आशा भोसले: शोखी से उदासी तक हर एहसास की आवाज हो गई खामोश

आशा भोसले का 92 साल की उम्र में निधन, फोटो- एएनआई
Asha Bhosle: बॉलीवुड की लेजेंडरी सिंगर्स में से एक आशा भोसले ने दुनिया को अलविदा कह दिया है. वो 92 साल की थीं. शोख गीतों से लेकर गजलों तक उनकी बहुरंगी आवाज ने पीढ़ियों तक लोगों के दिलों पर राज किया. उनके जाने से संगीत का एक पूरा युग खामोश हो गया है.
Asha Bhosle: शोख गीतों से लेकर उदासी भरे नगमों तक और पॉप से लेकर गजलों तक…हर विधा के संगीत को अपने सुरों से अमर करने वाली आशा भोसले के निधन के साथ ही भारतीय संगीत की वह बहुरंगी आवाज खामोश हो गई, जिसने पीढ़ियों तक लोगों के दिलों पर राज किया. अपनी अलग आवाज से हिंदी पार्श्व गायन (Playback Singer) में खास मुकाम हासिल करने वाली दिग्गज गायिका आशा भोसले का रविवार (12 अप्रैल) को निधन हो गया. वह 92 साल की थीं. आशा भोसले ने अपनी बहन और महान गायिका लता मंगेशकर की छाया में रहकर अपनी अलग पहचान बनाई थी. दोनों बहनों ने मिलकर करीब सात दशक तक हिंदी पार्श्वगायन को अपने सुरों से समृद्ध किया और एक ऐसे भारत की पहचान बनीं, जो बदलते समय के साथ दुनिया से कदमताल कर रहा था.
लता और आशा दोनों की 92 साल की उम्र में हुई मौत
लता मंगेशकर और आशा भोसले दोनों की ऐसी आवाजें थीं, जिन्होंने भारत समेत कई और देशों के संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज किया. दोनों ने ऐसी साझा पहचान बनाई, जो सीमाओं से परे थी. यह संयोग ही है कि संगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाली दोनों बहनों ने 92 वर्ष की आयु में ही दुनिया को रविवार के दिन अलविदा कहा. बड़ी बहन लता मंगेशकर को पहले शोहरत मिली, लेकिन जिंदादिल आशा ने भी जल्द ही अपनी अलग जगह बना ली और अपनी जीवंतता और अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा से संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया.

आशा भोसले ने कहा था- संगीत मेरी सांस है
साल 2023 में अपने 90वें जन्मदिन पर न्यूज एसेंजी पीटीआई से बात करते हुए आशा भोसले ने कहा था- हमारी सांस नहीं होती, तो आदमी मर जाता है. मेरे लिए संगीत मेरी सांस है. मैंने अपनी जिंदगी इसी सोच के साथ बिताई है. रविवार को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस लेने वाली आशा भोसले की बहुरंगी आवाज ने एक ओर जहां संगीत प्रेमियों को आजा, आजा जैसे जोशीले गीत पर थिरकने को मजबूर किया, तो दूसरी ओर जुस्तजू जिसकी थी जैसे शास्त्रीय विधा वाले गीतों के साथ उन्हें भावनाओं की गहराई में उतारा. उन्होंने दोनों तरह के गीतों को समान सहजता से निभाया. आशा भोसले को संगीत की दुनिया में केवल उनके लंबे सफर ने सबसे अलग नहीं बनाया, बल्कि हर दौर में खुद को समय के अनुसार नए सिरे से गढ़ लेने की उनकी अद्भुत क्षमता ने भी उन्हें अलग पहचान दिलाई.
आशा भोसले ने हर दौर में अपनी आवाज को दी नई पहचान
श्वेत-श्याम सिनेमा (Black And White Film ) से लेकर वैश्विक मंचों के रंगीन पर्दे तक, ग्रामोफोन रिकॉर्ड से लेकर स्ट्रीमिंग के दौर तक उन्होंने अपनी आवाज को समय के अनुसार लगातार नया रूप दिया. अपनी इसी विशेष क्षमता के कारण वो पीढ़ियों के लिए हर दिल अजीज बनी रहीं. मीना कुमारी और मधुबाला से लेकर काजोल और उर्मिला मातोंडकर तक परदे की नायिकाएं बदलती रहीं, लेकिन आशा एक ऐसी कड़ी बनी रहीं, जिसने अतीत को वर्तमान से जोड़े रखा. साड़ी पहने, माथे पर सलीके से सजी बिंदी और करीने से बंधे बाल-आशा भोसले की यही छवि उनके प्रशंसकों के दिलों में सदा जीवित रहेगी. उन्होंने करीब 12,000 गीत गाए, जिनमें से ज्यादातर हिंदी में थे, लेकिन उन्होंने इसके अलावा लगभग 20 अन्य भाषाओं में भी गीतों को आवाज दी. यह एक ऐसा विराट सफर है, जिसे एक साथ समेट पाना आसान नहीं. आशा और उनके भाई-बहनों- लता, उषा, मीना और हृदयनाथ – के लिए संगीत केवल पेशा नहीं, शायद नियति भी था. जहां लता और उषा गायिका थीं, वहीं मीना और हृदयनाथ संगीतकार हैं.

