फ्रीबीज स्कीम्स से बढ़ रही आत्मनिर्भरता या मुफ्तखोरी की पड़ रही आदत?

Published by :KumarVishwat Sen
Published at :06 Mar 2025 5:23 PM (IST)
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फ्रीबीज स्कीम्स से बढ़ रही आत्मनिर्भरता या मुफ्तखोरी की पड़ रही आदत?

Freebies Schemes: समाज में एक तबका ऐसा भी जिसके कंधे पर हाथ रखकर आगे बढ़ाने की जरूरत है. उनको एक स्पेशल सपोर्ट चाहिए. मगर, इसका यह मतलब नहीं है कि हम उसे सबकुछ फ्री में दे दें.

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Freebies Schemes: सरकार की ओर से फ्रीबीज जो मुफ्त की योजनाएं लाई जाती हैं, चलाई जाती हैं और लोगों को सुविधा दी जाती है. उन योजनाओं पर बात करना जरूरी है. मुफ्त की योजना जैसे बिजली फ्री, पानी फ्री, अनाज फ्री, फ्री में महिलाओं को पैसा, फ्री में बेरोजगारों को पैसा दिया जा रहा है. फ्रीबीज योजनाएं देश के लोगों को आत्मनिर्भरता की ओर से आगे ले जा रही हैं या फिर नागरिकों में मुफ्तखोरी की आदत डाल रही हैं. इस मुद्दे पर हमने झारखंड की राजधानी रांची के चार्टर्ड एकाउंटेंट विनोद बंका से विस्तार से बातचीत की. आइए, उनकी बातों को विस्तार से जानते हैं.

प्रश्न: फ्रीबीज स्कीम्स से महिलाओं, युवाओं और गरीबों की आत्मनिर्भरता बढ़ती है या उनमें मुफ्तखोरी की आदत पड़ती है?

विनोद बंका: देखिए, इसमें कोई दो राय नहीं है कि समाज में एक तबका ऐसा भी जिसके कंधे पर हाथ रखकर आगे बढ़ाने की जरूरत है. उनको एक स्पेशल सपोर्ट चाहिए. मगर, इसका यह मतलब नहीं है कि हम उसे सबकुछ फ्री में दे दें. कभी भी किसी को बिना किसी प्रयास के कोई सुविधा मिलती है, तो वह उसकी कीमत नहीं समझता है. धीरे-धीरे वह आत्मनिर्भरता तो नहीं, फ्रीबीज पर डिपेंडेंट हो जाता है. एक तरह से हमलोग उसको बेकार कर देंगे. उसके टैंलेंट को…उसकी जो रचनात्मक क्षमता है, उसका विकास नहीं कर रहे हैं. फ्रीबीज किसी को भी बहुत ज्यादा बेनिफिट देने वाला नहीं है. हमलोगों को ऐसी स्कीम लेके आनी चाहिए, जिससे हमलोग उन्हें उद्यमी बनाएं, उनकी कुशलता को डेवलप कर सकें, स्वरोजगार की ओर आगे बढ़ा सकें, ताकि उनको ये लगे कि हम कुछ किए हैं, तब हमको ये प्राप्त हुआ है. धीरे-धीरे वो ऐसा हो जाएगा कि हमको जब मुफ्त में ही मिल रहा है, तब कुछ करने की जरूरत नहीं है. मेरे ख्याल से सभी पॉलिटिकल पार्टी फ्रीबीज बांट रही हैं, मैं उसके अगेंस्ट में हूं. सुप्रीम कोर्ट ने भी बोला है कि फ्रीबीज के लिए स्पेशल डेलीगेशन बनना चाहिए. राज्यों पर बोझ बढ़ रहा है. उनकी फाइनेंशियल स्थिति खराब हो रही है. इलेक्शन जीतने के लिए भले ही हम फ्रीबीज की घोषणा कर दे रहे हैं, लेकिन अल्टीमेटली हम एक बड़े तबके को नीचे ले जा रहे हैं. मेरा ये मानना है.

प्रश्न: राजकोषीय घाटा, राजकोष, सरकार की बैलेंसशीट, टैक्सपेयर्स और अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है.

