बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री पूंजी जरुरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं : आरबीआइ

Updated at : 10 Jan 2015 4:24 PM (IST)
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बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री पूंजी जरुरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं : आरबीआइ

कोलकाता : भारतीय रिजर्व बैंक ने आज कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री बेसल-3 के पूंजी पर्याप्तता मानदंडों को पूरा करने के लिये काफी नहीं होगी. रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आर. गांधी ने बंगाल उद्योग मंडल की बैठक में कहा, हाल ही में यह रिपोर्ट आई है कि सरकार […]

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कोलकाता : भारतीय रिजर्व बैंक ने आज कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री बेसल-3 के पूंजी पर्याप्तता मानदंडों को पूरा करने के लिये काफी नहीं होगी.
रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आर. गांधी ने बंगाल उद्योग मंडल की बैठक में कहा, हाल ही में यह रिपोर्ट आई है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 52 प्रतिशत करने पर विचार कर रही है. गांधी ने कहा कि यह राशि बेसल-3 मानदंडों के तहत पूंजी जरुरतों को पूरा करने के लिए शायद पर्याप्त न हो क्योंकि ये अनुमान न्यूनतम आवश्यकता पर आधारित हैं. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अगले पांच साल में पूंजी जुटाने की स्पष्ट योजना तैयार करनी होगी.
गांधी ने कहा, बैंकों को बिना-मताधिकार वाली शेयर पूंजी, अलग तरह के मताधिकार वाली पूंजी और विशेष मताधिकार (गोल्डन वोटिंग राइट) वाली शेयर पूंजी जैसे विभिन्न विकल्पों पर सक्रियता से विचार करना चाहिए. बैंकों को टीयर-एक पूंजी के तहत लगभग 4.50 लाख करोड रुपए की जरुरत होगी जिसमें से बैंकों को 2.40 लाख करोड रुपए की शेयर पूंजी की जरुरत होगी.
गांधी ने कहा कि बैंकों को टीयर-दो पूंजी जुटाने के लिये दीर्घकालिक बॉंड जारी करने चाहिये. बैंकों में एनपीए के स्तर के बारे में गांधी ने कहा कि हम इरादतन चूककर्ताओं से निपटने के लिए लगातार नए तरीके लाने की कोशिश कर रहे हैं. इस मामले में बैंकों की मदद के लिए सुधार होंगे. उन्होंने कहा कि बैंकों को एक कारगर जोखिम प्रबंधन प्रणाली विकसित करनी होगी ताकि ऐसी समस्याओं से बचा जा सके. उन्हें किसी खास क्षेत्र को ही अधिक कर्ज देने के बजाय संतुलित पोर्टफोलियो रखने की कोशिश करनी चाहिए.
बैंकों के विलय के संबंध में उन्होंने कहा इस पर सिर्फ उन्हें ही विभिन्न कारकों को ध्यान में रखकर विचार करना चाहिए. उन पर बाहर से, मसलन सरकार की ओर से फैसला लादा नहीं जाना चाहिए.
गांधी ने कहा, यदि कोई विलय व्यावसायिक लिहाज से व्यवहारिक पाया जाता है तो यह मजबूत होगा. उन्होंने कहा कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी को बैंकों का प्रतिद्वंद्वी नहीं माना जाना चाहिए. इन इकाइयों में बैंकों के मुकाबले जोखिम उठाने की ज्यादा प्रवृति होती और ये इकाइयां नियामक के पास लघु ऋण बैंक के लिए आवेदन कर सकते हैं.
गांधी ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अब पेशेवराना तरीके से प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जा रहा है क्योंकि उन्हें वाणिज्यिक फैसले करने के संबंध में स्वायत्तता प्रदान करने का आश्वासन दिया गया है.
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