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दुमका लिटरेचर फेस्टिवल में बोलीं अनुकृति उपाध्याय, अपनी परंपरा और संस्कृति को बचाने की जरूरत

Updated at : 19 Mar 2023 5:43 PM (IST)
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दुमका लिटरेचर फेस्टिवल में बोलीं अनुकृति उपाध्याय, अपनी परंपरा और संस्कृति को बचाने की जरूरत

तीन सत्र में चले कार्यक्रम के पहले सत्र में अविस्मरणीय महिलाओं की कहानियां विषय पर अनुकृति उपाध्याय ने अपने विचार व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि मुझे गर्व है कि मुझे प्रकृति के गोद में बसे इस वीरों की भूमि में आने का सौभाग्य मिला. आज हम सभी को अपने परंपरा अपने संस्कृति को बचाने की आवश्यकता है.

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झारखंड : कन्वेंशन सेंटर दुमका में आयोजित दुमका स्टेट लाइब्रेरी लिटरेचर फेस्टिवल सम्पन्न हुआ. चार सत्र में चले इस कार्यक्रम के पहले सत्र में अविस्मरणीय महिलाओं की कहानियां विषय पर अनुकृति उपाध्याय ने अपने विचार व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि मुझे गर्व है कि मुझे प्रकृति के गोद में बसे इस वीरों की भूमि में आने का सौभाग्य मिला. उन्होंने कहा कि आज हम सभी को अपनी परंपरा और अपनी संस्कृति को बचाने की आवश्यकता है. साथ ही बताया कि मध्यम वर्ग में पैदा होने के बाद शिक्षा हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता रही.

शिक्षा प्राप्त करने के बाद दुनिया मे अलग अलग जगह पर काम करने निकल पड़ी. दुनिया घूम कर देखा. पाया कि लोगों में अंतर नहीं है परिस्थितियों में अंतर है. उन्होंने बताया कि घर छोड़कर पिछले तीन वर्षों से पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली से संस्था से जुड़ी हूं. जितना पर्यावरण मैंने नष्ट किया है उसका कुछ अंश भरण करने का प्रयास कर रही हूं. बताया कि मेरी अंग्रेजी में 4 किताबें प्रकाशित हुए हैं. 2 छोटे उपन्यास भी लिखे हैं, दौरा और भौंरी. राजस्थान की ग्रामीण और बंजारा संस्कृति से जुड़े 2 उपन्यास लिखे हैं. इन उपन्यास में उनके जीवन, सौंदर्य उनके संघर्ष पर लिखा है.

‘हम सभी का जीवन एक दूसरे से जुड़ा’

उन्होंने कहा कि हम सभी का जीवन एक दूसरे से जुड़ा हैं. हर पीढ़ी अपने पुराने पीढ़ी से कुछ अंश लेकर आगे बढ़ती है. स्त्रियों की किसी ने सक्षम नहीं बनाया वो हमेशा सक्षम थी. उनके दायरे को सीमित रखा गया था. उन्होंने अपने क्षेत्र का विस्तार किया. समाज मे स्त्रियों का अपना एक अलग महत्व है. किसी उत्सव की कल्पना स्त्रियों के बिना संभव नहीं है. स्त्रियों का दो परिवार होता है. एक जहां उनकी भावना जुड़े होते है और दूसरा जहां उन्हें जोड़ना होता है.

‘विधा उतनी ही सीमित है, जितना उसे लिखने वाला’

आगे उन्होंने कहा कि कोई भी विधा उतनी ही सीमित है, जितना उसे लिखने वाला होता है. किसी भी विधा की कोई सीमा नहीं होती है. अपने सीमा को पहचानने की जरूरत है. लिखना भी एक तरह का योग है. जितना करेंगे उतना आसान होता जाएगा. मोडरेटर के रूप में अच्युत चेतन ने कहा कि अनुकृति उपाध्याय के उपन्यास के बारे में कहा जाता है कि महिलाओं के जीवन के उन कोनों में चली जाती है जहां साधारण रूप से इंसान का मन नहीं जा पाता है. आपके कहानियों में राजस्थान की झलक देखने को मिलती है. राजस्थान का मरुस्थल भी आपके उपन्यास में पात्र है.

