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शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मोर्चे पर झारखंड सरकार को करनी होगी मेहनत, आर्थिक सर्वेक्षण ने पेश की भयावह तस्वीर

Updated at : 08 Jul 2019 1:56 PM (IST)
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शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मोर्चे पर झारखंड सरकार को करनी होगी मेहनत, आर्थिक सर्वेक्षण ने पेश की भयावह तस्वीर

मिथिलेश झा रांची : विश्व के सबसे युवा देश के कई राज्यों में तेजी से आबादी (Population) बढ़ रही है. ऐसे राज्यों में झारखंड (Jharkhand) के साथ-साथ बिहार (Bihar), उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh), छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh), राजस्थान (Rajasthan) और मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) शामिल हैं. यहां टोटल फर्टिलिटी रेट (Total Fertility Rate या कुल प्रजनन दर) में […]

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मिथिलेश झा

रांची : विश्व के सबसे युवा देश के कई राज्यों में तेजी से आबादी (Population) बढ़ रही है. ऐसे राज्यों में झारखंड (Jharkhand) के साथ-साथ बिहार (Bihar), उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh), छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh), राजस्थान (Rajasthan) और मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) शामिल हैं. यहां टोटल फर्टिलिटी रेट (Total Fertility Rate या कुल प्रजनन दर) में अभी भी उतनी कमी नहीं आयी है, जितनी दक्षिण के राज्यों और पश्चिम बंगाल (West Bengal), हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh), पंजाब (Punjab), और महाराष्ट्र (Maharashtra) में. आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) में कहा गया है कि आगामी दो दशक में झारखंड (Jharkhand) की आबादी करीब 18 फीसदी की दर से बढ़ेगी. वर्ष 2041 में यहां की आबादी 4.46 करोड़ तक पहुंच जायेगी. इस दौरान सरकार को कई मोर्चे पर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. देश के आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) में जो आंकड़े सामने आये हैं, वह झारखंड (Jharkhand) की भयावह तस्वीर पेश करते हैं.

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शिक्षा (Education), स्वास्थ्य (Health) और रोजगार (Employment) के साथ-साथ आवास के मोर्चे पर झारखंड सरकार को अभी से काम शुरू कर देना होगा. देश का आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि जिन राज्यों में शिक्षा (Education) और स्वास्थ्य सुविधाएं (Health Care) बेहतर हैं, वहां आबादी (Population) घट रही है. लेकिन, पिछड़े राज्यों की स्थिति में आने वाले 20 साल बाद भी ज्यादा सुधार होने के आसार नहीं दिख रहे. हालांकि, आबादी को नियंत्रित करने में झारखंड ने बिहार ही नहीं, कई राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है.

वर्ष 2001 में देश का कुल जन्म दर 3.1 और बिहार-झारखंड में 4.4 थी. वर्ष 2011 की जनगणना में देश में यह दर 2.4, बिहार में 3.6 और झारखंड में 2.9 रही. वर्ष 2016 में यही दर देश में 2.3, बिहार में 3.3 और झारखंड में 2.6 रह गयी, जबकि 2021 में इसकी राष्ट्रीय दर 1.8 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि बिहार में यह 2.5 और झारखंड में 1.8 फीसदी रह जायेगी. झारखंड में कुल जन्म दर वर्ष 2041 तक 1.8 फीसदी पर ही बने रहने का अनुमान आर्थिक सर्वेक्षण में जाहिर किया गया है.

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वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर की बात करें, तो इसमें भी झारखंड ने बिहार, छत्तीसगढ़, जम्मू एवं कश्मीर जैसे राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है. 2001 से 2011 के बीच देश की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 1.77 फीसदी थी, तो झारखंड में 2.24 फीसदी. यह बिहार के 2.54, छत्तीसगढ़ के 2.26 और जम्मू एवं कश्मीर के 2.36 से कम है. वर्ष 2011-21 के बीच राष्ट्रीय जनसंख्या वृद्धि दर 1.12 रही, जबकि झारखंड की इससे कुछ ज्यादा 1.39 फीसदी. 2021-31 और 2031-41 के बीच राष्ट्रीय जनसंख्या वृद्धि दर क्रमश: 0.72 फीसदी और 0.46 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है, जो झारखंड में क्रमश: 0.97 और 0.82 फीसदी रह सकता है.

जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर बेहतर काम करने के बावजूद झारखंड सरकार को कई मोर्चों पर काम करना होगा. आबादी तो नियंत्रण में रहेगी, लेकिन बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ेगी. इनके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का इंतजाम करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी. वर्क फोर्स (कामगारों की संख्या) भी तेजी से बढ़ेगा, जिसके लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे.

स्कूलों की गुणवत्ता पर देना होगा ध्यान

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्ष 2041 में देश के लगभग सभी राज्यों में प्राथमिक विद्यालयों (प्राइमरी या एलीमेंट्री स्कूल) की संख्या जरूरत से ज्यादा होगी. सर्वेक्षण के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश में 40 फीसदी प्राथमिक विद्यालयों में 50 से कम बच्चे पढ़ते हैं. छत्तीसगढ़, असम और ओड़िशा में भी ऐसी स्थिति है. दिल्ली को छोड़ दें, तो पूरे देश में ऐसे स्कूलों की संख्या पिछले एक दशक में बढ़ी है. झारखंड में पिछले दिनों सरकार ने बच्चों की कम संख्या के आधार पर आसपास के दो स्कूलों को मर्ज करने का काम पहले ही शुरू कर चुकी है.

झारखंड में वर्ष 2041 मेें 58.7 फीसदी लोगों को होगी रोजगार की जरूरत

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्ष 2011 में झारखंड में 0-19 वर्ष की आयु वर्ग की आबादी 45.9 फीसदी थी, जो 2021 में 38.8, वर्ष 2031 में 31 और वर्ष 2041 में 28 फीसदी रह जायेगी. लेकिन, कामगारों की संख्या इस दौरान तेजी से बढ़ेगी. 20 से 59 वर्ष के आयु वर्ग की आबादी वर्ष 2011 में 46.9 फीसदी थी, जो 2021 में 52.8, वर्ष 2031 में 58.5 और वर्ष 2041 में 58.7 फीसदी हो जायेगी. बेरोजगारी के इस दौर में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.

बुजुर्गों की आबादी में भी होगा तेजी से इजाफा

बुजुर्गों की बात करें, तो झारखंड में इसका आंकड़ा भी तेजी से बढ़ेगा. वर्ष 2041 में कुल आबादी का 13.4 फीसदी हिस्सा 60 साल या इससे अधिक उम्र वाले लोगों का होगा. वर्ष 2011 में झारखंड में सिर्फ 7.2 फीसदी बुजुर्ग थे, जबकि 2021 में 8.4 और वर्ष 2031 में यह बढ़कर 10.6 फीसदी हो जायेंगे.

युवाओं को रोजगार, बुजुर्गों के लिए पेंशन का विकल्प तलाशना होगा

सरकार को 20 से 59 साल की उम्र के लोगों के लिए रोजगार के अवसर तलाशने होंगे, तो बुजुर्गों को मिलने वाली पेंशन का विकल्प भी तलाशना होगा. भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं में हो रही वृद्धि की वजह से लोगों की जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है. फलस्वरूप सरकार पर पेंशन का बोझ बढ़ रहा है. इसलिए जर्मनी, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, चीन और जापान जैसे विकसित देशों की तरह भारत में भी रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं. इन देशों में रिटायरमेंट की उम्र 66 से 70 वर्ष तक करने की बात चल रही है.

