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Forensic Review: मामला बोझिल हो गया है, पढ़ें विक्रांत मैस्सी और राधिका आप्टे की फिल्म का रिव्यू

Updated at : 25 Jun 2022 6:36 PM (IST)
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Forensic Review: मामला बोझिल हो गया है, पढ़ें विक्रांत मैस्सी और राधिका आप्टे की फिल्म का रिव्यू

Forensic Review: फ़िल्म छोरी फेम निर्देशक विशाल फुरिया इस बार ओटीटी प्लेटफार्म के लिए थ्रिलर कहानी फॉरेंसिक के लिए लेकर आए हैं.फॉरेंसिक मलयालम फ़िल्म का हिंदी रीमेक है.

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फ़िल्म-फॉरेंसिक

निर्देशक- विशाल फुरिया

कलाकार- विक्रांत मैस्सी, राधिका आप्टे,रोनित रॉय,अनंत महादेवन,प्राची देसाई और अन्य

प्लेटफॉर्म-ज़ी फाइव

रेटिंग-डेढ़

फ़िल्म छोरी फेम निर्देशक विशाल फुरिया इस बार ओटीटी प्लेटफार्म के लिए थ्रिलर कहानी फॉरेंसिक के लिए लेकर आए हैं.फॉरेंसिक मलयालम फ़िल्म का हिंदी रीमेक है. उम्मीद थी कि थ्रिलर और क्राइम जॉनर वाली इस फ़िल्म में फॉरेंसिक यानी वैज्ञानिक तकनीकी और तरीकों के मेल से एक दिलचस्प कहानी परदे पर दिखेगी लेकिन परदे पर जो कुछ भी नज़र आया है .वह ना सिर्फ अनरियल है बल्कि मामला बोझिल भी कर गया है.

बच्चियों के मर्डर मिस्ट्री की है कहानी

भारत के पहाड़ी इलाके पिछले कुछ समय ओटीटी प्लेटफार्म की थ्रिलर फिल्मों और सीरीज के लिए सबसे पसंदीदा जगह बनें हुए हैं,फॉरेंसिक की कहानी पहाड़ों की रानी मसूरी के बैकड्रॉप पर आधारित है. जहां एक -एक बाद बच्चियां अपने जन्मदिन पर गायब होने लगती है.जिसके बाद उनके घरवालों को उनकी लाश ही मिलती है.इस केस को सुलझाने की जिम्मेदारी सब इन्स्पेक्टर मेघा(राधिका आप्टे) और फॉरेंसिक एक्सपर्ट जॉनी खन्ना (विक्रांत) को मिलती है. इनका एक अपना अतीत भी है.क्या है वह अतीत? क्या वह अतीत आज के वर्तमान से जुड़ा है.क्या मसूरी में बच्चियों की हत्या का यह सिलसिला रुक पाएगा.यह सब सवाल आगे की कहानी में है.

कहानी और प्रस्तुति दोनों है अनरियल

थ्रिलर का पहला भाग दिलचस्प है और काफी संभावनाएं भी नज़र आती है.फ़िल्म अपने फर्स्ट में भारत के सबसे युवा सीरियल किलर अमरजीत सादा का जिक्र करती है. बच्चें अपराध की अंधी दुनिया में किस तरह से दाखिल हो रही है.फ़िल्म का फर्स्ट हाफ कुछ इस तरह से बिल्डअप किया गया लेकिन सेकेंड हाफ में कहानी औंधे मुंह गिर पड़ती है.जो कुछ भी परदे पर दिखाया जा रहा है .वह बेहद बचकाना सा लगता है. बेसिर पैर का जैसे परदे पर कुछ चल रहा है. फॉरेंसिक शीर्षक है,तो कहानी में अलग अलग तरह की टर्म्स और टेक्नोलॉजी का जमकर इस्तेमाल हुआ हैं लेकिन कुछ वक्त के बाद वह कहानी में ज़बरदस्ती थोपे हुए से लगते हैं,जैसे कहानी को उनकी जरूरत नहीं थी, बल्कि उनका इस्तेमाल करना है इसलिए कहानी में वैसे सिचुएशन जोड़ दिए गए हैं.

सिर्फ विक्रांत के अभिनय ने फ़िल्म को है संभाला

इस फ़िल्म में अभिनय के कई भरोसेमंद नाम जुड़े है,लेकिन विक्रांत को छोड़कर कोई भी प्रभावी नहीं बन पाया है . राधिका आप्टे इस बार थोड़ी लाउड हो गयी हैं.प्राची देसाई के किरदार में जैसे ही अलग-अलग शेड्स जुड़ते हैं,उनका अभिनय स्क्रीन पर कमज़ोर होता चला गया है. प्राची देसाई के मेकअप पर थोड़ा काम करने की ज़रूरत थी.अनंत महादेवन के लिए फ़िल्म में करने को कुछ खास नहीं था.फॉरेंसिक इस टर्म का इस्तेमाल ज़्यादातर भारतीय दर्शकों ने सीआईडी टीवी शो में केस के सॉल्व करते हुए देखा था तो इसमें सीआईडी फेम सालुंके भी हैं.उनकी मौजूदगी फ़िल्म में भले ही कुछ खास एड नहीं कर पायी है,लेकिन उनको देखकर चेहरे पर स्माइल ज़रूर आ जाती है.

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देखें या नहीं देखें

अगर आपके पास टाइमपास करने को कुछ नहीं है, तो यह फ़िल्म देखने का रिस्क आप उठा सकते हैं.

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कोरी

लेखक के बारे में

By कोरी

कोरी is a contributor at Prabhat Khabar.

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