‘साहित्य और जीवन में हास्य’

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ऑनलाइन जुड़कर साहित्य और जीवन में हास्य विषय पर वरुण ग्रोवर ने अपने विचार व्यक्त किया. कहा कि हास्य और व्यंग में थोड़ा ही अंतर है. हास्य की भी एक विधा है. वर्तमान में कॉमेडी करना थोड़ा मुश्किल है. अब कॉमेडी का सीधा संबंध रियलिटी से है. सोशल मीडिया के वजह से कविताओं या अन्य चीजों के गुणवत्ता में गिरावट आयी है. कहा कि पॉलिटिक्स के बिना कॉमेडी संभव नहीं है. कई बार मुश्किलों में ह्यूमर ही आपको बचा सकता है. ह्यूमर का अपना एक महत्व है. कहा कि कविता एवं अलंकार गानों को अमर बनाने के लिए महत्वपूर्ण है.

“साहित्य और मानसिक स्वास्थ्य : स्वयं के साथ सामंजस्य”

कार्यक्रम के तीसरे सत्र में “साहित्य और मानसिक स्वास्थ्य: स्वयं के साथ सामंजस्य” विषय पर जैरी पिंटो ने अपने विचार व्यक्त किये. जैरी पिंटो मुंबई के रहने वाले हैं.वे अंग्रेजी भाषा के कवि,साहित्यकार, लेखक एवं पत्रकार हैं. उन्होंने कहा कि जो भी कोई किताब आपको पसंद नहीं आये तो उसका दान कर दें ताकि वह अपने रीडर तक पहुँच सके.सरस्वती माँ को कैद मत कीजिये.भाषा एक घर है.हर कोई जो आपके भाषा का उपयोग या प्रयोग करना चाहते हैं उनका सम्मान करें.सभी भाषा के साथ सामान व्यवहार करें.सभी भाषा अपनी अलग पहचान रखता है.

‘साहित्य समाज का दर्पण’

कार्यक्रम के चौथे सत्र में झारखंड राज्य तथा इसके निवासियों के बारे में साहित्य विषय पर महादेव टोप्पो ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण है. साहित्य पढ़ने के दौरान पाया कि जिस क्षेत्र से में संबंध रखता हूँ वह समाज साहित्य में कहीं कोई स्थान नहीं रखता है. जंगल पहाड़ की बातें कौन सुनेगा ऐसे तानों के साथ मैंने जंगल पहाड़ नाम की किताब लिखी जिसे खूब सराहा गया. अपनी बात और संवाद को दूसरों तक पहुचाने का बेहतर माध्यम साहित्य है. उन्होंने कहा कि वर्तमान में हर मुद्दों को आदिवासी तथा झारखंड को केंद्र बिंदु में रखकर लिखता हूँ. उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा की लिपि उस भाषा की ध्वनि का चित्र है. सभी समुदायों ने अपने सुविधा के अनुसार लिपि का चयन किया है.

‘झारखंड प्रकृति की गोद में बसा राज्य’

जोसेफ बारा ने कहा कि झारखंड प्रकृति की गोद में बसा राज्य है. प्रकॄति की पूजा करने वाले आदिवासी समाज यहां निवास करते हैं. उन्होंने कहा कि अब तक यह समाज मुख्य धारा में नहीं आ सका है. इस समाज को मुख्य धारा से जोड़कर ही इन्हें विकास के पथ पर लाया जा सकता है. आदिवासी समाज को देखने का नजरिया बदलना होगा. हजारों शब्द हैं जिन्हें आदिवासी भाषा से लिया गया है. चुंडा सोरेन सिपाही ने कहा कि संथाली साहित्य की समृद्धि के लिए एक लिपि का प्रयोग करना होगा. संथाली भाषा मे एक शब्द के कई अर्थ हैं. उन्होंने कहा कि अनुभव के बगैर किसी भी साहित्य की रचना नहीं की जा सकती है.

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