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Success Story: 12 साल की उम्र में की शादी, आज 112 मिलियन डॉलर की मालकिन हैं भारत की पहली महिला उद्यमी

Updated at : 19 Sep 2025 8:44 PM (IST)
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Success Story

भारत की पहली महिला उद्यमी पद्मश्री कल्पना सरोज.

Success Story: कल्पना सरोज साहस, संघर्ष और सफलता की मिसाल हैं. एक दलित परिवार में जन्मी, बाल विवाह और घरेलू हिंसा जैसी कठिनाइयों से गुजरने के बाद उन्होंने खुद को एक मजबूत और सफल महिला उद्यमी के रूप में स्थापित किया. उन्होंने झुग्गियों से निकलकर कमानी ट्यूब्स जैसी डूबती कंपनी को फिर से खड़ा किया और उसे करोड़ों का मुनाफा देने वाला कारोबार बना दिया. पद्मश्री से सम्मानित कल्पना सरोज आज लाखों महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं. यह लेख उनके जीवन की प्रेरणादायक यात्रा को दर्शाता है, जो साबित करती है कि सच्ची हिम्मत और कड़ी मेहनत से किसी भी सपने को हकीकत बनने में देर नहीं लगती है.

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Success Story: कल्पना सरोज की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है. एक दलित लड़की जो झुग्गी-झोपड़ियों में पली-बढ़ी, बाल विवाह और घरेलू हिंसा जैसे मुश्किलकों कोण पार कर आज एक सफल उद्योगपति और पद्मश्री सम्मानित महिला हैं. उन्होंने न सिर्फ कमानी ट्यूब्स जैसी डूबती कंपनी को नया जीवन दिया, बल्कि लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा बनकर उभरीं. उनकी यह यात्रा समाज को सिखाती है कि जज्बा, मेहनत और आत्मविश्वास से कोई भी महिला अपने सपनों को साकार कर सकती है. यह कहानी सिर्फ एक व्यवसायिक सफलता की नहीं, बल्कि समाज की जंजीरों को तोड़ने वाली महिला शक्ति की है.

भारत की पहली महिला उद्यमी हैं कल्पना सरोज

भारत की पहली महिला उद्यमी की अगर बात की जाए तो कल्पना सरोज पहली भारतीय महिला हैं, जिन्हें भारत की पहली महिला उद्यमी के रूप में जाना जाता है. वह एक भारतीय महिला उद्यमी और टेडक्स स्पीकर हैं. वह मुंबई में कमानी ट्यूब के अध्यक्ष के रूप में कार्य करती हैं, जो तांबा और तांबे से बने समान का उत्पादन करता है. दलित समुदाय के सदस्य के रूप में गरीबी में जन्मी, वह एक सफल उद्यमी बनने के लिए जानी जाती हैं, जिन्होंने कामानी ट्यूब कंपनी की संकटग्रस्त संपत्ति खरीदी और इसे मुनाफे के लिए प्रेरित किया. उन्हें व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में 2013 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित भी किया गया था.

सफलता की बनीं नई पहचान

कल्पना सरोज एक आत्मनिर्भर उद्यमी और प्रमुख व्यवसायिक लीडर हैं. विषम परिस्थितियों से उठकर उन्होंने कई कठिनाइयों का सामना किया और कॉरपोरेट जगत में जाना पहचान नाम बनीं. मुंबई में स्थित कमानी ट्यूब्स की चेयरपर्सन के रूप में उन्होंने दिवालियापन की कगार पर पहुंच चुकी कंपनी को अपने हुनर और काबिलियत से बचाया और उसे एक मुनाफेवाले व्यवसाय में बदल दिया. उनके संघर्ष और सफलता की यात्रा कई लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है और उन्होंने अपने अनुभव टेडक्स स्पीकर के रूप में भी साझा किए हैं.

12 साल की उम्र में हो गई थी शादी

कल्पना सरोज का जन्म 1961 में एक मराठी बौद्ध परिवार में हुआ था, जो तीन बेटियों और दो बेटों में सबसे बड़ी है. उनकी शादी 12 साल की उम्र में हुई थी और वह अपने पति के परिवार के साथ मुंबई की एक झुग्गी में रहती थीं. हालांकि, अपने पति और ससुराल वालों के हाथों शारीरिक शोषण झेलने के बाद उन्हे उनके पिता ने बचाया और अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए अपने गांव लौट आई.

