झारखंड सरकार ने माना बंद पड़ी खदानें पर्यावरण के लिए बन रही खतरा, लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 30 Nov 2022 5:09 PM

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कोल इंडिया का इस बारे में यह कहना है कि अगर उसे खदान बंद करना पड़ा तो उसके लागत का भार वह अपने उपभोक्ताओं पर डालेगा. इस संबंध में कोयला मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर दी है.

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Just Transition News : झारखंड के लोगों के लिए बंद पड़ी कोयला खदानें कितनी खतरनाक हैं और इनका क्लोजर कितना जरूरी है, इस बात को झारखंड सरकार भी अब पूरी तरह समझ गयी है और झारखंड के वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने इस मामले को लेकर अपनी चिंता केंद्र सरकार के सामने उजागर कर दी है.

प्री बजट मीटिंग में हुई चर्चा

वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव ने दिल्ली में आयोजित प्री बजट मीटिंग में केंद्र सरकार के सामने अपनी यह चिंता जतायी है. साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार को यह जानकारी भी दी है कि किस तरह कोल कंपनियों द्वारा बंद खदानों का माइंस क्लोजर नहीं करने की वजह से राज्य के लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है. बंद पड़ी खदानें ना सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि इनकी वजह से कई दुर्घटनाएं भी हो रही हैं.

जस्ट ट्रांजिशन की सख्त जरूरत

वित्तमंत्री की इस मांग के बाद अगर केंद्र सरकार कोल कंपनियों से माइंस क्लोजर की प्रक्रिया अच्छे से निभाने को कहती हैं तो यह एक बेहतर कदम होगा. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि अगर ऐसा हुआ तो जस्ट ट्रांजिशन की सख्त जरूरत होगी.

खदानें बंद हुईं तो ग्राहकों पर होगा असर

इधर कोल इंडिया का इस बारे में यह कहना है कि अगर उसे खदान बंद करना पड़ा तो उसके लागत का भार वह अपने उपभोक्ताओं पर डालेगा. इस संबंध में कोयला मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर दी है, जिसके तहत कोल इंडिया को यह छूट मिली हुई है कि वह माइंस क्लोजर के खर्चे का भार अपने ग्राहकों पर डाल दे. अगर कोल इंडिया से ऐसा किया तो वह प्रति टन के हिसाब से अपने ग्राहकों से अतिरिक्त शुल्क वसूलेगी. हालांकि अभी तक कोल इंडिया ने इस संबंध में कोई निर्णय नहीं किया है, लेकिन जल्दी ही वो इस मसले पर फैसला कर सकता है. कोल इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने मार्च 2022 में खदान बंद करने के लिए 494 करोड़ रुपये खर्च किये.

बंद खदानों की वजह से होती हैं कई दुर्घटनाएं

झारखंड में बंद पड़ी खदानों की वजह से कई दुर्घटनाएं आये दिन होती रहती हैं. जहां जान व माल की हानि होती है. कई बार अवैध खनन के दौरान दुर्घटना होती है और जमीन धंसने से कई लोगों की जान जा चुकी है. सही तरीके से माइंस क्लोजर नहीं होने की वजह से ओवर बर्डन के ढेर की वजह से भी प्रदूषण फैलता है और लोगों को सांस संबंधी परेशानी देखने को मिलती है. झारखंड में वायु प्रदूषण के कारकों में से सबसे प्रमुख कारक है ओपन कास्ट माइंस. जानकारी के मुताबिक धनबाद और रामगढ़ जैसे जिले में अंडरग्राउंड माइंस बंद हो रहे हैं. इनकी जगह पर ओपनकास्ट माइंस को सीसीएल, बीसीसीएल और ईसीएल प्राथमिकता दे रहे हैं. सीसीएल की वेबसाइट के अनुसार कुल 43 माइंस यहां हैं जिसमें से पांच अंडरग्राउंड और 38 ओपनकास्ट हैं. झारखंड में पिछले कुछ सालों में सौ से अधिक खदान बंद हो गये हैं, जिनमें से अधिकतर अंडरग्राउंड माइंस हैं.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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