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Film Review: फिल्‍म देखने से पहले जानें कैसी हैं ''एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा''

Updated at : 01 Feb 2019 3:28 PM (IST)
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Film Review: फिल्‍म देखने से पहले जानें कैसी हैं ''एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा''

II उर्मिला कोरी II फिल्‍म : एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा निर्माता : विदु विनोद चोपड़ा निर्देशक: शैली कलाकार: अनिल कपूर,जूही चावला,सोनम कपूर,राजकुमार राव और अन्य रेटिंग : साढ़े तीन समलैंगिकता यह मुद्दा हिंदी फिल्मों के लिए नया नहीं है लेकिन मुख्यधारा यानी कमर्शियल फिल्मों में अब तक इसे कॉमेडी के तौर पर […]

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II उर्मिला कोरी II

फिल्‍म : एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

निर्माता : विदु विनोद चोपड़ा

निर्देशक: शैली

कलाकार: अनिल कपूर,जूही चावला,सोनम कपूर,राजकुमार राव और अन्य

रेटिंग : साढ़े तीन

समलैंगिकता यह मुद्दा हिंदी फिल्मों के लिए नया नहीं है लेकिन मुख्यधारा यानी कमर्शियल फिल्मों में अब तक इसे कॉमेडी के तौर पर ही ज़्यादातर प्रस्तुत किया गया है. ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ कमर्शियल फ़िल्म होने के बावजूद इस मुद्दे को पूरी संवेदनशीलता के साथ छूती है. फ़िल्म समझाती है कि यह न तो कोई मनोवैज्ञानिक बीमारी है ना ही किसी तरह का शौक. प्रकृति ने ही उन्हें बनाया है अगर लड़की को लड़की से प्यार है या लड़के को लड़के से तो समाज को उन्हें बहिष्कृत या उनका मजाक नहीं बनाना चाहिए. हर किसी को प्यार करने का अधिकार है. वो किससे प्यार करे उसे उसकी स्वन्त्रता होनी चाहिए.

कहानी की बात करें तो यह मोंगा के अंबानी यानी बलबीर चौधरी (अनिल कपूर) की बेटी स्वीटी ( सोनम कपूर) की है. जिसके घरवाले उसकी शादी के लिए लड़का ढूंढ रहे हैं. इसी बीच एक नाटककार साहिल (राजकुमार राव) की कहानी में एंट्री होती है.

साहिल को स्वीटी से प्यार हो जाता है. स्वीटी के घरवालों को लगता है कि स्वीटी को भी साहिल से प्यार है लेकिन साहिल को मालूम पड़ता है कि स्वीटी को उसकी सहेली सेंड्रा से प्यार है. इसके बाद कहानी में बहुत सारे उतार चढ़ाव आते हैं किस तरह से स्वीटी के परिवार और समाज वालों को मनाने और समझाने में साहिल स्वीटी की मदद करता है. यही फ़िल्म की आगे की कहानी है.

फ़िल्म का विषय भले ही सीरियस है लेकिन इसे बहुत ही हल्के फुल्के अंदाज़ में कहा गया है जो इस फ़िल्म को खास बना देता है. फर्स्ट हाफ में हल्की फुल्की रोमांटिक फिल्म का एहसास है. सेकंड हाफ बेहतरीन बन पड़ा है. कुछ सीन ऐसे हैं जो थिएटर से निकल जाने के बाद भी आपको याद रह जाते हैं. निर्देशिका शैली की तारीफ करनी होगी जो उन्होंने इतनी खूबसूरती से समलैंगिकता को अपनी फिल्म में बयां किया है.

फ़िल्म की खामियों की बात करें तो सोनम और सेंड्रा के बीच की केमिस्ट्री को क्यों नहीं फ़िल्म के स्कीन प्ले में तवज़्ज़ो दी गयी ये अखरता है. अनिल कपूर का किरदार अपनी बेटी की शादी मुसलमान लड़के से करने को राज़ी नहीं थे लेकिन जूही से थोड़ी देर की बातचीत के बाद उनका हृदय परिवर्तन समझ से परे लगता है.

अभिनय की बात करें तो राजकुमार की तारीफ करनी होगी. हर किरदार के साथ उनकी केमिस्ट्री एक अलग ही तरह से उभर कर सामने आयी है।वह हर दृश्य में बेजोड़ रहे हैं. अनिल कपूर पर्दे पर हमेशा की तरह बेहतरीन रहे हैं. क्लाइमेक्स में सोनम की डायरी पढ़ने वाले दृश्य में उनका अभिनय दिल को छू जाता है. जूही चावला के साथ उनकी केमिस्ट्री बहुत खास बन पड़ी है.

सोनम कपूर अच्छी रही हैं. बाकी के किरदार अपनी अपनी भूमिकाओं में जमें हैं. दूसरे पक्षों की बात करें तो फ़िल्म के संवाद उम्दा है जो कहानी के साथ बखूबी न्याय करते हैं।फ़िल्म का संगीत भी अच्छा बन पड़ा है. कुलमिलाकर एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा एक खूबसूरत फ़िल्म है जो मनोरंजन करने के साथ साथ दिल को भी छूती है.

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