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REVIEW: इस वी‍केंड मूवी देखने का है प्‍लान, तो देखें ''जॉली एलएलबी 2''

Updated at : 10 Feb 2017 3:28 PM (IST)
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REVIEW: इस वी‍केंड मूवी देखने का है प्‍लान, तो देखें ''जॉली एलएलबी 2''

II उर्मिला कोरी II निर्माता -फॉक्स स्टार स्टूडियो निर्देशक – सुभाष कपूर कलाकार – अक्षय कुमार, हुमा कुरैशी ,अनु कपूर ,सयानी गुप्ता,सौरभ शुक्ला और अन्य रेटिंग – तीन सुभाष कपूर की फिल्म जॉली एलएलबी की कहानी अमीर और शक्तिशाली लोगों द्वारा व्यवस्था का दुरुपयोग करने की कहानी थी, जबकि जॉली एलएल बी 2 की कहानी […]

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II उर्मिला कोरी II

निर्माता -फॉक्स स्टार स्टूडियो

निर्देशक – सुभाष कपूर

कलाकार – अक्षय कुमार, हुमा कुरैशी ,अनु कपूर ,सयानी गुप्ता,सौरभ शुक्ला और अन्य

रेटिंग – तीन
सुभाष कपूर की फिल्म जॉली एलएलबी की कहानी अमीर और शक्तिशाली लोगों द्वारा व्यवस्था का दुरुपयोग करने की कहानी थी, जबकि जॉली एलएल बी 2 की कहानी में भ्रष्टाचार के साथ- साथ आतंकवाद, सरकारी अफसरों की लापरवाही और एनकाउंटर के नाम पर हत्या जैसे मुद्दे भी शामिल हैं. फिल्म में दिखाया गया है किस तरह से जिहाद के नाम पर आतंकी मासूम और बेगुनाह लोगों की जान लेते हैं उसी तरह पैसे और पद के लिए भ्रष्ट पुलिस अधिकारी मासूम और बेगुनाह लोगों की हत्या एनकाउंटर के नाम पर करते हैं.

फिल्म की कहानी में इस विषय को बहुत ही सशक्त तरीके से बुना गया है. फिल्म में निर्देशक के रूप में सुभाष कपूर अपने विषय से भटके नहीं हैं और न्याय प्रणाली की तस्वीर को सही ढंग से पेश करने में कामयाब रहे हैं. पहले हाफ की कहानी में जगदीश्वर के किरदार को स्थापित करते हुए कानून व्यवस्था में फैली खामियों को भी बखूबी सामने लाया गया है. सेकंड हाफ में कहानी सच्चाई ढूंढने के जद्दोजहद में जुट जाती है हालांकि सेकंड हाफ में थोड़ा ड्रामा ज़्यादा नज़र आया. कश्मीर से पुलिस कांस्टेबल को लेकर भाग जाने वाला दृश्य ऐसा ही था. अक्षय जैसे स्टार की मौजूदगी ज़रूर उस सीन को विश्वसनीय बना देती है – फिल्म में कहानी लखनऊ से बनारस और जम्मू कश्मीर जाती है जो कि फिल्म की रफ्तार को धीमा करती है.

हालांकि फिल्म का स्क्रीनप्ले कसा हुआ है. फिल्म में कॉमेडी है तो कहानी की ज़रूरत के अनुसार फिल्म गंभीर भी हो जाती है. फिल्म का क्लाइमेक्स बेहतरीन बन पड़ा है. काफी हार्ड हिटिंग तरीके से वह अपनी बात को रखता है. उस दृश्य के अलावा फिल्म में लोअर कोर्ट की स्थिति को कम रौशनी के ज़रिये दर्शाने वाला दृश्य अच्छा बन पड़ा है, तो वही बड़े वकीलों ने न्याय प्रणाली को एक रेट कार्ड में बदल दिया है. इस पर अच्छा कटाक्ष किया गया है. अभिनय की बात करें तो अक्षय कुमार ने जगदीश्वर मिश्रा के किरदार में अपने किरदार की बॉडी लैंग्वेज के साथ साथ भाषा और लहजे को भी बखूबी आत्मसात किया है, वहीं अनु कपूर ने एक शातिर वकील का किरदार बेहतरीन तरीके से निभाया है.

उनकी संवाद अदायगी, फेशियल एक्सप्रेशन और बॉडी लैंग्वेज जबरदस्त है. पिछली फिल्म की तरह इस बार भी सौरभ शुक्ला अपने सहज अभिनय से बाज़ी मार ले जाते हैं. हुमा कुरैशी को करने के लिए फिल्म में कुछ खास नहीं था हालांकि वह अपनी भूमिका दर्ज करवाने में कामयाब रही हैं. कुमुद मिश्रा को नकारात्मक किरदार में देखना अलग अनुभव रहा. सयानी अपने सीन्स में प्रभावी रही हैं। बाकी के किरदारों ने कहानी का बखूबी साथ अपने अभिनय से दिया है.

फिल्म के संवाद प्रभावी हैं. ‘कश्मीर में सिम कार्ड खरीदने से भी आसान जेल जाना है.’ फिल्म के क्लाइमेक्स में पेंडिंग केसेज और वकीलों वाला संवाद हो या अक्षय का क्लाइमेक्स वाला भाषण काफी सशक्त है. फिल्म का गीत संगीत कहानी के अनुरूप है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है. कुलमिलाकर कॉमेडी और इमोशन से बनी यह कोर्टरूम ड्रामा फिल्म मनोरंजन करने के साथ साथ सशक्त ढंग से अपनी बात को रखती है.

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