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Exclusive: कोई आपको कामयाब होते नहीं देखना चाहता है, सभी आपको गिराना चाहते हैं- सोनू सूद

Updated at : 31 May 2022 7:47 AM (IST)
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Exclusive: कोई आपको कामयाब होते नहीं देखना चाहता है, सभी आपको गिराना चाहते हैं- सोनू सूद

अक्षय कुमार की फिल्म सम्राट पृथ्वीराज में सोनू सूद अहम रोल निभा रहे हैं. इस फिल्म से मानुषी छिल्लर बॉलीवुड में डेब्यू कर रही है. सोनू सूद ने फिल्म और अपने किरदार के बारे में बात की.

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Samrat Prithviraj: अभिनेता सोनू सूद (Sonu Sood) फ़िल्म सम्राट पृथ्वीराज (Samrat Prithviraj) में चंदरबरदाई की अहम भूमिका में नज़र आएंगे. अपने करियर की इस नयी इनिंग में सोनू की प्राथमिकता पॉजिटिव किरदारों को करने की है. उनके फिल्मी करियर, सोशल वर्क, उससे जुड़े विवादों सहित कई मुद्दों पर उर्मिला कोरी की हुई बातचीत.

फ़िल्म सम्राट पृथ्वीराज कैसे आपको मिली?

मुझे लगता है कि आप फिल्मों को नहीं चुनते हैं ,बल्कि फिल्में आपको चुनती हैं. आप हमेशा अच्छी फिल्मों का हिस्सा बनना चाहते हैं. कोई लेखक कोई कहानी लिखता है और उसी समय ये तय हो जाता है कि वो किसके पास जाना है. जब डॉक्टर साहब(चंद्र प्रकाश द्विवेदी)ने कहा कि मैं चाहता हूं कि आप चंद्र का किरदार करें क्योंकि जब वो इस किरदार को लिख रहे थे तो उनके जेहन में मैं ही था. उनकी बात को सुनकर मैं बहुत उत्साहित हुआ. उनको इतिहास की जानकारी बहुत है. इस फ़िल्म में अपने किरदार के गेटअप लेने में मुझे 4 घंटे जाते थे. उसी दौरान किरदार से जुड़ी मेरी आधी तैयारी हो जाती थी.

फ़िल्म सम्राट पृथ्वीराज की खासियत आपको क्या लगी?

मेरी मां इतिहास और इंग्लिश की प्रोफेसर रही हैं, उनसे मैंने काफी कहानी सुनी थी पृथ्वीराज और चंद्रबरदाई के बारे में, लेकिन कभी ऐसा नहीं सोचा था कि आगे चल कर यह किरदार निभाने का मौका मिलेगा. चंद्रबरदाई का पृथ्वीराज की जिंदगी में काफी महत्वपूर्ण स्थान था, वह एक कवि भी थे, दोस्त भी थे और एक एस्ट्रोलॉजर भी थे, वह कह देते थे कि युद्ध होगा, तो युद्ध होता ही था, नहीं कहते थे, तो नहीं होता था. यह जो इंसान है, वह भविष्य देख सकता है. यह सब जो फिल्मों में दिखाया गया है, वह कमाल की बात है और मुझे लगता है कि आज की जेनरेशन को यह सब कुछ दिखाया जाना चाहिए. पहले हमें माता-पिता कहानियां सुनाते थे, अब बच्चे सोशल मीडिया के जरिये अपनी कहानी देख लेते हैं, ऐसे में हमने फिल्म के बहाने कहानी कहने की कोशिश की है.

जब चंद्रबरदाई भविष्य देख सकते थे तो उन्होंने पृथ्वीराज को क्यों नहीं युद्ध के लिए मना किया था?

वही देखने वाली बात होगी. मैं बता दूंगा तो फ़िल्म का मज़ा किरकिरा हो जाएगा. फ़िल्म में उसका जवाब दिया गया है. वह फ़िल्म की एक अहम यूएसपी है.

इस फ़िल्म को लेकर तैयारियों की बात करें तो क्या नया सीखना पड़ा,संस्कृत बोलना कितना मुश्किल था?

इंजीनियरिंग की पढ़ाई काम आती है. याद कर लेता हूं सब. यहां तो फिर हिंदी है मैंने तो साउथ की फिल्मों में काम किया है. जहां की भाषा बिल्कुल नहीं आती थी.

यह यशराज बैनर के साथ आपकी पहली फ़िल्म हैं?

जी हां,23 साल लगे मुझ तक उनको पहुंचने में. एक बार और एक फ़िल्म मुझे आफर आयी थी, लेकिन उस वक़्त मुझे वो रोल ज़्यादा अपील नहीं कर पाया था, तो मैंने ना कर दिया था. जेहन में ये बात भी आयी थी कि ये लोग अब मुझे दुबारा नहीं बुलाएंगे.

आपने अभी बताया कि 23 साल का इतंजार करना पड़ा ,उतार चढ़ाव से भरी फिल्मों की जर्नी को किस तरह से देखते हैं?

