Film Review: फिल्म देखने से पहले जानें कैसी है अजय देवगन की ''दे दे प्यार दे''
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 17 May 2019 2:07 PM
उर्मिला कोरी फ़िल्म: दे दे प्यार दे निर्देशक: आकिब अली निर्माता: टी सीरीज कलाकार: अजय देवगन,रकुल प्रीत,तब्बू,जिमी शेरगिल और अन्य रेटिंग: ढाई ‘प्यार का पंचनामा’ और फेम लव रंजन इस बार निर्माता के तौर पर फ़िल्म ‘दे दे प्यार दे’ लेकर आये हैं. फ़िल्म का कांसेप्ट अच्छा है. प्यार में कोई उम्र की सीमा नहीं […]
उर्मिला कोरी
फ़िल्म: दे दे प्यार दे
निर्देशक: आकिब अली
निर्माता: टी सीरीज
कलाकार: अजय देवगन,रकुल प्रीत,तब्बू,जिमी शेरगिल और अन्य
रेटिंग: ढाई
‘प्यार का पंचनामा’ और फेम लव रंजन इस बार निर्माता के तौर पर फ़िल्म ‘दे दे प्यार दे’ लेकर आये हैं. फ़िल्म का कांसेप्ट अच्छा है. प्यार में कोई उम्र की सीमा नहीं होती है. अगर आप शादी से अपने खुश नहीं है तो उसे तोड़ देने में ही समझदारी है. यहां नायक नैतिकता में नहीं बल्कि यथार्थ में जी रहा है. कहानी पर आते हैं. फ़िल्म की कहानी 50 वर्षीय आशीष (अजय देवगन) की है जो बीते 15 साल से अपनी पत्नी (तब्बू) और परिवार से दूर लंदन में रह रहा है वहां उसकी मुलाकात 26 वर्षीया आएशा( रकुल) से होती है.
आशीष और आयशा को एकदूसरे से प्यार हो जाता है. दोनों एक दूसरे के साथ शादी करना चाहते हैं. आशीष अपने परिवार से मिलवाने के लिए आएशा को भारत ले आता है.
भारत आने पर मालूम होता है कि आशीष की बेटी की शादी होने वाली है, ऐसे में वह अपनी बेटी की उम्र की आएशा के साथ शादी की बात परिवार से नहीं कर पाता है. क्या आशीष की बेटी की शादी हो पाएगी. आशीष की आधी उम्र की लड़की के साथ घरवाले रिश्ते को मंजूरी देंगे. यह आगे की कहानी में इमोशन, ड्रामा और कॉमेडी के साथ बयां किया गया है.
फ़िल्म का कांसेप्ट अच्छा है जहां एक आदमी अपनी बेटी की उम्र की लड़की से प्यार करता है. उसके इस प्यार को उसकी एक्स वाइफ भी सपोर्ट करती है. नए दौर के नए रिलेशनशिप को बयां करने की कोशिश हुई है. लेकिन वो उस प्रभावी ढंग से पर्दे पर नहीं आ पाया है.
फ़िल्म का फर्स्ट हाफ बोर करता है. अजय और रकुल प्रीत की प्रीत पर जो पूरी तरह से फोकस है. सेकंड हाफ में परिवार की एंट्री के साथ कहानी थोड़ी रोचक हो जाती है. लव रंजन की फिल्मों में कॉमेडी संवाद उनकी खासियत रहे हैं लेकिन इस बार वह चूक गए हैं. फ़िल्म के संवाद से मुश्किल से हंसी आती है. हां जावेद जाफरी और अजय देवगन के बीच के संवाद वाला दृश्य ज़रूर अच्छा बन पड़ा हैं.
अभिनय की बात करें तो, अपनी उम्र के किरदार को पर्दे पर जीने के लिए अजय की तारीफ करनी होगी. वो अपनी उम्र का मज़ाक बनाने से भी चूकते नहीं हैं. रकुल प्रीत औसत रही हैं. तब्बू की तारीफ करनी होगी. उन्होंने कॉमेडी, इमोशन सभी भी दृश्यों में उम्दा काम किया है. उन्होंने एक बार फिर साबित किया है कि उन्हें एक्टिंग का पावर हाउस क्यों कहा जाता है. जिमी शेरगिल इस तरह की भूमिकाओं में टाइपकास्ट होते जा रहे हैं. बाकी के कलाकारों का काम अच्छा है.
फ़िल्म के गीत संगीत की बात करें तो ऐसा कोई भी गाना नहीं हैजो जुबान या जेहन पर चढ़ता नहीं है. फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.
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