विनोद बंका: देखिए, जैसा कि मैंने पहले क्योश्चन में ही बताया था कि सरकार टैक्स का पैसा कलेक्शन करती है विकास के लिए. अगर उसे हम फ्रीबीज में बांट दे रहे हैं, तो हमलोगों पर वित्तीय बोझ तो बढ़ता ही है और जब पैसा घटता है, तब हम लोन लेते हैं और वो पैसा इंट्रेस्ट में जा रहा है. विकास का काम ठप पड़ रहा है. धीरे-धीरे स्टेट पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है. ये राजकोषीय घाटा बढ़ाता है, बैलेंसशीट सरकार की नेगेटिव होती है और टैक्सपेयर को यह कहीं भी सटिस्फैक्शन नहीं होता है कि हम जो पैसा टैक्स के रूप में जमा कर रहे हैं, उसका सदुपयोग हो रहा है. इन सारी स्कीम्स का नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है. इसका एक्जाम्पल हमलोग पड़ोसी स्टेट में देख चुके हैं. श्रीलंका, पाकिस्तान और सुनने में आया है कि मालदीव की हालत भी बहुत खराब है. ये अल्टीमेटली होना ही है. इसलिए आप सावधानीपूर्वक तथ्यों को आगे बढ़ाइए. कहीं पर भी हमलोगों को कोई शिकायत नहीं है, मगर उसको इस तरह से आगे बढ़ाइए कि उनको ये लगे कि हम कुछ कर रहे हैं, तब हमको मिल रहा है. उनको जो पैसा सरकार की ओर से मिल रहा है, वह इंटरपेन्योरशिप के रूप में आगे बढ़े और स्वरोजगार के रूप में आगे बढ़े, तभी इसकी सफलता है, अन्यथा यह असफल है.

प्रश्न: फ्रीबीज के लिए सरकार पैसा कहां से लाती है?

विनोद बंका: देखिए, सरकार को फ्रीबीज बांटने के लिए जो भी पैसा चाहिए, वह या तो टैक्सपेयर का पैसा है या फिर सरकार लोन लेती है. हमलोग देख ही रहे हैं कि बहुत सारे स्टेट में उस पर परसेंटेज बहुत ज्यादा बढ़ गया है. जीडीपी पर बहुत बड़ा बोझ है और सरकार की आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा इंट्रेस्ट पे करने में जा रहा है. ये एक तरह से सरकार जो टैक्स का पैसा कलेक्शन कर रही है, जिससे विकास का काम होना चाहिए, उसका दुरुपयोग है. एक प्रकार से हमसे पैसा लेकर दूसरों में बांटा जा रहा है. बांटने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन आप उसे क्वांटिटेटिव वे में बांटिए. यह इस तरह से महसूस होना चाहिए कि हम कुछ कर रहे हैं. हमलोग गीता को पढ़ते हैं न, जिसमें कर्म को प्रधान कहा गया है. इंटरप्राइजिंग गेस्चर के रूप में फ्रीबीज को बांटना चाहिए. फ्रीबीज अपने आप में घातक स्कीम्स हैं.

प्रश्न: सरकारें फ्रीबीज स्कीम्स चला रही हैं, उसका उद्देश्य क्या है?

विनोद बंका: बहुत अच्छा सवाल है आपका. देखिए, फ्रीबीज सभी पार्टियां बांट रही हैं. मैं किसी पॉलिटिकल पार्टी के अगेंस्ट नहीं हूं और पक्षधर भी नहीं हूं. फ्रीबीज का उद्देश्य जो है, पेपर में भले ही है कि हम उसे सपोर्ट करना चाहते हैं, ताकि वह अपनी बेसिक नीड को बीट करे और उसे जो अभी तक आधारभूत सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं, वह उसे प्राप्त हो. लेकिन, अल्टीमेटली हम उसको ले कहां जा रहे हैं? उद्देश्य जो है, वह लॉन्ग रन में होना चाहिए. शॉर्ट टर्म में आप भले ही उसे बेनिफिट दे रहे हैं और उसमें भी इसमें बहुत सारा मैनुपुलेशन हो रहा है. एकाउंट्स में पैसा जा रहा है, उसको कितना पैसा मिल रहा है या कि नहीं मिल रहा है? सही आदमी को पैसा मिल रहा या नहीं मिल रहा है? बहुत पहले हमारे एक्स प्राइम मिनिस्ट बोले थे कि केंद्र से 1 रुपया देते हैं, तो 15 पैसा पहुंचता है. डीबीटी स्कीम से तो वह सक्सेस हुआ है और लाभार्थी के पास हैंड्रेड परसेंट पैसा जाता है. लेकिन, वह पैसा उसको मिल रहा है या नहीं मिल रहा है कि दलालों के चक्कर में पड़ जा रहा है? हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए कि सरकार हर नागरिक को उद्यमशील बनाए और देश के आर्थिक विकास में कंट्रीब्यूट करने लिए प्रेरित करे. स्कीम का उद्देश्य ये होना चाहिए और फ्रीबीज बांटने से उद्देश्य पूरा नहीं होता है.

प्रश्न: क्या सरकार युवाओं और महिलाओं को रोजगार नहीं दे पा रही है, तो फ्रीबीज का लॉलीपॉप दे रही है?

