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फिल्‍म रिव्यू : ''एयरलिफ्ट''

Updated at : 22 Jan 2016 3:49 PM (IST)
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फिल्‍म रिव्यू : ''एयरलिफ्ट''

II अनुप्रिया अनंत II फिल्म : एयरलिफ्ट कलाकार : अक्षय कुमार, निमरत कौर, इनामुल हक, अजय कुमार, कुमुद मिश्रा, प्रकाश बेलावड़ी रेटिंग : 4.5 स्टार निर्देशक : राजा कृष्णा मेनन लेखक : सुरेश नायर, राहुल नंगिया, रितेश शाह ‘एयरलिफ्ट’ इतिहास में घटी एक महत्वपूर्ण घटना को दर्शाती एक महत्वपूर्ण फिल्म है. ताज्जुब है, इतने सालों […]

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II अनुप्रिया अनंत II

फिल्म : एयरलिफ्ट

कलाकार : अक्षय कुमार, निमरत कौर, इनामुल हक, अजय कुमार, कुमुद मिश्रा, प्रकाश बेलावड़ी

रेटिंग : 4.5 स्टार

निर्देशक : राजा कृष्णा मेनन

लेखक : सुरेश नायर, राहुल नंगिया, रितेश शाह

‘एयरलिफ्ट’ इतिहास में घटी एक महत्वपूर्ण घटना को दर्शाती एक महत्वपूर्ण फिल्म है. ताज्जुब है, इतने सालों में कैसे किसी निर्देशक को इस विषय पर कहानी नहीं सुझी. बहरहाल, सबसे पहले निर्माता निखिल आडवाणी, हरि ओम प्रोडक्शन और टी सीरिज बधाई के पात्र हैं कि तीनों ने इस विषय के लिए हां कहा. खुशी है कि पिछले कई सालों से लगातार अक्षय कुमार साल की कुछ ऐसी चौंकानेवाली फिल्में करते हैं, जिन्हें देख कर यकीन होता है कि सुपरस्टार अगर ऐसे विषयों के लिए हामी भरे तो ऐसी कहानियों की ताकत बन सकते हैं.

‘एयरलिफ्ट’ एक ऐसे आम आदमी की खास कहानी है, जिसने अपने देश के लोगों की रक्षा एक सैनिक की तरह नहीं, बल्कि एक पारिवारिक सदस्य के रूप में की है. हम इसे सिर्फ देशभक्त फिल्म नहीं कह सकते, बल्कि यह मानवता, संवेदना, अपने अस्तित्व को ढूंढने की कहानी है. एक व्यक्ति अपनी पूरी विरासत बसाता है. उसे गढ़ता है और पल में वह सड़क पर आ जाता है, तब उसे एहसास होता है कि सिर्फ इंसानीयत ही वह कूंजी है, जिसे लेकर वह हजारों रास्ते तय कर सकता है. इस बात की भी खुशी है कि निर्देशक ने इसे जबरन देशभक्ति फिल्म साबित करने के लिए बड़े-बड़े भाषण नहीं लिखे. देशभक्ति के गाने नहीं ठूसे.

उन्होंने संजीदगी से फिल्म के हर किरदार, किरदारों के संवाद और पात्रों को गढ़ा है. यह निर्देशक राजा कृष्णा की पहली फिल्म है. लेकिन वह अपनी दक्षता साबित करते हैं. वे ‘एयरलिफ्ट’ गढ़ने में कहीं भी चूके नहीं हैं. उन्होंने विषय की गंभीरता और संजीदगी को बरकरार रखते हुए जो भावनात्मक संदेश दिया है. वह फिल्म को खास बना देती है. आमतौर पर हिंदी सिनेमा के निर्देशकों को यह बातें आउट डेटेड लगने लगी हैं कि वे दर्शकों को इमोशनल कनेक्ट देने से बचते हैं. लेकिन हकीकत यही है कि वही फिल्म कामयाब है, जिसे भावनाओं को उकेरने के लिए जबरदस्ती न करनी पड़े.

‘एयरलिफ्ट’ उन्हीं फिल्मों में से एक है, जो आपको झकझोर देती है. कहानी सच्ची घटना पर आधारित है. 1990 में जब इराक ने कुवैत पर हमला किया. उस वक्त 1 लाख 70 हजार भारतीय कुवैत में फंसे थे और तीन आम आदमियों ने अपने दम पर उन्हें वापस भारत भेजा. यह ऐतिहासिक जीत थी. विश्व के सबसे बड़े हीरोइज्म एक्ट में से एक. लेकिन दुखद है कि हमें हमारे इतिहास ने इसके बारे में खास जानकारी नहीं दी और हमने जानने की कोशिश नहीं की. हर लिहाज से निर्देशक बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऐसे विषय को चुना. हम लीक से हटकर फिल्मों की बातें करते हैं. वाकई में इसे विषय कहते हैं.

रंजीत काटयाल के माध्यम से उन तीन भारतीयों की कहानी को खूबसूरत तरीके से गढ़ा है निर्देशक ने. रंजीत कुवैत के बड़ा बिजनेसमैन है. उसे हर अप्रवासी हिंदुस्तानियों की तरह भारत में सिर्फ कमियां नजर आती हैं. उसे अपने देश से कोई लगाव नहीं. वह देश लौटना भी नहीं चाहता. बल्कि उसे इस कदर चिढ़ है कि भारत का जिक्र होना भी वह अपनी शोहरत और कद की तौहीन मानता है. लेकिन एक दिन एक झटके में सब सच्चाई उसके सामने होती है. उसके अस्तित्व पर सवाल उठते हैं, तो सिर्फ वह इसलिए जिंदा रह पाता, चूंकि वह भारतीय हैं.

