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पंजाब में डेरा प्रमुख राम रहीम का 'फरलो' बना राजनीतिक मुद्दा, सियासी दलों के निशाने पर भाजपा

Updated at : 10 Feb 2022 10:12 AM (IST)
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Gurmeet Ram Rahim/ file photo

Gurmeet Ram Rahim/ file photo

मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार, सच्चा डेरा सौदा प्रमुख राम रहीम का मतदान से ठीक पहले की रिहाई को लेकर पंजाब में राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी खासे चिंतित नजर आ रहे हैं. उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि राम रहीम की रिहाई से उनका वोट बैंक खिसककर किसी खास दल की ओर केंद्रित हो सकता है.

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चंडीगढ़ : विधानसभा चुनाव के लिए मतदान से महज कुछ दिन पहले ही जेल में बंद सच्चा डेरा सौदा के प्रमुख राम रहीम का ‘फरलो’ पर रिहा किया जाना पंजाब में राजनीति का मुद्दा बन गया है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस मुद्दे को लेकर पंजाब के सियासी दलों के निशाने पर भाजपा आ गई है. राम रहीम के फरलो को मुद्दा बनाकर सूबे के राजनीतिक दल भाजपा पर निशाना साध रहे हैं. सियासी दलों की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि चुनावी फायदे के लिए भाजपा ने ये चाल चली है.

राम रहीम की रिहाई से चिंतित हैं धुरंधर खिलाड़ी

मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार, सच्चा डेरा सौदा प्रमुख राम रहीम का मतदान से ठीक पहले की रिहाई को लेकर पंजाब में राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी खासे चिंतित नजर आ रहे हैं. उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि राम रहीम की रिहाई से उनका वोट बैंक खिसककर किसी खास दल की ओर केंद्रित हो सकता है. एक प्रकार से राम रहीम की इस रिहाई को वोट बैंक के ध्रुवीकरण के दृष्टिकोण से आंका जा रहा है.

भाजपा की चाल बता रहा अकाली दल

मीडिया की रिपोर्ट्स की मानें तो वोट बैंक के खिसकने की आशंका के मद्देनजर पंजाब की प्रमुख राजनीतिक पार्टी अकाली दल सीधे तौर पर इसे भाजपा की चाल बता रहा है. उसके साथ दूसरी पार्टियां भी इस प्रकरण को लेकर भाजपा पर निशाना साध रहे हैं, जबकि आम आदमी पार्टी इस मामले में बयान देने से हिचक रही है.

छोटे-छोटे टुकड़ों में बड़ा नुकसान

राजनीतिक विश्लेषकों के हवाले से मीडिया में खबर दी जा रही है कि इस मामले में भाजपा के चाणक्य की योजना अहम मानी जा रही है. हरियाणा की खट्टर सरकार की नरमी को इस चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. इसका कारण यह है कि डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम का प्रभाव पूरे मालवा इलाके में है. राम रहीम की रिहाई से मलावा इलाके में वोटों का समीकरण बिगड़ सकता है. राजनीतिक विश्लेषक इससे किसी एक दल का नुकसान नहीं देख रहे हैं, बल्कि सभी दलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बड़ा नुकसान होगा.

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महज एक इशारे से बदल सकता है हवा का रुख

राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि मालवा के बठिंडा, मानसा, संगरूर, बरनाला, पटियाला, फतेहगढ़ साहिब समेत कई जिलों में डेरा के लाखों अनुयाई हैं. वे कहते हैं कि डेरे के महज इशारे भर से ही इस क्षेत्र में सियासी हवा का रुख बदल सकता है. इससे मलावा क्षेत्र की प्रत्येक विधानसभा सीटों पर कम से कम 20 से 30 हजार वोट इधर से उधर हो सकते हैं.

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