पिता से विरासत में मिला था संगीत
साल 1933 में जन्मीं आशा को उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर ने अपने अन्य बच्चों की तरह शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी. उन्होंने अपने पिता के निधन के बाद मात्र 10 साल की उम्र में अपना पहला गीत रिकॉर्ड किया. यह 1943 में फिल्म माझा बाल के लिए गाया मराठी गीत चला चला नव बाला था. उन्होंने 1948 में चुनरिया के लिए सावन आया गीत के साथ हिंदी फिल्म गायन के क्षेत्र में कदम रखा. फिल्म जगत में उनके शुरुआती साल संघर्ष भरे रहे. उन्हें शुरुआत में कमतर दर्जे की फिल्मों में गाने के लिए ही चुना जाता था और पहले से ही अपनी मजबूत पहचान बना चुकी लता की छाया से बाहर आना भी उनके लिए चुनौती थी. लेकिन आशा ने कुछ ऐसा किया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. उन्होंने पार्श्वगायिका होने के मायने ही बदल दिए. उन्हें बड़ी सफलता 1950 के दशक में मिली. उन्हें खासकर संगीतकार ओपी नैयर के साथ उनके जोशीले और चुलबुले गीतों ने नयी पहचान दी. उस समय पार्श्वगायन पर शास्त्रीय शुद्धता की ज्यादा छाप थी, लेकिन आशा ने उसमें अदा, शोखी और आधुनिकता का रंग भरा. वह क्लब गीतों, कैबरे गीतों और प्रेम गीतों की आवाज बन गईं. ये ऐसे क्षेत्र थे, जिन्हें अपनाने में अन्य गायक संकोच करते थे.
पिया तू अब तो आजा और दम मारो दम गीतों ने दिलाई नयी पहचान
उनके करियर का अगला मोड़ तब आया जब 1960 और 1970 के दशक में आरडी बर्मन के साथ उनकी साझेदारी ने हिंदी फिल्म संगीत को नयी दिशा दी. पिया तू अब तो आजा और दम मारो दम जैसे गीतों ने उनकी बेजोड़ बहुमुखी प्रतिभा को सामने रखा. उनकी आवाज में मादकता भी थी, शरारत भी, विद्रोह भी था, प्रेम भी और दर्द भी… लेकिन हर बार उसमें भावों की गहराई थी. आशा ने दिल चीज क्या है आप मेरी जान… जैसी गजलों, शास्त्रीय गीतों, पॉप संगीत के क्षेत्रों के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनाई. उन्हें कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, अनेक फिल्मफेयर पुरस्कार, भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.

