घर लौट रहे झारखंड-बिहार के मजबूर प्रवासी श्रमिकों की रोंगटे खड़ी कर देने वाली कहानियां

बरही (हजारीबाग) : कोरोना वायरस के संकट ने कामगारों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है. रोजी-रोटी कमाने के लिए घर से निकला हर शख्स इस वक्त अपने घर पहुंचने की जल्दी में है. सरकार और प्रशासन के लिए ये लोग कोरोना कैरियर हो सकते हैं, लेकिन इनका अपना दर्द है. जब आप इनकी कहानी सुनेंगे, तो यकीनन आपके भी रोंगटे खड़े हो जायेंगे.
बरही (हजारीबाग) : कोरोना वायरस के संकट ने कामगारों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है. रोजी-रोटी कमाने के लिए घर से निकला हर शख्स इस वक्त अपने घर पहुंचने की जल्दी में है. सरकार और प्रशासन के लिए ये लोग कोरोना कैरियर हो सकते हैं, लेकिन इनका अपना दर्द है. जब आप इनकी कहानी सुनेंगे, तो यकीनन आपके भी रोंगटे खड़े हो जायेंगे.
हजारीबाग जिला के बरही चौक पर सुबह से शाम तक लोगों का रेला जाता दिख जाता है. ये सभी प्रवासी मजदूर हैं. कोई आस-पास के जिले से अपने घर पहुंचने की जल्दबाजी में है, तो कोई कई राज्यों की सीमा लांघकर झारखंड पहुंचा है. और अब अपने गांव, अपने लोगों के बीच पहुंच जाने को बेताब है.
बरही चौक पर आप खड़े हो जायेंगे, तो पायेंगे कि कई लाचार पिता अपने बच्चे को पैदल लेकर चले जा रहा है, तो कोई मां दुधमुंहे बच्चे को गोद में चलती जा रही है. ट्रकों में भर-भरकर भी लोग आ रहे हैं. मानो इंसान नहीं, मवेशी हों. इस वक्त इनकी जिंदगी किसी भेड़-बकरी से भी बदतर हो गयी है.
बरही चौक पर ‘प्रभात खबर’ ने ऐसे ही कुछ मजबूर लोगों से बात की, तो इन लोगों में कई ऐसे मिले, जिन्होंने कहा कि अब कभी कमाने के लिए परदेस नहीं जायेंगे.
बरही प्रखंड के गुड़ियो विजिया निवासी दामोदर पंडित, अनिल पंडित, राहुल पंडित, दुलारी देवी गुजरात के सूरत से 18 मई की रात ट्रेन से देवघर जिला के जसीडीह स्टेशन पहुंचे. 19 मई, 2020 को झारखंड सरकार की बस ने इन सभी को बरही पहुंचाया. ये सभी लोग गुजरात के भरुच में एक कपड़ा फैक्ट्री में सिलाई का काम करते थे. लॉकडाउन के बाद न तो कंपनी ने इनकी कोई मदद की, न ही गुजरात सरकार ने. झारखंड-बिहार से जुड़ी हर Latest News in Hindi से अपडेट रहने के लिए बने रहें हमारे साथ.
बिहार के नवादा के रहने वाले मुकेश तिवारी, बलदेव तिवारी, त्रिभुवन सिंह अहमदाबाद में एक आयरन फैक्ट्री में काम करते थे. ये लोग जिस फैक्ट्री में काम करते थे, उसका मालिक रसूख वाला था. लॉकडाउन के बाद भी उनसे फैक्ट्री में काम ले रहा था, लेकिन वेतन नहीं दे रहा था. वेतन का बकाया दिलाने में वहां की सरकार ने कोई मदद नहीं की. पुलिस के पास शिकायत लेकर गये, तो डंडे खाने पड़े.
बरही के कारीमाटी गांव के 30 लोग बेंगलुरु (कर्नाटक) के शहरी इलाके में मशीन चलाने का काम करते थे. इन लोगों ने 1.20 लाख रुपये देकर एक ट्रक किराये पर लिया. उससे बरही लौटे. चार हजार रुपये प्रति मजदूर के हिसाब से ट्रक वाले ने 60 लोगों को ठूंस-ठूंस कर बैठाया. बिरजू कुमार यादव, उमेश कुमार यादव, मुकेश यादव समेत अन्य लोग थे. गायत्री देवी ने बताया कि 15 मई की रात हमलोग किसी तरह भूखे वहां से निकल गये.
कोडरमा का रहने वाला संदीप तुरी महाराष्ट्र व गुजरात की सीमा पर वन क्षेत्र में स्थित एक होटल में बर्तन धोने का काम करता था. मां सारो देवी, दो बहनों एवं मामी को लेकर वह किसी तरह वहां से ट्रक से बरही पहुंचा. उसने लॉकडाउन में जो मुसीबतें झेली हैं, उसके बारे में पूछने पर कहा कि अब गांव छोड़कर कहीं दूसरे प्रदेश में धक्के खाने नहीं जायेगा.
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