World Day Against Child Labour: एक बार मौका देकर, तो देखिए, पढ़ें ये प्रेरणादायी कहानी

World Day Against Child Labour: कहते हैं कुछ करने की ललक मन में हो और कोई मौका दे दे, तो मुश्किल राह भी आसान हो जाती है. गरीबी व आर्थिक संकट के बीच आज भी अधिकतर जगहों पर बचपन में ही कई बच्चों की मासूमियत काम के बोझ तले दब जाती है. बाल श्रम का दंश आज के दौर में भी थम नहीं रहा है, पर कुछ ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने एक बाल श्रमिक के तौर पर अपने जीवन की शुरुआत तो की, पर आज एक अच्छे मुकाम पर हैं. इन्होंने यह बता दिया है कि यदि मौका मिले, तो कोई भी खुद को साबित कर सकता है. बाल श्रमिक निषेध दिवस पर पढ़िए ऐसी ही सक्सेस स्टोरी.
World Day Against Child Labour: कहते हैं कुछ करने की ललक मन में हो और कोई मौका दे दे, तो मुश्किल राह भी आसान हो जाती है. गरीबी व आर्थिक संकट के बीच आज भी अधिकतर जगहों पर बचपन में ही कई बच्चों की मासूमियत काम के बोझ तले दब जाती है. बाल श्रम का दंश आज के दौर में भी थम नहीं रहा है, पर कुछ ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने एक बाल श्रमिक के तौर पर अपने जीवन की शुरुआत तो की, पर आज एक अच्छे मुकाम पर हैं. इन्होंने यह बता दिया है कि यदि मौका मिले, तो कोई भी खुद को साबित कर सकता है. बाल श्रमिक निषेध दिवस पर पढ़िए झारखंड से ऐसी ही सक्सेस स्टोरी… विकास की रिपोर्ट :
कोडरमा के डोमचांच प्रखंड का मनान अंसारी कभी माइका (ढिबरा) खदान में बाल मजदूर था. आज देश के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से एमससी कर रहा है. साथ ही कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बाल श्रम के मुद्दे पर आवाज भी बुलंद कर चुका है़ मनान ने छोटी सी उम्र में ही ढिबरा खदान में काम करना शुरू कर दिया. छह से आठ साल की उम्र में 200-300 फीट गहराई सुरंग वाली माइका खदान में ढिबरा चुनता. इस दौरान बचपन बचाओ आंदोलन की मदद से उसे खदान से निकाला गया. मनान को राजस्थान के एक बाल आश्रम में भेजा गया. बचपन बचाओ आंदोलन के हेमांक चौबे बताते हैं : आश्रम में मनान में एक बड़ा बदलाव दिखा़ वह चीजों को बहुत जल्दी सीखता़ पढ़ाई-लिखाई में भी बहुत तेज था. पढ़ाई के साथ बच्चों के अधिकारों के लिए भी लड़ाई का जज्बा दिखा़ इसी का परिणाम है कि 14 वर्ष की आयु में जेनेवा में आइएलओ की एक कांफ्रेंस में बच्चों के अधिकारों के लिए अपनी बात रखी़ 2014 में लंदन में टीइडी टॉक शो में बाल अधिकार चैंपियन पैनल में मॉडरेटर की भूमिका निभायी. जेनेवा में नवंबर 2019 में आयोजित यूएन साउथ एशिया फोरम ऑफ बिजनेस एंड ह्यूमन राइट्स-2019 में भी भाग लिया.
मनान ने बताया : उसके जीवन में बदलाव बचपन बचाओ आंदोलन और नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के कारण आया़ स्कूली शिक्षा पूरा करने के बाद दिल्ली विवि से बीएससी लाइफ साइंस में डिग्री ली़ अभी केआइआइटी विवि भुवनेश्वर से माइक्रो बायोलॉजी में एमएसी कर रहा है़ संगीत का भी शौक है़ मनान ने बताया : मेरा लक्ष्य माइक्रो बायोलॉजी में ही यूएसए या यूके से पीएचडी और रिसर्च करना है़ 24 वर्षीय मनान के परिजन आज भी ढिबरा के काम से ही जुड़े हैं. बाल श्रम निषेध दिवस पर मनान ने कहा कि मेरे गांव की स्थिति बदल गयी है. बिजली आ गयी है. हालांकि आज भी कई इलाके हैं, जहां बच्चे बाल श्रम के शिकार हैं. इन बच्चों को उनका अधिकार मिले और मासूम जिंदगी निखरे इसके लिए सबकी मदद की जरूरत है.
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