क्या आप भी No-Cost EMI के जाल में फंस रहे हैं? जानिए आपकी हर शॉपिंग पर बैंक कैसे कमाते हैं मुनाफा

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No-Cost EMI: शॉपिंग ऐप्स पर दिखने वाला No-Cost EMI का ऑप्शन कहीं आपको महंगा तो नहीं पड़ रहा? क्लिक करने से पहले जान लें छिपी हुई फीस और GST असली कारण.
No-Cost EMI: आजकल ऑनलाइन शॉपिंग करते वक्त आपने हर एक आइटम पर No-Cost EMI पर पेमेंट करने का ऑप्शन तो देखा ही होगा. ये ऑप्शन भी हमें खूब लुभाता है और अपनी तरफ ऐसे खींचता है जैसे ये हमारे लिए कितना फायेदेमंद है. मनपसंद स्नीकर्स हों या लेटेस्ट स्मार्टफोन जब हमारा बजट कम होता है तो ये ईएमआई वाला रास्ता सबसे बड़ा आसान लगता है. हमें लगता है कि बिना एक रुपया एक्स्ट्रा दिए हम सामान भी ले लेंगे और जेब भी खाली नहीं होगी. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो बैंक और कंपनियां मुनाफे के लिए बैठी हैं, वो आपको मुफ्त में ही कोई प्रोडक्ट कैसे खरीदने देने दे सकती है? ये ‘नो-कॉस्ट’ दरअसल एक बहुत ही सफाई से बुनी हुई मार्केटिंग जाल है. तो आइए जानतें नो कॉस्ट ईएमआई के पीछे के पूरे कॉन्सेप्ट को.
क्या सच में कोई ब्याज नहीं लगता?
अक्सर लोगों को लगता है कि नो कॉस्ट ईएमआई में उन्हें कोई एक्स्ट्रा ब्याज या चार्जेस नहीं पे करना होता है. उन्हें बस यही लगता है कि वो बस खरीदे हुए प्रोडक्ट का पैसा धीरे-धीरे चुका रहे हैं. लेकिन सच तो ये है कि बैंक कभी भी मुफ्त में लोन नहीं देता है. जब आप नो-कॉस्ट ईएमआई का ऑप्शन चुनते हैं, तो असल में उस पर ब्याज (Interest) लग रहा होता है, बस आपको सीधे तौर पर नहीं दिखता है. होता ये है कि कंपनी प्रोडक्ट पर मिलने वाले डिस्काउंट को खत्म कर देता है और उस रकम को बैंक को ब्याज के तौर पर दे देता है. एग्जांपल के लिए, मान लीजिए आप कोई फोन ले रहे हो जिसकी कीमत 50,000 रुपये है और उसपर फुल पेमेंट पर 4,000 की छूट है, तो ईएमआई लेते वक्त वो छूट गायब हो जाएगी. कागजों पर आपको लगेगा कि आप सिर्फ फोन की कीमत चुका रहे हैं, लेकिन असल में आपने वो 4,000 रुपये का डिस्काउंट खो दिया जो आपकी उस प्रोडक्ट पर बचत हो सकती थी. यानी घुमा-फिराकर पैसा आपकी ही जेब से ही जा रहा है.
बिल में छिपे वो एक्स्ट्रा चार्जेस क्या हैं?
सिर्फ डिस्काउंट का नुकसान ही काफी नहीं, इसके साथ कुछ बिन बुलाए खर्चे भी आते हैं. जब भी आप किसी प्रोडक्ट को ईएमआई में खरीदने का ऑप्शन चुनते है, तो बैंक आपसे एक प्रोसेसिंग फीस वसूलता है. इसके अलावा, सरकार आपसे उस ब्याज वाले हिस्से पर 18% GST भी वसूलती है. ये सब मिलाकर जो फोन आपको डिस्काउंट में सस्ता मिलना चाहिए था, वो EMI के चक्कर में एमआरपी (MRP) से भी महंगा पड़ जाता है. ज्यादातर लोग इसे तब नोटिस करते हैं जब महीने के आखिर में क्रेडिट कार्ड की स्टेटमेंट आती है. ऊपर से अगर आपने फुल पेमेंट की होती, तो आपको बैंक ऑफर्स या कैशबैक का अलग से फायदा मिलता, जो EMI के चक्कर में हाथ से निकल जाता है.
आपकी क्रेडिट प्रोफाइल पर क्या असर होगा?
सबसे जरूरी बात जो आज की जनरेशन को समझनी चाहिए, वो है आपका सिबिल (CIBIL) स्कोर. हर एक छोटी ईएमआई असल में एक पर्सनल लोन है. अगर आप एक साथ तीन-चार ईएमआई चला रहे हैं, तो बैंक की नजर में आप एक कर्जदार बन जाते हैं. कल को जब आप घर या कार के लिए बड़ा लोन लेने जाएंगे, तो ये छोटी-छोटी किस्तों का बोझ आपकी क्रेडिट लिमिट कम कर सकता है. आरबीआई भी बार-बार चेतावनी देता है कि अपनी रोजमर्रा की शॉपिंग के लिए उधार लेने की आदत न डालें.
तो क्या EMI कभी नहीं लेनी चाहिए?
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि ईएमआई हमेशा घाटे का ही ऑप्शन होता है. अगर कोई बड़ा खर्चा अचानक आ गया है और उसे एक बार में चुकाना मुश्किल है, तो ईएमआई आपके काम आती है. बस ध्यान ये रखना है कि अगर फुल पेमेंट पर कोई डिस्काउंट नहीं मिल रहा और प्रोसेसिंग फीस भी कम है, तभी इसे चुनें ताकि आपका मंथली बजट न बिगड़े.
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लेखक के बारे में
By Soumya Shahdeo
सौम्या शाहदेव ने बैचलर ऑफ़ आर्ट्स इन इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएशन किया है और वह इस समय प्रभात खबर डिजिटल के बिजनेस सेक्शन में कॉन्टेंट राइटर के रूप में काम कर रही हैं. वह ज़्यादातर पर्सनल फाइनेंस से जुड़ी खबरें लिखती हैं, जैसे बचत, निवेश, बैंकिंग, लोन और आम लोगों से जुड़े पैसे के फैसलों के बारे में. इसके अलावा, वह बुक रिव्यू भी करती हैं और नई किताबों व लेखकों को पढ़ना-समझना पसंद करती हैं. खाली समय में उन्हें नोवेल्स पढ़ना और ऐसी कहानियाँ पसंद हैं जो लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं.
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