Energy Transition : जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह बन रहे हैं घटते जंगल, कोयले का खनन बना बड़ी वजह

2019 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह बताया गया कि झारखंड में 110 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ गया है. लेकिन सच्चाई यह है कि वन क्षेत्र तो बढ़ा है, लेकिन राज्य में घने जंगल घट गये हैं.
झारखंड में सौर ऊर्जा नीति जुलाई महीने में दोबारा लाॅन्च की गयी, इससे पहले वर्ष 2015 में सरकार ने सौर ऊर्जा नीति की घोषणा की थी. हालांकि अब तक प्रदेश में सौर ऊर्जा नीति पर गंभीरता से काम नहीं हो पाया है, जिसकी वजह से एनर्जी ट्रांजिशन अभी तक दूर की कौड़ी बना हुआ है. लेकिन 19 सितंबर को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक बार फिर वैकल्पिक ऊर्जा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और कहा कि हर जिले में 20 मेगावाट का सोलर पावर प्लांट लगाने के लिए 60 से 100 एकड़ जमीन चिह्नित की जाये. साथ ही सभी जिलों के हर गांव में कम से कम पांच योजनाएं लागू करने का निर्देश भी दिया है. इसे सौर ऊर्जा नीति के कार्यान्वयन की ओर एक कदम माना जा सकता है.
झारखंड में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत कोयला है. 90 प्रतिशत तक बिजली का उत्पादन ताप विद्युत परियोजनाओं के जरिये ही होता है. ऐसे में यह जगजाहिर है कोयले का खनन भी प्रदेश में व्यापक स्तर पर होता है. कोयला उत्पादन के मामले में झारखंड देश में चौथे स्थान पर है. पहले स्थान पर छत्तीसगढ़, दूसरे पर ओडिशा, तीसरे पर मध्यप्रदेश और चौथे पर झारखंड है. बावजूद इसके झारखंड की महत्ता कोयला उत्पादन को लेकर देश में सबसे ज्यादा है. वजह यह है कि देश में कोकिंग कोल का 99.11 प्रतिशत उत्पादन झारखंड में होता है. 2020-21 में कोकिंग कोल का 44.787 एमटी उत्पादन हुआ जिसमें 44.387 एमटी उत्पादन झारखंड में हुआ. कोकिंग कोल का इस्तेमाल स्टील के उत्पादन में होता है इसलिए इसका महत्व बहुत अधिक है.
आम आदमी की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है, लेकिन इसका दुष्प्रभाव प्रकृति पर साफ नजर आ रहा है. कोयला खनन की वजह से एक ओर जहां प्रदूषण का खतरा ही जा रहा है, वहीं जंगल -पहाड़ों के कटने और कम होने से जलवायु परिवर्तन का खतरा ना सिर्फ बढ़ रहा है, बल्कि साफ तौर पर मानव समाज इससे रूबरू है. बेमौसम बरसात से एक ओर कहीं सुखाड़ की स्थिति रहती है, तो दूसरी ओर बाढ़ की स्थिति बनी रहती है.
2019 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह बताया गया कि झारखंड में 110 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ गया है. लेकिन सच्चाई यह है कि वन क्षेत्र तो बढ़ा है, लेकिन राज्य में घने जंगल घट गये हैं. 2019 के सर्वे में झारखंड में घना वन क्षेत्र 2603.2 वर्ग किमी था. यह 2021 के सर्वे में 2601.05 वर्ग किमी हो गया है. करीब दो वर्ग किमी की कमी आयी है. पूरे राज्य में सबसे अधिक वन क्षेत्र गढ़वा में बढ़ा है. वहीं पाकुड़, लोहरदगा, लातेहार और कोडरमा में वन क्षेत्र घटा है. 2021 के सर्वे के अनुसार झारखंड के क्षेत्रफल के 29.76% में जंगल है. 2019 में यह 29.62% था.
पर्यावरणविद् और जियोलाॅजी के प्रोफेसर डाॅ नीतीश प्रियदर्शी का कहना है कि कोयले का खनन बढ़ने से जंगलों पर असर पड़ता है, क्योंकि उनकी कटाई करके ही खनन होता है. साथ ही पहाड़ों को भी काटा जाता है. खनन क्षेत्रों में धूल की मात्रा अत्यधिक होती है, जिससे वायु प्रदूषण फैलता है और फेफड़े की गंभीर बीमारियां होती हैं. साथ ही यह भूमि को बंजर कर सकता है एवं हवा- पानी को प्रदूषित कर सकता है. प्रदूषण का असर जंगलों पर भी साफ नजर आता है. यह स्थिति मानव जीवन और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है.
हाल ही में एक रिपोर्ट आयी थी, जिसने स्पष्ट तौर पर यह माना था कि महिलाओं के लिए वायु प्रदूषण बहुत बड़ा खतरा है. वायु प्रदूषण की वजह से महिलाओं में बांझपन तक का खतरा बढ़ा है. कोयला आधारित बिजली संयंत्रों ने झारखंड की कितनी कृषि योग्य भूमि को नुकसान पहुंचाया इसका आकलन मुश्किल जरूर है, लेकिन यह एक सच्चाई है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.
ऊर्जा ट्रांजिशन इस सदी की डिमांड बन चुका है. पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन से बचाने के लिए शून्य-कार्बन उत्सर्जन की ओर लेकर जाना होगा. पीएम मोदी ने यह वादा भी किया है कि 2070 तक देश में शून्य उत्सर्जन होगा. इस स्थिति तक पहुंचने के लिए झारखंड सरकार को सौर ऊर्जा नीति के सौ सोलर विलेज की ओर जल्दी बढ़ना होगा. सीएम हेमंत सोरेन ने जो पहल की है, उम्मीद की जानी चाहिए कि में वह क्रांतिकारी पहल होगा.
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By रजनीश आनंद
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.
राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.
रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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