उल्लेखनीय है कि भारत में रिटायरमेंट की उम्र 60 वर्ष है. यहां रिटायरमेंट के बाद लोग 12.9 वर्ष तक जीते हैं. इसमें पुरुषों की उम्र 12.5 वर्ष और महिलाओं की 13.3 वर्ष मानी जाती है. हालांकि, यह अभी तक कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों से बहुत कम है.

बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की व्यवस्था करना चुनौती

स्वास्थ्य के मोर्चे पर आर्थिक समीक्षा ने चुनौतियों का तो जिक्र किया है, लेकिन राज्यों में क्या स्थिति है, इसके बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है. राष्ट्रीय स्तर पर बात करें, तो वर्ष 2016 में देश की आबादी 125 से 130 करोड़ के बीच थी. उस वक्त अस्पतालों में 10 लाख लोगों के लिए करीब 500 बेड उपलब्ध थे. वर्ष 2021 में आबादी 135 करोड़ या उससे अधिक होगी, तब 10 लाख लोगों के लिए करीब 475 बेड उपलब्ध होंगे, जबकि 2031 में आबादी 135 करोड़ से अधिक हो जायेगी, जबकि अस्पतालों में बेड की संख्या 450 से कम रह जायेगी. वर्ष 2041 में जब आबादी 150 करोड़ से अधिक हो चुकी होगी, तब 10 लाख लोगों के लिए अपने देश में 425 से भी कम बेड अस्पतालों में उपलब्ध होंगे. ‘नेशनल हेल्थ प्रोफाइल’ की वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 11,082 लोगों के लिए एक डॉक्टर उपलब्ध है. वहीं, झारखंड में यह संख्या 18,518 है. ज्ञात हो कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) कहता है कि 1,000 की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए.

1,68,363.6 अरब रुपये का देश में करना होगा निवेश

वर्ष 2015 में प्राइसवाटरहाउकूपर्स की एक रिपोर्ट आयी थी, जिसमें कहा गया था कि 20 साल में भारत को 36 लाख बेड बढ़ाने होंगे, जबकि 30 लाख नये डॉक्टरों और 60 लाख नर्सों की जरूरत होगी. कंसल्टेंसी फर्म ने ‘द फ्यूचर ऑफ इंडिया : द विनिंग लीप’ में वर्ष 2034 तक का परिदृश्य पेश करते हुए कहा था कि एक दशक के दौरान भारत में हर साल 1 लाख बेड जोड़े जा रहे हैं. इस रफ्तार को और तेज करने की जरूरत है. यदि इसी रफ्तार से काम होता रहा, तो 2034 में 16 लाख बेड कम पड़ जायेंगे.

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वर्ष 2015 के आंकड़ों पर गौर करें, तो देश में एक हजार की आबादी के लिए 0.65 डॉक्टर, 1.3 नर्स और 1.3 बेड उपलब्ध हैं. कंसल्टेंसी फर्म ने वर्ष 2034 तक इसे बढ़ाकर प्रति एक हजार की आबादी के लिए 2.5 डॉक्टर, 5 नर्स और 3.5 बेड करने की जरूरत पर बल दिया था. फर्म ने कहा था कि इसके लिए सरकार को 2,450 अरब डॉलर (करीब 1,68,363.6 अरब रुपये) के निवेश की जरूरत होगी.

आंकड़ों के अभाव में नहीं बन पा रही नीतियां

आर्थिक सर्वेक्षण में यह स्वीकार किया गया है कि कुछ राज्यों में कुल जन्म दर में गिरावट से स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन स्थिति उतनी अच्छी नहीं है. मुख्य समस्या देश में उपलब्ध मेडिकल सुविधा के बारे में विशिष्ट आंकड़ों का नहीं होना है. खासकर निजी अस्पतालों के बारे में. आर्थिक सर्वेक्षण में सरकारी अस्पतालों के आंकड़ों को ही शामिल किया गया है, जिसकी वजह से स्वास्थ्य सेवाओं की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती. फलस्वरूप न तो सही ढंग से नीतियां बन पाती हैं, न ही लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पाती हैं.

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