आप जब मुंबई में बिना किसी पहचान और माई बाप के आते हैं, तो आप तैयार होकर आते हैं कि आपको फिल्में मिलने में परेशानी होगी, स्ट्रगल करना होगा. धक्के खाने पड़ेंगे. मैं इंजीनियर था, पता था जब आप एक नॉन फ़िल्म बैकग्राउंड से आते हैं ,जिसमें कोई आपको जानता नहीं है ,तब बहुत सारी रिजेक्शन होगी. वो लोग आपको नीचे खींचना चाहेंगे,जिनको आप जानते भी नहीं है. कोई आपको कामयाब देखना नहीं चाहता है, लेकिन दुख की बात है कि हमें इसी दुनिया में रहना पड़ता है. आईडिया ये नहीं है कि आप कितने जल्दी सफल होते हैं. आईडिया ये है कि आप उस सफलता के दरवाजे तक पहुंचने के लिए कितने समय तक टिके रह सकते हैं. अक्सर लोग टूट जाते हैं. मैंने खुद सोचा था कि एक डेढ़ साल हुआ तो हुआ नहीं तो पंजाब जाकर इंजीनियरिंग ही कर लूंगा. कुछ महीने तो सड़कें पहचानने में ही गयी कि ये बांद्रा जाती हैं ये अंधेरी. मेरी जो भी जर्नी रही है उससे मैं खुश हूं. वो बन सकता था. वो नहीं बन पाया. उस दौर से निकल गया हूं. दो ढाई साल में पूरी दुनिया ने बहुत कुछ देखा है. मैं भी एक बात समझ चुका हूं ज़िन्दगी में बहुत कुछ फिल्मों से ऊपर है.

बीते दो सालों ने आपको आम आदमी का नायक बना दिया है ,फिल्मों के ऑफर्स में क्या बदलाव पाते हैं?

बहुत बदलाव आया है.मैं अभी जो भी फिल्में कर रहा हूं ,उसमें मेरे पॉजिटिव रोल हैं. लार्जर देन लाइफ हैं. देशभक्ति की फ़िल्म हैं. वो भी एक दौर था जब लोग मुझे देखकर कहते थे कि नेगेटिव रोल कर लिया, अब पॉजिटिव में कोई इसे स्वीकार नहीं करेगा. अभी तो ऐसा है कि जो एकाध जो मैंने नेगेटिव किया था वो रीशूट करके पॉजिटिव बना दिया.

आप नेगेटिव किरदार करने के लिए अभी भी ओपन हैं?

मुझे दो साल से आफर ही नहीं हुआ. नेगेटिव की दुनिया कर ली अब सेकेंड इनिंग में पॉजिटिव ही करते हैं. एक फ़िल्म फतेह अगले महीने से शुरू होने वाली है ,बड़ी कमाल की स्क्रिप्ट है.

सोशल फ्रंट पर अभी क्या खास कर रहे हैं?

यूपी के देवरिया में एक स्कूल बना रहा हूं. शिरडी में ओल्ड एज और अनाथालय बना रहा हूं. एक झारखंड में एक स्कूल बना रहा हूं,वहां के एक आदिवासी इलाके में.

मुंबई में भी कुछ खास करने की प्लानिंग है?

मुम्बई में 70 से 80 बेड्स का एक अस्तपाल शुरू करना चाहता हूं. कोशिश भी बड़ी की. उसके लिए डॉक्टर्स के पीछे मुझे बहुत भागना पड़ा रहा है,पता लगा कि शुरू किया और डॉक्टर्स ही नहीं. कई लोगों ने ये भी समझाया कि कई बार कुछ गलत हो जाए तो आप पर ही वो आएगा, फिर गलती किसी की भी हो. मेरे लिए नयी दुनिया है. बहुत सारी चीज़ें सीख रहा हूं.

सब के लिए समय कैसे निकालते हैं?

टाइम होता नहीं है,निकालना पड़ता है. आप चुनते क्या हैं,मैं अभी यहां से निकलूंगा तो ये सोचूं कि आज शाम की पार्टी में कौन सा ड्रेस पहनूं या जो लोग मुझसे मदद चाहते हैं,उनकी मदद कैसे करूंं.

आपकी पत्नी और बेटे आपकी इस नयी भूमिका पर क्या कहते हैं,जो पूरे समय आपके साथ चलती है?

मेरे बेटे को भी इंस्टाग्राम पर मैसेजेस आते रहते हैं कि प्लीज़ सोनू सूद से मिला दीजिए. वो मुझे वो सब फारवर्ड करता है कि डैडी मुझे ये सब आया था. वो फिर फॉलोअप भी मुझसे लेता है कि आपने उस कैंसर के मरीज की मदद की थी. वो अभी कैसा है. जब आप रोज ये सब देखते हैं तो आप भी प्रभावित होते हैं. मेरा जो दूध वाला है, 20 साल से दूध बांट रहा है. वो एक तरह से मैनेजर टाइप बन गया है. मेरी बिल्डिंग के नीचे खड़ा होता है. लोगों के फॉर्म लेता है. पहले उसका काम था दूध बांटना और फिर कबाड़ी का काम करना. पिछले एक डेढ़ साल से उसकी इतनी इज़्ज़त बढ़ गयी है कि हर सोसाइटी के लोग उसे गुड्डुजी करके बुलाते हैं. वो कहता है कि मेरी ज़िन्दगी ही बदल गयी है. कितना भी पैसा आप कमा लें,वो इज़्ज़त आपको नहीं मिल सकती है,जो आम लोग की दुआ दे सकती है.

