Batwara 1947 Movie Review :सनी देओल की यह पीरियड फिल्म इंसान बने रहने की सीख है देती

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बंटवारा 1947 फिल्म का पोस्टर, फोटो- इंस्टाग्राम

राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी तीन दशक बाद 'बंटवारा 1947' से वापसी की है. सनी देओल का अभिनय और फिल्म का क्लाइमेक्स फिल्म को ताकत देता है लेकिन निर्देशन और स्क्रीनप्ले में थोड़ा और काम किया गया होता तो यह एक यादगार फिल्म सकती थी.

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फ़िल्म -बंटवारा 1947

निर्माता - आमिर ख़ान प्रोडक्शन

निर्देशक - राजकुमार संतोषी

कलाकार - सनी देओल,प्रीति ज़िंटा,शबाना आज़मी,करण देओल,अभिमन्यु सिंह,अली फज़ल और अन्य

प्लेटफार्म - सिनेमाघर

रेटिंग - तीन

batwara 1947 movie review :निर्देशक राजकुमार संतोषी और अभिनेता सनी देओल की जोड़ी हिंदी सिनेमा की यादगार जोड़ियों में से रही है. निर्देशक और एक्टर की इस जोड़ी ने घातक, घायल और दामिनी जैसी कई यादगार फिल्मों को परदे पर मिलकर साकार किया है. बंटवारा 1947 से यह जोड़ी तीन दशक बाद एक बार फिर साथ आयी है.क्या परदे पर यह जोड़ी अपने जादू को दोहरा पायी है. इसके लिए पढ़े यह रिव्यु

ये है कहानी

यह फिल्म प्रसिद्ध नाटककार और प्रोफेसर असगर वजाहत द्वारा लिखित 1989 के प्रशंसित नाटक 'जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई ' से प्रेरित है.फ़िल्म की कहानी की बात करें तो फ़िल्म की कहानी देश के बंटवारे से शुरू होती है.हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में क़त्लेआम मचा हुआ है.सिकंदर मिर्ज़ा (सनी देओल) का परिवार मेरठ से किसी तरह लाहौर पहुंचता है.रिलीफ़ कैंप में कुछ दिन गुजारने के बाद उन्हें एक हवेली अलॉट होती है.वहाँ आने के बाद उन्हें मालूम पड़ता है कि वह हवेली एक हिंदू परिवार की थी और उस परिवार की एक बुजुर्ग महिला( शबाना आज़मी)अभी भी वहाँ रह रही है. उसे अपने बेटे रतन की वापसी का इंतज़ार है.यह इंतज़ार उस बुजुर्ग के लिए आसान नहीं है क्योंकि आधा लाहौर उसके वहाँ रहने के खिलाफ है.शुरुआत में सिकंदर मिर्जा का परिवार भी इसके खिलाफ था,लेकिन जल्द ही सिकंदर मिर्ज़ा और उसके परिवार के लिए वह माई बन जाती है. किस तरह से सिकंदर मिर्जा के लिए माई ही उसका मजहब बन जाती है.यह फिल्म उसी जर्नी की कहानी है.

बंटवारा 1947 की कास्ट की फीस, फोटो- इंस्टाग्राम
बंटवारा 1947 की कास्ट की फीस, फोटो- इंस्टाग्राम

इंसानियत की अहम सीख देती है

हिंदी सिनेमा और पाकिस्तान का रिश्ता गहरा लेकिन जबरदस्त उतार चढ़ाव से भरा रहा है. बीते कुछ वर्षों में कट्टर मुसलमान किरदारों को अनेक फिल्में मिली हैं लेकिन उदार और सहिष्णु मुसलमानों को जगह नहीं मिल पायी है खासकर अगर वह पाकिस्तान से हो तो उसमें ये खूबियां नामुमकिन सी थी.राजकुमार संतोषी ने पाकिस्तान में प्रतिबंधित असगर वजाहत के लोकप्रिय नाटक से सिकंदर मिर्जा के किरदार के जरिये उदार मुस्लिम की उसी छवि को परदे पर जिन्दा किया है.यह फ़िल्म बंटवारे के सबसे मुश्किल दौर में इंसानियत की बात रखती है.जो इस फिल्म का सबसे मजबूत सन्देश है. जिसे फिल्म के क्लाइमेक्स ने मजबूती के साथ परदे पर परिभाषित किया है.

