थिएटर्स में 'फुल टू धमाल' एंटरटेनमेंट का नया दौर, सालों बाद बड़े पर्दे पर लौटी असली देसी कॉमेडी की रौनक!
Published by : Pritish Sahay Updated At : 04 Jun 2026 9:38 PM
Hai Jawani Toh Ishq Hona Hai
Hai Jawani Toh Ishq Hona Hai: डेविड धवन की फिल्म 'है जवानी तो इश्क होना है' शुद्ध मनोरंजन, सिचुएशनल कॉमेडी और फैमिली ड्रामा का शानदार मिश्रण है. वरुण धवन, मृणाल ठाकुर और पूजा हेगड़े की दमदार मौजूदगी से सजी यह फिल्म हंसी, रोमांस और भावनाओं का ऐसा पैकेज पेश करती है, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है.
- फिल्म रिव्यू : है जवानी तो इश्क होना है
- सिनेमास्कोप रेटिंग: (4/5 स्टार)
- कैप्टन ऑफ द शिप: डेविड धवन
- बैनर एवं प्रोडक्शन: टिप्स फिल्म्स
- कास्टिंग क्रू: वरुण धवन, मृणाल ठाकुर, पूजा हेगड़े, मनीष पॉल, जिमी शेरगिल, मौनी रॉय एवं पूरी पलटन
Hai Jawani Toh Ishq Hona Hai: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ गिने-चुने निर्देशक ही ऐसे हुए हैं जो दर्शकों की नब्ज पहचानते हैं. इस वीकेंड बड़े पर्दे पर उतरी फिल्म ‘है जवानी तो इश्क होना है’ इसका सबसे ताजा उदाहरण है. यह फिल्म महज बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिए नहीं बनी, बल्कि इसका असली मकसद सिनेमाघरों में छाए सन्नाटे को ठहाकों की गूंज से बदलना है. निर्देशक डेविड धवन ने अपनी उसी पुरानी, सुपरहिट विंटेज शैली को दोबारा जीवित किया है, जिसने कभी पूरे देश को दीवाना बनाया था. लेकिन इस बार, कहानी की पैकेजिंग में 2026 के युवाओं का नया स्वैग, ट्रेंडी लाइफस्टाइल और आधुनिक रंग घोला गया है. थिएटर से बाहर निकलते वक्त हर दर्शक के चेहरे पर खिली बड़ी सी मुस्कान यह बताने के लिए काफी है कि शुद्ध देसी मनोरंजन की तलाश अब खत्म हो चुकी है.
सिचुएशनल कॉमेडी की मास्टरक्लास: कन्फ्यूजन का ऐसा खेल जो थकने नहीं देता
फिल्म की कहानी का ताना-बाना किसी ऐसी भूलभुलैया की तरह बुना गया है, जिसमें दर्शक एक बार दाखिल होता है तो बस हंसता ही चला जाता है. डेविड धवन को महारत हासिल है कि वे मामूली सी गलतफहमी को भी स्क्रीन पर एक बड़े उत्सव में बदल देते हैं. ‘मिस्टेकन आइडेंटिटी’ और ‘क्रिस-क्रॉस’ संवादों का जो सिलसिला पहले हाफ से शुरू होता है, वह सेकेंड हाफ के क्लाइमेक्स तक दर्शकों को बांधकर रखता है.
इस पूरी मजेदार उथल-पुथल की सबसे बड़ी खूबी इसकी बेजोड़ पेसिंग है. स्क्रीनप्ले में दृश्यों को इतनी तेजी और सफाई से बदला गया है कि आपको बोर होने का एक सेकंड भी नहीं मिलता. राहत की बात यह है कि इस पागलपंती के बीच निर्देशक अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं; कहानी में पारिवारिक मूल्यों, दोस्ती के फर्ज और नई उम्र की मासूम मोहब्बत को बहुत ही सलीके से पिरोया गया है. यही वजह है कि यह फिल्म सिर्फ एक लाफ्टर शो न रहकर एक बेहतरीन इमोशनल फैमिली ड्रामा भी बन जाती है.
वरुण धवन का वन-मैन शो और फीमेल लीड्स का स्क्रीन-चार्म
एक्टिंग के मोर्चे पर यह फिल्म पूरी तरह से वरुण धवन के नाम रही है. जैसे ही वे स्क्रीन पर आते हैं, थिएटर की ऊर्जा का स्तर अचानक कई गुना बढ़ जाता है. उनके चेहरे के एक्सप्रेशंस, लाउड डायलॉग डिलीवरी और कॉमिक टाइमिंग से साफ झलकता है कि वे इस जॉनर के कितने माहिर खिलाड़ी हैं. वरुण ने अपनी पुरानी परफॉर्मेंस के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए खुद को इस दौर का सबसे भरोसेमंद एंटरटेनर साबित कर दिया है.