आपके बेटों का अभिनय में रुझान है?

नहीं, छोटा बेटा क्रिकेट बहुत अच्छा खेलता है. बड़ा बेटा पढ़ाई कर रहा है.

आपके सोशल वर्क में इंडस्ट्री से कितना सपोर्ट मिला है ?

मुझे दुआएं बहुत मिली है अगर आप पूछ रही हैं कि हमने साथ में कोई प्रोजेक्ट किया है या मेरे किसी प्रोजेक्ट में उन्होंने हाथ बंटाया है तो वो नहीं हुआ है. मैं नाम नहीं लूंगा लेकिन जब मैं मदद कर रहा था तो बहुत सारे एक्टर्स ने कहा कि हम भी जुड़ेंगे,मैंने कहा कि ज़रूर. मैं आपको केसेज भेजना शुरू करता हूं. उनका सवाल होता था कि कितना समय देना होगा. मैंने कहा कि कभी भी मदद करने के लिए तैयार रहना पड़ेगा ,तो उन्होंने कहा कि नहीं यार हम तो एक या डेढ़ घंटा दे सकते हैं. ऐसी सोच के साथ नहीं हो सकता है. मुझे लगता है कि आपको ये सब करके कितनी खुशी मिलती है. वो महत्वपूर्ण है. मैं अलग अलग भाषाओं की अब तक 90 से अधिक फिल्में कर चुका हूं, लेकिन जो खुशी मुझे लोगों की मदद करने से मिलती है ,वो फिल्में भी नहीं दे सकती है.

क्या आपकी पॉपुलरिटी दूसरे एक्टर्स में असुरक्षा की भावना भी लाती है?

मुझे इसका नहीं पता, लेकिन अगर किसी को ऐसा लगता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

क्या आपको लगता है कि आप पॉलिटिक्स में गए तो और अच्छा कर सकते हैं?

मुझे लगता है कि ये सबसे अच्छा स्पेस है. जहां मैं फ़िल्म भी कर पा रहा हूं और अपना सोशल वर्क भी. मैं राजनीति से दूर ही रहूंगा.

आपके सोशल वर्क पर कई सवाल भी उठाए गए हैं?

मेरी मां कहती है कि अगर तेरे सफर के अंदर बहुत तकलीफें आयी हैं तो समझ ले कि तू सही रास्ते पर है. शुरू किया था तो कई लोगों ने कहा था कि एक डेढ़ महीने बस चलेगा. ढाई साल हो गए. आज से ढाई साल बाद भी चलेगा.

एक दिन में आप कितने लोगों की मदद करते हैं,क्या धोखे का भी आपलोग शिकार होते हैं?

पिछले ढाई साल से कम से कम हर दिन 30 से 40 हज़ार लोगों की रिक्वेस्ट आती है. हम इतने समय से मदद कर रहे हैं, तो सिस्टम में फ़िल्टर आ चुका है ,जिससे जान सके कि मदद की असल में ज़रूरत किसको है किसको नही. हम किसी को पैसे नहीं देते हैं. आप तकलीफ में हैं तो सीधे अस्पताल में दूंगा. सीधे जॉब दिलाऊंगा या स्कूल में दूंगा, लेकिन इसके बावजूद हम कई बार धोखे का शिकार होते हैं. एक छोटा सा उदाहरण बताना चाहूंगा. एक बच्चे के लिवर ट्रांसप्लांट का केस था. 28 से 30 लाख रुपये सर्जरी के लिए चाहिए थे. 20 दिन का ही समय था. वो लोग जोधपुर से थे. मैंने अपोलो अस्तपाल में बात की. सर्जरी के लिए 10 लाख कम करवाए 18 लाख में बात हुई. राजस्थान के सीएम को फ़ोन किया. उन्होंने सीएम फंड से 10 लाख दिए, बाकी मैंने और कुछ उसकी फैमिली ने दिया. हर महीने मेरे पास बिल क्लियर के लिए आते हैं. उसमें 10 लाख की राशि नहीं भरी गयी थी. मालूम हुआ कि सीएम फंड से जो पैसे आए थे वो उसने भरे ही नहीं. मैंने कॉल किया तो उनका जवाब था कि बच्चे को बड़ा भी करना है तो उसमें खर्च करेंगे. आखिर में वो दस लाख मुझे भरना पड़ा. इस तरह के अनुभव भी होते हैं लेकिन रुकना नहीं है.

साउथ की कोई फ़िल्म कर रहे हैं?

साउथ की एक फ़िल्म शार्ट लिस्ट की है. उसका नाम अभी तय नहीं हुआ है. फीमेल के साथ रोमांस भी है. इस फ़िल्म में और भी साउथ फिल्मों की स्क्रिप्ट सुन रहा हूं.

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कोरी is a contributor at Prabhat Khabar.

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