उस वक्त उसे एहसास होता है कि जब दर्द होता है, तो सबसे पहले मां ही याद आती है. हर सफल बिजनेसमैन और नाकामयाब पति की तरह रंजीत काटयाल को भी अचानक ख्याल आता है कि सिर्फ उनकी पत्नी और बच्ची उसका परिवार नहीं है. बल्कि वे तमाम भारतीय उनके परिवार के ही सदस्य हैं. लेकिन वह देशभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए किसी आंदोलन की घोषणा नहीं करता, जैसा कि आमतौर पर हिंदी सिनेमा में होता आया है. ताकि सुपरस्टार्स का हीरोइज्म सामने आये. वह पूरी परिघटना को वैसे ही जीता है. जैसे उस दौर में घटना घटी होगी.

हर तरफ इराकी सैनिकों के अत्याचार का नजारा आपको एक दर्शक के रूप में डराता है. रुहे कांपती हैं. आप महसूस कर सकते हैं कि जब जब इस तरह के बंटवारे या कब्जे होते होंगे. हुकूमत बदलती होगी. दर्द आवाम ही झेलती है. सरकारें तो हमेशा ही सिर्फ भगौड़े ही बनती रही है. रंजीत अपनी कुशलता और प्रेजेंस ऑफ माइंड से सारी परिस्थितियों को संभालता है. वह लार्जर देन लाइफ वाले एक् शन में नहीं, बल्कि दिमागी कसरत से परेशानियों का हल निकालने की कोशिश करता है, जिसमें उसका साथ उसकी पत्नी भी देती है. इराकी- कुवैत और भारत के साथ उस दौर के विदेशी संबंधों को भी इस फिल्म के माध्यम से बारीकी से समझा जा सकता है.

यह इस फिल्म की खूबसूरती है कि फिल्म का नायक अचानक सुपरनैचुरल पॉवर हासिल करके सैनिकों से मुंठभेड़ नहीं करने लगता. वह आदमी की तरह ही बर्ताव करता है. इस लिहाज से यह फिल्म वास्तविक के बेहद करीब लगती है. निर्देशक का यह रियलिस्टिक अप्रोच उन्हें खास बना देता है. फिल्म की दूसरी खूबी फिल्म के सहायक कास्ट हैं, जिनमें पूरब कोहली, कुमुद मिश्रा, इनामुल हक, अजय कुमार और प्रकाश बेलावड़ी प्रमुख हैं. पूरब कोहली के पात्र की संजीदगी आकर्षित करती है और इंसानीयत की मिसाल देती है.

अजय कुमार और कुमुद मिश्रा की सहजता लुभाती है. इनामुल हक ने एक ईराकी मेजर के रूप में उनके लहजे और अंदाज को खूबसूरती से निभाया है. अजय कुमार हर दृश्य में अक्षय के साथ सारथी के रूप में नजर आये हैं. उनका अभिनय भी काफी आकर्षित करता है. एक खास किरदार निर्देशक ने प्रकाश बेलावड़ी के रूप में गढ़ा है, जो कहानी को न सिर्फ रोचक बनाते हैं, बल्कि कई रूप से लोगों की सोच व कई मुद्दों पर व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया भी देते हैं. निमरत ने अक्षय का पूर्णरूप से साथ दिया है. एक पत्नी के रूप में वह लाउड नहीं दिखी हैं और फिल्म को वह भी रियलिस्टिक बनाये रखने में योगदान देती हैं.

अक्षय कुमार ने हर रूप से इस फिल्म को निर्देशक की कमान के अनुसार ढलने दिया है. उन्होंने अपने स्टारडम को फिल्म में हावी नहीं होने दिया है. हर दृश्य में आप खुद को रंजीत कटयाल की जगह महसूस करते हैं. उनकी पूरी यात्रा, उनके मर्म के साथ आपको भी इस बात की हड़बड़ी है कि कब वे अपने देश लौटेंगे. दरअसल, उन्होंने इसमें एक बार फिर से नया प्रयोग किया है, जिसमें वे सफल रहे हैं. निर्देशक कहानी से भटकते नहीं, न ही उन्होंने कुछ भी थोपने की कोशिश की है. बेवजह गाने या रंजीत कटयाल को हीरो बनाने के चक्कर में अतिरिक्त दृश्य जोड़े गये हैं. फिल्म के कई संवाद आपको सोचने पर मजबूर करते हैं. झकझोरते हैं.

इस लिहाज से फिल्म के सारे लेखक भी बधाई के पात्र हैं. राजा ने अपनी पहली फिल्म से ही साबित कर दिया है कि वे सधे हुए निर्देशकों में शामिल हो सकते हैं. बेशक तमाम बातों से परे जब भारत का झंडा लंबे इंतजार के बाद लहराता है तो वाकई भारतीय होने पर गर्व होता है. यह फिल्म उन शिकायती टोलों के मुसाफिर को भी करारा जवाब देती है कि हां, हर देश में दिक्कत होती है. हर देश में परेशानी है. सरकारी दफतर, मंत्रालय में काफी भ्रष्टाचार है. लेकिन इन सबके बीच एक संजीव कोहली जैसा कर्मचारी भी होता है, जो देश के लिए जीता है. 26 जनवरी के मौके पर इससे बेहतरीन फिल्म और क्या हो सकती है. यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए, बल्कि स्कूली छात्रों और इतिहास के छात्रों को जरूर देखनी चाहिए.

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