वहीं, फिल्म की दोनों लीड अभिनेत्रियों—मृणाल ठाकुर और पूजा हेगड़े ने स्क्रीन पर संतुलन बनाने का बेहतरीन काम किया है. मृणाल ठाकुर ने अपनी भूमिका में एक बेहद प्यारी सादगी, ठहराव और संजीदगी दिखाई है, जो दिल जीत लेती है. दूसरी तरफ, पूजा हेगड़े ने अपने लाजवाब ग्रेस, स्टाइल और गजब के आत्मविश्वास से फिल्म के ग्लैमर कोशेंट को काफी ऊपर उठा दिया है. जब ये तीनों कलाकार एक साथ किसी फ्रेम में नजर आते हैं, तो उनकी आपसी ट्यूनिंग से परदे पर एक अलग ही रौनक बिखर जाती है.
सपोर्टिंग कास्ट का पावर पंच: मनीष पॉल और जिमी शेरगिल की कमाल की टाइमिंग
डेविड धवन के सिनेमा की यह हमेशा से रीढ़ रही है कि उनकी फिल्मों के सह-कलाकार भी मुख्य अभिनेताओं जितने ही मजबूत होते हैं. मनीष पॉल ने इस फिल्म में कॉमेडी का ऐसा समां बांधा है कि उनकी हर एंट्री पर थिएटर में तालियां और सीटियां बजने लगती हैं. उनकी वन-लाइनर डिलीवरी बेमिसाल है. जिमी शेरगिल ने अपने खास गंभीर लेकिन मजाकिया अंदाज से कहानी को एक जरूरी और ठोस वजन दिया है.
सरप्राइज पैकेज के रूप में मौनी रॉय ने एक छोटा लेकिन बेहद असरदार और टर्निंग पॉइंट वाला किरदार निभाया है, जो लंबे समय तक याद रहता है. चंकी पांडे, अली असगर, राजेश कुमार और राकेश बेदी जैसे अनुभवी सितारों की टोली ने मिलकर स्क्रीन पर मनोरंजन का ऐसा तड़का लगाया है कि कोई भी दृश्य धीमा या कमजोर महसूस नहीं होता.
रंगों का भव्य विजुअल ट्रीट और पुराने दिनों की म्यूजिकल यादें
तकनीकी तौर पर फिल्म का हर एक फ्रेम किसी बड़े कैनवास जैसा खूबसूरत नजर आता है. सिनेमैटोग्राफर अयानका बोस ने डेविड धवन के विजन को पूरी तरह समझते हुए पूरी फिल्म को ब्राइट, नयन-सुखद और वाइब्रेंट कलर्स के साथ शूट किया है. फरहाद सामजी और सजावल युनुस के लिखे चुटीले और नए जमाने के मुहावरों से सजे संवाद सीधे युवाओं की जुबान पर चढ़ने की काबिलियत रखते हैं.
संगीत इस पूरी फिल्म का एक और सबसे बड़ा मजबूत पक्ष है. तनिष्क बागची और व्हाइट नॉइज़ कलेक्टिव की पूरी कंपोजर्स टीम ने मिलकर ऐसा साउंडट्रैक तैयार किया है जो फिल्म की कहानी की रफ्तार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है. फिल्म का असली टर्निंग पॉइंट वो लम्हा है जब अनु मलिक और शंकर महादेवन की जुगलबंदी वाला आइकॉनिक रीक्रिएटेड टाइटल ट्रैक थिएटर्स के साउंड सिस्टम पर गूंजता है. वह सीन दर्शकों को सीधे 90 के दशक के सुनहरे दौर की याद दिला देता है. रेमो डिसूजा और बोस्को-सीज़र की कोरियोग्राफी ने गानों में एक अलग स्तर का स्वैग फूंक दिया है.
फुर्सत का सिनेमा: क्यों यह फिल्म जल्दबाजी का शिकार नहीं होती?
इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसका सहज और फुर्सत भरा स्क्रीनप्ले अरेंजमेंट है. निर्देशक ने कॉमिक सीन्स, किरदारों की मस्ती और डांस नंबर्स को स्क्रीन पर फैलने का पूरा मौका दिया है. यह खास अंदाज फिल्म को किसी हड़बड़ी वाले प्रोजेक्ट के बजाय एक मुकम्मल थियेट्रिकल एक्सपीरियंस बनाता है, जहां दर्शक टिकट के एक-एक पैसे का पूरा वसूल महसूस करता है और हर सीन का आनंद ले पाता है.
बॉक्स ऑफिस वर्डिक्ट (निष्कर्ष)
‘है जवानी तो इश्क होना है’ खुशियों और ठहाकों का एक ऐसा मुकम्मल गुलदस्ता है, जिसे आपको इस वीकेंड बिल्कुल मिस नहीं करना चाहिए. यह फिल्म इस बात का जिंदा सुबूत है कि जब बड़े पर्दे पर साफ-सुथरा और शुद्ध मनोरंजन परोसने की नीयत हो, तो सिनेमा कितना जादुई हो सकता है. दुनिया भर की चिंताओं और तनाव को कुछ घंटों के लिए भूल जाइए, अपने माता-पिता, बच्चों और दोस्तों की टोली बनाइए और नजदीकी सिनेमाघरों में जाकर इस शानदार, विजुअल और म्यूजिकल ट्रीट का पूरा लुत्फ उठाइए. डेविड धवन की यह भव्य वापसी सिनेमाप्रेमियों के लिए किसी बड़े तोहफे से कम नहीं है!
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By Pritish Sahay
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