फिल्म रिव्यू : दर्शकों पर चढ़ पायेगा वोडका डायरीज का नशा ?

By Prabhat Khabar Digital Desk
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फिल्म वोडका डायरीज

निर्देशक कुशल श्रीवास्तव
कलाकार के के मेनन,मंदिरा बेदी,राइमा सेन और अन्य
रेटिंग 2
थ्रिलर फिल्मों की श्रेणी में मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्म अब तक हिंदी सिनेमा में बहुत कम एक्सप्लोर हुई. इसी श्रेणी में यह फ़िल्म आती है. फ़िल्म की कहानी की शुरुआत एसीपी दीक्षित (के के मेनन) से होती है. वह अपनी पत्नी (मंदिरा) के साथ बहुत खुश हैं लेकिन एक रात एक होटल वोडका डायरीज में एक साथ हुए मर्डर्स कहानी में एक मोड़ ले आता है. एसीपी दीक्षित उन हत्याओं का रहस्य सुलझाने की कोशिश में खुद एक पहेली में उलझ जाता है. उसकी पत्नी इसी बीच खो जाती है और वोडका डायरीज होटल में मरे हुए लोग एक एक करके दीक्षित के सामने जिंदा दिखते हैं. दीक्षित खुद को एक अलग ही जाल में फंसा पाता है. क्या वह इस जाल से निकल पायेगा. फ़िल्म का अंत जब सामने आता है तो यकीन नही होता है।फ़िल्म से जुड़ा सस्पेंस सोच से परे है. फर्स्ट हाफ तक परदे पर क्या चल रहा है वो एंगेज नहीं कर पाता है. यही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खामी है. कहानी बिखरी हुई है. यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्म है. जो दर्शकों को एंगेज नहीं कर पाती है.
अभिनय की बात करें तो के के मेनन मंझे हुए अभिनेता की तरह इस बार भी परदे पर नज़र आते हैं. एसपी दीक्षित के किरदार में वह प्रभावी रहे हैं. राइमा सेन का किरदार परदे पर कुछ मिनटों के लिए ही हैं वह अच्छी रही है. मंदिरा की भूमिका औसत है.बाकी के किरदारों को ज़्यादा मौके नहीं मिले हैं. फ़िल्म का लोकेशन कहानी के अनुरूप है. मनाली की खूबसूरत वादियां कहानी को प्रभावी बनाते है. फ़िल्म के संवाद औसत हैं. दूसरे पहलू ठीक - ठाक हैं.
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