16 साल की उम्र में परिवार के खिलाफ जाकर किया विवाह
वैश्विक संगीत इतिहास में शायद सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाली गायिकाओं में शामिल आशा भोसले का निजी जीवन भी उनके पेशेवर जीवन की तरह साहसी फैसलों से भरा रहा. हमेशा विद्रोही स्वभाव की मानी जाने वाली आशा ने 1949 में महज 16 साल की आयु में अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ जाकर गणपतराव भोसले से विवाह कर लिया. यह विवाह सफल नहीं रहा, लेकिन गणपतराव ने आशा को गायिका बनने के लिए प्रेरित किया. जब यह रिश्ता खत्म हुआ, तब आशा दो बच्चों की मां थी और अपने तीसरे बच्चे की मां बनने वाली थीं. इसके बाद वह अपने मायके लौट आईं और उन्होंने अपने संगीत सफर को फिर से आगे बढ़ाया. शुरुआती दौर में उन्हें ज्यादातर खलनायिकाओं और नर्तकियों के लिए गीत मिलते थे. कभी-कभी उन्हें कुछ लोकप्रिय फिल्मों में एक-दो गीत गाने का मौका मिलता, जैसे राज कपूर की बूट पॉलिश में उनका लोकप्रिय गीत नन्हे मुन्ने बच्चे. उनके करियर ने तब नयी उड़ान भरी, जब नैयर ने उन्हें नया दौर में मौका दिया, जिसमें उन्होंने वैजयंतीमाला के लिए मांग के साथ तुम्हारा गाया. इस गीत ने उनके लिए उद्योग में कई नए दरवाजे खोल दिए और इसके बाद उन्होंने वक्त एवं गुमराह जैसी फिल्मों के लिए गीतों को अपनी आवाज दी.
आरडी बर्मन से किया दूसरा विवाह
आशा भोसले ने संगीतकार आरडी बर्मन से दूसरा विवाह किया था. आरडी बर्मन के साथ उन्होंने कई चर्चित गीत गाये. अलग-अलग दशकों में रिलीज हुईं उमराव जान और रंगीला दो ऐसी फिल्में हैं, जो गायन की विभिन्न विधाओं में उनकी पकड़ की बेहतरीन मिसाल हैं. एक ओर दिल चीज क्या है, तो दूसरी ओर तन्हा तन्हा यहां पे जीना. आशा के परिवार में उनके बेटे आनंद हैं. उनके एक बेटे हेमंत का 2015 में स्कॉटलैंड में कैंसर से निधन हो गया था. पत्रकार के रूप में काम करने वाली उनकी बेटी वर्षा का 2012 में निधन हो गया था. साल 2023 में न्यूज एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए आशा भोसले ने कहा था- मेरा मानना है कि मैंने संगीत को बहुत कुछ दिया है. मैंने अलग-अलग तरह के भारतीय गीत गाए हैं. मुझे अच्छा लगता है कि मैं कठिन समय से बाहर आई. मैंने मुश्किलों का सामना किया, लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं, तो वह सब मुझे मजेदार लगता है, क्योंकि मैं उससे बाहर निकल आई. आशा ने मांग के साथ तुम्हारा, अभी न जाओ छोड़ कर, पिया तू अब तो आजा, दम मारो दम और मेरा कुछ सामान जैसे कई यादगार गीत गाए.
विदेशी गायकों के साथ भी गाया गाना
आशा ने केवल फिल्मी गीतों के लिए ही आवाज नहीं दी. उन्होंने 1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ी. उन्होंने बॉय जॉर्ज के बाउ डाउन मिस्टर में अपनी आवाज दी और बॉय बैंड कोड रेड के साथ भी गाया. उसी साल उन्हें लेगेसी के लिए पहली बार ग्रैमी पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. उन्होंने इंडीपॉप को भी उसी निडरता के साथ अपनाया. उनके 1997 में रिलीज हुए गैर-फिल्मी एलबम जानम समझा करो का रात शबनमी गीत काफी लोकप्रिय हुआ. इस गीत ने उन्हें एमटीवी और चैनल वी पुरस्कार दिलाए और ऐसे श्रोताओं की पीढ़ी तक पहुंचाया, जो रीमिक्स के दौर में बड़ी हुई थी. उन्होंने अदनान सामी के साथ कभी तो नजर मिलाओ और ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ब्रेट ली के साथ यू आर द वन फॉर मी और हां मैं तुम्हारा हूं जैसे गीत दिए. आशा भोसले को 2006 में दूसरा ग्रैमी नामांकन यू हैव स्टोलन माई हार्ट: सांग्स फ्रॉम आरडी बर्मन्स बॉलीवुड के लिए मिला.

सोशल मीडिया में लाखों में थी फॉलोअर्स की संख्या
खुद को लगातार नए रूप में ढालती रहने वाली आशा ने सोशल मीडिया पर भी अपनी पहचान बनाए रखी. इंस्टाग्राम पर उनके 7.5 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं. और यही थीं आशा भोसले- एक ऐसी कलाकार, जिसने अपनी शख्सियत और अपने गीतों में जीवन के प्रति गहरा प्रेम समेटे रखा- ऐसा प्रेम, जिसमें उल्लास भी था, पीड़ा भी थी, मिठास भी थी, कसक भी, अपनापन भी था और समय के साथ मिलकर आगे बढ़ने का साहस भी. उनके जाने से भारतीय संगीत का एक पूरा युग मौन हो गया. (इनपुट भाषा)
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लेखक के बारे में
By Pritish Sahay
12 वर्षों से टीवी पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सेवाएं दे रहा हूं. रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से पढ़ाई की है. राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय विषयों के साथ-साथ विज्ञान और ब्रह्मांड विषयों पर रुचि है. बीते छह वर्षों से प्रभात खबर.कॉम के लिए काम कर रहा हूं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद डिजिटल जर्नलिज्म का अनुभव काफी अच्छा रहा है.
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