आधा भारत नहीं जानता देश में कहां है करोड़पतियों का गांव, जान जाएगा तो कूटने लगेगा चांदी
Published by : KumarVishwat Sen Updated At : 13 Aug 2025 5:34 PM
Millionaires Village
Millionaires Village: गुजरात के कच्छ जिले में भुज से 3 किमी दूर स्थित मधापार गांव को ‘एशिया का सबसे अमीर गांव’ और ‘करोड़पतियों का गांव’ कहा जाता है. यहां की आबादी का 65% से अधिक हिस्सा विदेशों में बसा है और गांव के बैंकों में 5,000-7,000 करोड़ रुपये जमा हैं. आधुनिक सुविधाओं, मजबूत कृषि, एनआरआई निवेश और उच्च जीवन स्तर के कारण यह गांव शहरों से भी आगे है. इसकी आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक महत्व इसे भारत के खास गांवों में शामिल करता है.
Millionaires Village: गांव और गरीबी का रिश्ता अटूट है. अक्सर ऐसा माना जाता है कि गांवों में गरीब लोग बसते हैं. लेकिन, ऐसा मानना भी पूरी तरह बेमानी है. जो लोग यह मानते हैं कि गांवों में गरीब बसते हैं, यह उनकी भूल है. गांव में अमीर भी बसते हैं और भारत में कई ऐसे समृद्ध गांव हैं, जहां के लोग शहरी लोगों से कहीं अधिक अमीर हैं. ऐसे ही समृद्ध गांवों में से एक गुजरात का मधापार गांव है. इसे भारत ही नहीं, बल्कि ‘एशिया का सबसे अमीर गांव’ या फिर ‘करोड़पतियों का गांव भी कहा जाता है.’ यह गांव गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है. इस गांव के हर घरों में करोड़पति बसते हैं. आइए, इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.
भुज के पास है मधापार गांव
गुजरात के कच्छ जिले में भुज से मात्र 3 किलोमीटर की दूरी पर बसा मधापार गांव को “एशिया का सबसे अमीर गांव” और “करोड़पतियों का गांव” कहा जाता है. यह अपनी आर्थिक समृद्धि और आधुनिक सुविधाओं के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. इस गांव की समृद्धि का आधार इसकी बड़ी एनआरआई (गैर-निवासी भारतीय) आबादी, मेहनत, और अपनी जड़ों से जुड़ाव है. सर्वे रिपोर्ट्स के अनुसार, मधापार की आर्थिक स्थिति और जीवन स्तर किसी महानगर से कम नहीं है.
42,500 है मधापार गांव में की कुल आबादी
एशियानेट न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार, मधापार गांव की कुल आबादी लगभग 32,000 से 42,500 के बीच है, जिसमें से 65% से अधिक लोग विदेशों में बसे हैं. विशेष रूप से इस गांव के अधिकतर लोग ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, और अफ्रीकी देशों में बसे हैं. इस गांव में 17 प्रमुख बैंकों की शाखाएं हैं, जिनमें एचडीएफसी, आईसीआईसीआई, एसबीआई और पंजाब नेशनल बैंक शामिल हैं. इन बैंकों में गांववासियों द्वारा जमा राशि 5,000 से 7,000 करोड़ रुपये के बीच है, जो प्रति व्यक्ति औसतन 15-20 लाख रुपये की जमा राशि को दर्शाता है. इसके अतिरिक्त, डाकघरों में भी लगभग 200 करोड़ रुपये जमा हैं। यह आंकड़ा गांव की वित्तीय ताकत को स्पष्ट करता है.
क्या है मधापार गांव की समृद्धि का राज
मधापार गांव की समृद्धि का सबसे बड़ा कारण इसकी एनआरआई आबादी है. लगभग 1,200 से 1,500 परिवार विदेशों में रहते हैं, जो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा गांव के बैंकों और डाकघरों में जमा करते हैं. ये लोग मुख्य रूप से लेउवा पाटीदार समुदाय से हैं, जो व्यापार और निर्माण जैसे क्षेत्रों में विदेशों में सक्रिय हैं. 1968 में लंदन में स्थापित “मधापार विलेज एसोसिएशन” ने विदेशों में बसे लोगों को गांव से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
कृषि भी मधापार की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार है. यहां मक्का, आम और गन्ना जैसी फसलों की खेती होती है, जो स्थानीय और राष्ट्रीय बाजारों में भेजी जाती हैं. विदेशों से आने वाली राशि और कृषि आय के संयोजन ने गांव को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है.
आधुनिक सुविधाएं और विकास
मधापार गांव में आधुनिक सुविधाओं की कोई कमी नहीं है. यहां स्कूल, कॉलेज, स्वास्थ्य केंद्र, शॉपिंग मॉल, स्विमिंग पूल और एक आधुनिक गौशाला मौजूद हैं. साफ-सुथरी सड़कें, जल आपूर्ति, और उन्नत स्वच्छता प्रणाली इस गांव को शहरों से बेहतर बनाती हैं. शिक्षा के क्षेत्र में भी मधापार अग्रणी है, जहां हिंदी और अंग्रेजी माध्यम में प्री-स्कूल से लेकर हाई स्कूल तक की सुविधाएँ उपलब्ध हैं.
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ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
मधापार गांव की स्थापना 12वीं सदी में कच्छ के मिस्त्री समुदाय द्वारा की गई थी. यह गांव केजीके समुदाय के मधा कांजी सोलंकी के नाम पर बसा, जो 1473-74 में धनेटी से यहां आए थे. समय के साथ यहां विभिन्न समुदायों ने निवास किया, लेकिन लेउवा पाटीदार समुदाय का प्रभाव सबसे अधिक रहा.
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लेखक के बारे में
By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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