Film Review : रोमांस के साथ थ्रिल और हॉरर का घालमेल है ''एक हसीना थी एक दीवाना था''
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 30 Jun 2017 4:54 PM
।। उर्मिला कोरी ।। फिल्म : एक हसीना थी एक दीवाना था निर्माता निर्देशक : सुनील दर्शनसंगीत : नदीम सैफीकलाकार : शिव दर्शन, नताशा फर्नांडीज, उपेन पटेल, ललित तिवारीरेटिंग : एक निर्माता निर्देशक सुनील दर्शन ने तीन साल पहले अपने बेटे शिव दर्शन को बॉलीवुड में ‘कर ले प्यार कर ले’ के साथ लांच किया […]
।। उर्मिला कोरी ।।
फिल्म : एक हसीना थी एक दीवाना था
निर्माता निर्देशक : सुनील दर्शन
संगीत : नदीम सैफी
कलाकार : शिव दर्शन, नताशा फर्नांडीज, उपेन पटेल, ललित तिवारी
रेटिंग : एक
निर्माता निर्देशक सुनील दर्शन ने तीन साल पहले अपने बेटे शिव दर्शन को बॉलीवुड में ‘कर ले प्यार कर ले’ के साथ लांच किया था. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गयी थी. तीन साल बाद उन्होंने ‘एक हसीना थी एक दीवाना था’ के जरिये अपने बेटे को फिर से रीलांच किया है. इस बार उन्होंने निर्माण के साथ-साथ निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाली है. गौर करें तो यह सिर्फ शिव दर्शनकीही नहीं, बल्कि सुनील दर्शन, अभिनेता उपेन पटेल, संगीतकार नदीम की भी रिलांच फिल्म है.
बात करें फिल्म की कहानी की, तो यह रोमांटिक के साथ-साथ थ्रिलर और हॉरर जॉनर का मेल है. लेकिन आखिर में मामला वही ढाक के तीन पात वाला ही है. कुछ अलग करने के चक्कर में कहानी कुछ ज्यादा ही अलग हो गयी है. इसे देखकर मनोरंजन तो दूर की बात, सिर में दर्द होने लगता है. फिल्म की कहानी एक ऐसी लड़की की है जो अपने प्यार और मंगेतर के बीच फंसी है. फिल्म में आत्मा का एंगल भी जोड़ा गया है मगर उसमें में भी एक ट्विस्ट है. ऐसा सरदर्द ट्विस्ट जो फिल्म देखते हुए आपको समझ आ जाता है. फिल्म बहुत कमजोर कहानी पर टिकी है, जिसे देखते हुए ऊब से ज्यादा चिढ़ होती है.
अभिनय की बात करें, तो पिछली बार की तरह इस बार भी शिव दर्शन निराश करते हैं. पूरी फिल्म में उनके चेहरे पर एक ही एक्सप्रेशन है. उपेन पटेल का काम भी औसत है. हां, उनकी हिंदी में पहले के मुताबिक जरूर सुधार आया है. अभिनेत्री नताशा फर्नांडीज की यह पहली फिल्म है. उनका अभिनय भी ठीक-ठाक रहा है. उनकी मौजूदगी फिल्म में जरूर फ्रेशनेश जोड़ती है. उन्हें अपने अभिनय पर और काम करने की जरूरत है, खासकर हिंदी पर.
फिल्म का गीत संगीत फिल्म के अन्य पक्षों के मुकाबले जरूर अच्छा बन पड़ा है, लेकिन उसमें 90 की छाप उभरकर सामने आती है. फिल्म के संवाद भी 90 की याद दिलाते हैं. फिल्म की सिनेमाटोग्रफी अच्छी है. खूबसूरत लोकेशन्स हैं. आखिर में यह फिल्म पूरी तरह से निराश करती है. इसे न देखने में ही भलाई है.
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