Union Budget 2026: बजट से आम आदमी की बढ़ेगी आमदनी या जेब होगी खाली? वैश्विक चुनौतियां बरकरार

Updated at : 01 Feb 2026 12:29 PM (IST)
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Union Budget 2026

लोकसभा में निर्मला सीतारमण बजट पेश करेंगी.

Union Budget 2026: वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आज लोकसभा में पेश किया जाएगा. एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार भारत आर्थिक स्थिरता का केंद्र बना हुआ है. बजट में जीडीपी ग्रोथ, राजकोषीय घाटा, कर सुधार, सरकारी उधारी, पूंजीगत व्यय और आम आदमी की आय पर खास फोकस रहने की उम्मीद है. नीचे पूरी खबर पढ़ें.

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Union Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार 1 फरवरी 2026 को वित्त वर्ष 2026-27 का बजट पेश करेंगी. यह बजट ऐसे समय में पेश किया जा रहा है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरी अनिश्चितता और विखंडन के दौर से गुजर रही है. एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक तनाव, कमजोर वैश्विक भरोसा, अस्थिर वित्तीय बाजार और बढ़ती कमोडिटी कीमतें वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर दबाव बना रही हैं. इक्विटी और बॉन्ड मार्केट में अस्थिरता के बीच कमोडिटी बाजारों में तेजी देखी जा रही है, जिसमें कीमती धातुओं की भूमिका अग्रणी बनी हुई है. इस पृष्ठभूमि में भारत के लिए वित्तीय अनुशासन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती और आवश्यकता दोनों है. इन सबके बीच बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि इस साल के बजट से आम आदमी की आमदनी बढ़ेगी या जेब पर गहरा असर पड़ेगा?

भरोसे का संकट और कमोडिटी उछाल

एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया एक नए लेकिन अस्पष्ट रियलपॉलिटिक दौर में प्रवेश कर चुकी है. शीत युद्ध के बाद पहली बार वैश्विक स्तर पर ‘म्यूचुअल ट्रस्ट’ अपने सबसे निचले स्तर पर दिखाई दे रहा है. वित्तीय बाजारों में यह भरोसे की कमी इक्विटी और बॉन्ड मार्केट में गिरावट के रूप में सामने आई है. इसके विपरीत, कमोडिटी बाजारों में रिस्क-ऑन रैली का माहौल है, जिसकी शुरुआत कीमती धातुओं से हुई है और इसके औद्योगिक धातुओं तक फैलने की संभावना है. सबसे बड़ा जोखिम कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा है, जो यदि नियंत्रित आपूर्ति व्यवस्था से बाहर निकलता है, तो वैश्विक महंगाई और भारत के चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है.

अनिश्चितता के बीच क्या भारत की स्थिति

रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक अस्थिरता के बावजूद भारत एक ‘ओशन ऑफ सर्टेन्टी’ के रूप में उभर रहा है. महामारी के बाद भारत की आर्थिक रिकवरी न केवल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद की तुलना में बेहतर रही है, बल्कि कई उच्च आय वाले देशों से भी अधिक मजबूत दिखाई देती है. जहां उच्च-मध्यम आय वाले देशों की रिकवरी कमजोर रही, वहीं भारत ने निवेश, खपत और सरकारी पूंजीगत व्यय के सहारे मजबूत ग्रोथ बनाए रखी है. यह प्रदर्शन बजट 2026-27 के लिए नीति निर्माताओं को आत्मविश्वास प्रदान करता है.

जीडीपी, महंगाई और राजकोषीय घाटा

रिपोर्ट के अनुसार बजट 2026-27 के कैलकुलेशन के लिए नाममात्र जीडीपी वृद्धि दर 10.5% से 11% के बीच रहने का अनुमान है. वैश्विक कमोडिटी कीमतों में तेजी के कारण थोक महंगाई (डब्ल्यूपीआई) बढ़ सकती है, जिसका असर टैक्स कलेक्शन और खर्च की योजना पर पड़ेगा. इन अनुमानों के आधार पर वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का लगभग 4.2% रहने की उम्मीद है. हालांकि, नया जीडीपी सीरीज लागू होने पर वित्तीय गणित में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

सरकारी उधारी और आरबीआई की भूमिका

रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार की शुद्ध उधारी 11.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जो कुल राजकोषीय घाटे का लगभग 70% है. इसके साथ ही राज्यों की सकल उधारी 12.6 लाख करोड़ रुपये रहने की संभावना है. इतनी बड़ी उधारी आवश्यकताओं को संतुलित करने के लिए सरकार और आरबीआई के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा. ओपन मार्केट ऑपरेशंस (ओएमओ) और शॉर्ट-टर्म ट्रेजरी बिल्स की भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है.