फर्स्ट हाफ स्लो रह गया तो गीत संगीत फिल्म में नहीं बनी बात

खामियों की बात करें तो कालजयी नाटक के साथ फिल्म की पटकथा पूरी तरह से न्याय नहीं कर पायी है खासकर फिल्म का फर्स्ट हाफ स्लो रह गया है.इसके साथ ही यह एक पीरियड फिल्म है लेकिन फिल्म की सिनेमेटोग्राफी इसके साथ न्याय नहीं कर पायी है. सेट बनावटी लगते हैं. फिल्म के कमजोर पहलुओं में गीत संगीत भी है.इस फिल्म से संगीतकार ये आर रहमान का नाम जुड़ा हुआ है और गीतों से जावेद अख्तर का. उम्मीद थी कि गीतों में कुछ यादगार सुनने को मिलने वाला है लेकिन गीत संगीत बेहद औसत रह गए हैं.वह इस संवेदनशील कहानी के साथ न्याय नहीं कर पाए हैं.फिल्म के संवाद अच्छे बन पड़े हैं लेकिन ज्यादातर संवाद पंजाबी में हैं और कई दृश्यों में फिल्म के कई कलाकार उसमें पूरी तरह से सहज नज़र नहीं आये हैं.

फिल्म में दमदार एक्शन

राजकुमार संतोषी ने घातक और घायल की तरह एक बार फिर सनी देओल की एक्शन इमेज को फिल्म में बखूबी जोड़ा है. सनी देओल फिल्म में दुश्मन को हवा में उछालते तो बग्गी को हवा में उड़ाते नज़र आ रहे हैं. इस फिल्म में हैंडपप ना सही सनी ने बैलगाड़ी के पहियों को जरूर उखाड़ फेंका है.

सनी देओल का अभिनय फिल्म की ताकत

अभिनय की बात करें तो इस फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी अभिनेता सनी देओल हैं.वह परदे पर अपनी चित परिचित छवि में नज़र आये हैं,फिल्म में वह एक्शन के साथ जमकर डायलॉग बाजी करते हैं लेकिन उनका किरदार ठहराव और इमोशन लिए भी है.शबाना आजमी ने माई की भूमिका में जान डाल दी है.उनका अभिनय फिल्म को इमोशनल आधार देता है.गौरतलब है कि शबाना आज़मी और सनी देओल ने पहली बार एक साथ स्क्रीन इस फिल्म से सांझा किया है लेकिन उनके बीच की बॉन्डिंग परदे पर काबिलेतारीफ है.एक अरसे बाद प्रीति जिंटा को परदे पर देखना अच्छा लगता है.अली फज़ल की स्क्रीन पर भले बहुत कम नज़र आये हैं लेकिन उनके अभिनय का प्रभाव गहरा रहा है.अभिमन्यु अपनी भूमिका के साथ न्याय करते हैं तो करण देओल ठीक ठाक रहे हैं. उन्हें अपनी संवाद अदाएगी पर और काम करने की जरूरत है. बाकी की सपोर्टिंग कास्ट ने फिल्म में अच्छा साथ दिया है.


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Urmila Kori

लेखक के बारे में

By Urmila Kori

I am an entertainment lifestyle journalist working for Prabhat Khabar for the last 14 years. Covering from live events to film press shows to taking interviews of celebrities and many more has been my forte. I am also doing a lot of feature-based stories on the industry on the basis of expert opinions from the insiders of the industry.

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