कैसे शुरू किया उद्यमी बनने का सफर?

अपने ससुराल वालों के हाथों शरीरिक शोषण झेलने के बाद जब वह अपने मायके लौट आईं. उसके कुछ समय बाद वह मुंबई चली गई. वहां पहुंचने के बाद उन्होंने एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करना शुरू किया और साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. उन्होंने एक सरकारी योजना जो दलित उद्यमियों के लिए थी. उसके तहत लोन लिया और सिलाई का कारोबार शुरू किया. अपनी समझदारी और मेहनत के बल पर उन्होंने फर्नीचर और रियल एस्टेट के काम में भी कदम रखा और छोटे निवेशों को मुनाफ़े वाले व्यवसायों में बदल दिया.

फिल्म प्रोडक्शन हाउस की शुरुआत

कुछ समय बाद मुंबई में कल्पना सरोज ने अपनी काबिलियत दर्शाते हुए अपना फिल्म प्रोडक्शन हाउस भी शुरू किया. जो केएस फिल्म्स प्रोडक्शन के नाम से जाना जाता है. उनके प्रोडक्शन हाउस की पहली फिल्म एक मराठी मूवी खैरालांजी थी.

कामानी ट्यूब्स का किया कायाकल्प

सरोज की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक कमानी ट्यूब्स कंपनी को फिर से पुनर्गठित करना थी. एक ऐसी कंपनी जो पैसों की कमी और मजदूर विवादों की वजह से बंद होने वाली थी. उन्होंने उद्यमी बनने के बाद कमानी ट्यूब्स के बोर्ड ऑफ मेंबर में शामिल हो गई थी. हालांकि, कंपनी के घाटे में जाने के बाद उन्होंने कंपनी को लिया और इसे फिर से पुनर्गठित किया, जिसके बाद उन्होंने कंपनी को मुनाफे वाला बना कर खड़ा कर दिया. वर्तमान में उनके पास 112 मिलियन डॉलर की संपत्ति हैं.

पद्मश्री से हो चुकी हैं सम्मानित

कल्पना सरोज को 2013 में व्यापार और उद्योग के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया था.उन्हें भारत सरकार द्वारा मुख्य रूप से महिलाओं के लिए एक बैंक भारतीय महिला बैंक के निदेशक मंडल में नियुक्त किया गया था. वह भारतीय प्रबंधन संस्थान बैंगलोर के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में भी काम करती हैं. वह मिलिंद खांडेकर की पुस्तक “दलित मिलियनेयर्स: 15 इंस्पायरिंग स्टोरीज” में विशेष रुप से प्रदर्शित प्रोफाइल में टेडक्स कार्यक्रमों में अतिथि वक्ता रही हैं.

बंद दरवाजे तोड़ कल्पना सरोज ने बनाया नया रास्ता

कल्पना सरोज की कहानी सिर्फ एक सफल महिला उद्यमी की ही नहीं है, बल्कि एक ऐसी महिला की है जिसने समाज की हर बंद दरवाजे को तोड़कर अपना रास्ता खुद बनाया है. एक दलित महिला होकर भी उन्होंने बचपन में गरीबी, भेदभाव और बाल विवाह जैसी कई मुश्किलों का सामना किया. लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. जहाँ समाज ने उन्हें कमजोर समझा, वहीं उन्होंने अपनी मेहनत, हिम्मत और सोच से ये साबित कर दिया कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं. कमानी ट्यूब्स जैसी डूबती हुई कंपनी को फिर से खड़ा करना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने मेहनत ओर काबिलियत के दम पर ये कर दिखाया.

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उन्होंने न सिर्फ एक बिजनेस संभाला, बल्कि सैकड़ों लोगों को रोज़गार भी दिया. उनकी जिंदगी हमें यह सिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी महिला अपने बड़े से बड़ा सपना पूरा और हासिल कर सकती है. कल्पना सरोज आज उन सभी लड़कियों और महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं, जो अपने हक के लिए लड़ रही हैं. उनकी कहानी हर उस महिला को आगे बढ़ने की ताकत देती है, जो अपने सपनों को हकीकत में बदलना चाहती है.

रिपोर्ट: सौम्या शाहदेव

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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