प्रत्यक्ष करों की बढ़ती भूमिका

वित्त वर्ष 2026-27 में कुल कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी 59% रहने का अनुमान है, जो पिछले 15 वर्षों में सबसे अधिक है. व्यक्तिगत आयकर संग्रह वित्त वर्ष 2021-22 के बाद से कॉरपोरेट टैक्स से आगे बना हुआ है और यह रुझान वित्त वर्ष 2026-27 में भी जारी रहने की संभावना है. अप्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी घटकर लगभग 41% रह सकती है. जीएसटी के युक्तिकरण और व्यक्तिगत आयकर में सीमित राहत से कर आधार को मजबूती मिलने की उम्मीद है.

गैर-कर राजस्व और विनिवेश की अनिश्चितता

गैर-कर राजस्व में स्थिर वृद्धि का अनुमान है, जिसमें आरबीआई और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से मिलने वाले डिविडेंड की अहम भूमिका होगी. हालांकि, वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव के चलते विनिवेश से प्राप्ति एक चुनौती बनी रह सकती है. सरकार गैर-कर राजस्व को अनुकूलित करने की कोशिश करेगी, लेकिन बाजार स्थितियां निर्णायक होंगी.

पूंजीगत व्यय विकास का प्रमुख इंजन

वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने की संभावना है, जो सालाना आधार पर लगभग 10% की वृद्धि दर्शाता है. इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी में निवेश भारत की मध्यम अवधि की विकास संभावनाओं को मजबूत करेगा. राज्यों को दिए जाने वाले पूंजीगत अनुदान भी इस निवेश चक्र को गति देने में अहम भूमिका निभाएंगे.

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और कर्ज की चुनौती

वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र से राज्यों को कुल 23.1 लाख करोड़ रुपये का हस्तांतरण अनुमानित है, जो सकल कर राजस्व का लगभग 54% है. इसके बावजूद कर हस्तांतरण की समय-सीमा और वास्तविक राशि को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है. चूंकि कुल सरकारी कर्ज में राज्यों की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है, इसलिए बजट 2026-27 में राज्यों के लिए मध्यम अवधि, परिदृश्य-आधारित कर्ज-जीएसडीपी रोडमैप पर जोर दिया जा सकता है.

कर सुधार और क्षेत्र-विशेष सुझाव

वित्तीय बचत को बढ़ाने के लिए बैंक डिपॉजिट पर ब्याज को एलटीसीजी/एसटीसीजी के समान कर उपचार देने, टैक्स-सेविंग एफडी का लॉक-इन पीरियड ईएलएसएस के बराबर करने और सेविंग अकाउंट ब्याज पर टीडीएस हटाने जैसे सुझाव सामने आए हैं. जीएसटी के तहत इनपुट सर्विस डिस्ट्रीब्यूटर्स परिभाषा को स्पष्ट करने और बैंकिंग सेवाओं को जीएसटी-टीडीएस से बाहर रखने की मांग भी प्रमुख है.

बीमा और पेंशन जैसे सामाजिक सुरक्षा पर फोकस

बीमा में आई गिरावट सरकार के लिए चिंता का विषय है. टर्म और हेल्थ इंश्योरेंस पर अलग टैक्स डिडक्शन, डिजिटल वितरण को बढ़ावा और प्राकृतिक आपदाओं के लिए सार्वजनिक-निजी बीमा पूल जैसे कदम बीमा क्षेत्र को मजबूती दे सकते हैं. वहीं, पेंशन क्षेत्र में यूपीएस और एनपीएस वात्सल्य योजनाओं का विस्तार, ईपीएफओ में तकनीकी सुधार और निजी क्षेत्र में एनपीएस को बढ़ावा देना दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा के लिए जरूरी माना जा रहा है.

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स्थिरता और विकास के बीच संतुलन

बजट 2026-27 से यह उम्मीद है कि वह वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक स्थिरता को बनाए रखते हुए विकास के इंजन को गति देगा. वित्तीय अनुशासन, मजबूत पूंजीगत व्यय और संरचनात्मक सुधारों के सहारे भारत आने वाले वर्षों में भी वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक उजला पक्ष बना रह सकता है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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