विनोद बंका: एक तरह से आप सही बोल रहे हैं. यह एक तरह का लॉलीपॉप ही है. आप रोजगार जेनरेट नहीं कर पा रहे हैं. आप उनको काम नहीं दे पा रहे हैं. आपको सत्ता चाहिए. सत्ता में आने का साधन बना दिया गया फ्रीबीज को. अगर आपको पावर में आना है, तो कोई भी स्कीम लेकर आ रहे हैं. इससे आपको सत्ता का सुख तो मिल जाएगा, मगर अल्टीमेटली देश के नागरिकों का नुकसान हो रहा है. उनकी उद्यमशीलता खत्म हो रही है. इसको तुरंत रोकना चाहिए. इसमें चुनाव आयोग को, सुप्रीम कोर्ट को जरूर कुछ वर्डिक्ट देना चाहिए. ये कब रुकेगा, कहां जाकर रुकेगा? मुझको ये भय है कि आने वाले किसी समय में किसी स्टेट की या देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाए और हम भी श्रीलंका, पाकिस्तान और मालदीव की राह पर आगे बढ़ जाएं. आज हमलोग विकास की ओर तेजी से चल रहे हैं. विश्व में भी हमारा अच्छा इमेज बन रहा है. हमलोगों को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने का ख्वाब देखा जा रहा है. तो ये फ्रीबीज बांटकर नहीं होगा. आपको ये लॉलीपॉप बांटना बंद करना पड़ेगा. मगर, ये तभी होगा, जब सारी पॉलिटिकल पार्टियां आपस में बैठकर डिसाइड करे कि हम इस दिशा में नहीं जाएंगे, चाहे सत्ता का सुख मिले या न मिले.

प्रश्न: हमारे यहां जो टैलेंट है, उसे अर्थव्यवस्था में लाने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? उनके लिए रोजगार सृजन कैसे हो?

विनोद बंका: हमारे यहां टैलेंट की कमी नहीं है. हमारे बच्चे ही दूसरी जगह जाकर काम कर रहे हैं. अपने टैलेंट का झंडा गाड़ रहे हैं. कोई किसी का बेटा सीईओ है. झारखंड के बच्चे काफी टैलेंटेड हैं. अभाव में बाहर जाकर अपना टैलेंट दिखाते हैं, तो आश्चर्य होता है. हमारे यहां का टैलेंट पलायन करके दूसरे राज्यों की इकोनॉमी को बढ़ावा दे रहा है. जो हमारा टैलेंट दूसरे राज्यों में पलायन कर रहा है, तो हमारे यहां उनको सुविधा देनी पड़ेगी. आपको अपॉर्च्युनिटी देनी पड़ेगी, तभी न हो पाएगा. फ्रीबीज के माध्यम से टैलेंट को अपॉर्च्युनिटी नहीं मिलेगी.

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प्रश्न: बेरोजगारी भत्ता सालों से मिल रही है लोगों, लेकिन नौकरी नहीं मिल रही है. क्या कारण है?

विनोद बंका: नौकरी है ही नहीं, तो कहां से मिलेगी. सॉल्यूशन के तौर पर आप बेरोजगारी भत्ता दे रहे हैं. बेरोजगारी भत्ता पाकर लोग खुश हैं. वो आवाज नहीं उठाते कि आप हमें नौकरी या रोजगार दीजिए. रोजगार कहां से लाएं. सरकार रोजगार पैदा कर सकती है. आज की डेट में हर स्टेट के पास इतनी संभावना हैं कि उसका प्रॉपर तरीके से यूटिलाइज किया जाए, तो बहुत सारा रोजगार जेनरेट हो सकता है. आज हमलोग सही तरीके से प्लानिंग करें, तो हमको नहीं लगता है कि हमलोग युवाओं को रोजगार नहीं दे सकते हैं. बहुत सारे स्कूल में और एजुकेशन इंस्टीट्यूट में पद रिक्त हैं और सरकार भी कह रही है कि हम उन पदों पर नियुक्ति करेंगे. यह स्वागतयोग्य कदम है. इससे लोगों को रोजगार मिलेगा और जहां पर नियुक्तियां होंगी, वहां पर काम सही तरीके से होगा. खासकर, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में नियुक्तियां होने से पढ़ाई में हम दूसरे स्टेट्स से कंपीट कर सकेंगे. कुल मिलाकर हम यह कहेंगे कि सरकार को फ्रीबीज स्कीम्स लाने के बजाए विकासोन्मुखी योजनाएं लानी चाहिए. टैलेंट को सपोर्ट करने के लिए योजनाएं लानी चाहिए और रोजगार सृजन करना चाहिए. तभी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी. आदमी का स्वाभिमान भी बढ़ेगा. हर आदमी का अपना स्वाभिमान है. फ्री में लेके कोई भी खुश नहीं है. उसका स्वाभिमान भी सटिस्फाइड होगा कि हां, हम कुछ कर रहे हैं, तब हमको कुछ मिल रहा है. युवा और महिलाएं तभी आत्मनिर्भर बन पाएंगे, जब उनको रोजगार या स्वरोजगार की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए.

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लेखक के बारे में

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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