गयी हूँ
कि कब मधुमास आए और तुम कब मेरे
प्रस्फुटन से छा जाओ !

फिर भी तुम्हें याद नहीं आया, नहीं आया,
तब तुम को मेरे इन जावक-रचित पाँवों ने
केवल यह स्मरण करा दिया कि मैं तुम्हीं में हूँ
तुम्हारे ही रेशे-रेशे में सोई हुई-
और अब समय आ गया कि
मैं तुम्हारी नस-नस में पंख पसार कर उडूँगी
और तुम्हारी डाल-डाल में गुच्छे-गुच्छे लाल-लाल
कलियाँ बन खिलूँगी !
ओ पथ के किनारे खड़े
छायादार पावन अशोक-वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि
तुम मेरी ही प्रतीक्षा में
कितने ही जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे !

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