COVID 19 की रोकथाम में कारगर हैं ये मास्क जानें इनकी खूबी और सीमाएं…

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COVID 19 की रोकथाम में कारगर हैं ये मास्क जानें इनकी खूबी और सीमाएं…

COVID 19 These masks are effective in preventing coronavirus know their strengths and limitations : COVID 19 के दौर में मास्क बचाव के सबसे कारगर हथियार के रूप में सामने आया है. डॉक्टर्स भी इस बात की सलाह दे रहे हैं कि कोरोना वायरस से बचाव के लिए मास्क पहनना बहुत जरूरी है. यही कारण है कि आज बाजार में कई तरह के मास्क उपलब्ध हैं, ऐसे में आम लोगों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि उनके लिए कौन सा मास्क सबसे बेहतर है और जो उनकी कोरोना वायरस से रक्षा कर सकता है.

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COVID 19 के दौर में मास्क बचाव के सबसे कारगर हथियार के रूप में सामने आया है. डॉक्टर्स भी इस बात की सलाह दे रहे हैं कि कोरोना वायरस से बचाव के लिए मास्क पहनना बहुत जरूरी है. यही कारण है कि आज बाजार में कई तरह के मास्क उपलब्ध हैं, ऐसे में आम लोगों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि उनके लिए कौन सा मास्क सबसे बेहतर है और जो उनकी कोरोना वायरस से रक्षा कर सकता है.

अमेरिका की नेशनल इंस्टीट्‌यूट फॉर अॅाक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ ने मास्क को तीन कैटेगरी में विभाजित किया है. जिनके प्रतीक के रूप में एन, आर और पी शब्द का प्रयोग किया जाता है. एन का अर्थ है- यह मास्क डॉपलेट से सुरक्षा तो करता है, लेकिन यह तेल में कारगर नहीं है. जबकि आर कैटेगरी के मास्क तेल में भी कारगर हैं, लेकिन यह मास्क सिर्फ आठ घंटे काम करता है और इसका प्रयोग दोबारा नहीं किया जा सकता है. पी श्रेणी के मास्क में भी यही बात लागू होती है कि इसे दोबारा इस्तेमाल करने में समय सीमा का ध्यान रखना होता है.

डॉक्टर्स के अनुसार एन-95 मास्क को कोरोना वायरस से बचाव के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है. एन-95 मास्क की खूबी यह है कि यह 0.3 व्यास वाले सूक्ष्म कणों को भी श्वास में जाने से रोकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ड्रॉपलेट फॉर्म में कोरोना वायरस का आकार 0.5 से भी बड़ा होता है, इसलिए यह मास्क कोरोना वायरस से बचाव में सबसे उपयुक्त होता है.

एन-95 और केएन-95 मास्क 0.3 व्यास वाले सूक्ष्म कणों को 95 प्रतिशत तक रोकते हैं. एन-95 मास्क का निर्माण अमेरिका में हुआ है, जबकि केएन 95 मास्क चीन की देन है. केएन 95 मास्क को फिटनेस टेस्ट कराना होता है, जबकि केएन 95 मास्क के साथ ऐसा नहीं है. एन-95 मास्क सांस लेने और छोड़ने में केएन-95 से ज्यादा सुविधाजनक है. एन-99 मास्क इस बात का दावा करता है कि वह एयरबॉर्न सूक्ष्म कणों को 99 प्रतिशत तक रोकता है, हालांकि तैलीय कणों को रोकने में यह मास्क सक्षम नहीं है, क्योंकि वे फिसलते हैं.

यह तो बात हुई एन-95 और केएन-95 की. लेकिन सामान्य और सर्जिकल मास्क भी कोरोना वायरस के इंफेक्शन से हमें बचा सकता है. अगर कोविड 19 का मरीज और उसके संपर्क में आने वाले लोग दोनों ही मास्क लगाकर रखें, तो इंफेक्शन की आशंका की संभावना बहुत कम होती है. हालांकि इस बात का दावा तो नहीं किया गया है कि कपड़े के मास्क या सर्जिकल मास्क से कोविड 19 में कितना बचाव होता है.

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मास्क पहनते समय इस बात का खास ख्याल रखें कि आपका हाथ साफ हो. मास्क पहनने से पहले हाथ साबुन से धो लें, उसके बाद मास्क पहनें. मास्क पहनते वक्त यह ध्यान दें कि आपके चेहरे और मास्क में ज्यादा गैप ना हो. अगर आपके पास मास्क ना हो तो किसी दुपट्टे या गमछे से भी मुंह को बांधा जा सकता है, ताकि इंफेक्शन फैलने की आशंका कम हो. कोरोना काल में कई डिजाइनर मास्क भी बाजार में उपलब्ध हैं, जिनका प्रयोग किया जा रहा है.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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