उद्योग जगत ने RBI की मौद्रिक समीक्षा नीति पर लगायी मुहर, केंद्रीय बैंक ने उम्मीदों के अनुरूप उठाया कदम

Updated at : 07 Feb 2018 8:13 PM (IST)
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उद्योग जगत ने RBI की मौद्रिक समीक्षा नीति पर लगायी मुहर, केंद्रीय बैंक ने उम्मीदों के अनुरूप उठाया कदम

नयी दिल्ली : रिजर्व बैंक की ओर से लगातार तीसरी बार मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किये जाने को उद्योग जगत ने उम्मीद के अनुरूप बताया है. रिजर्व बैंक के इस कदम पर अपनी मुहर लगाते हुए उद्योग जगत के लोगों का कहना है कि मुद्रास्फीति को लेकर चिंता तथा राजकोषीय […]

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नयी दिल्ली : रिजर्व बैंक की ओर से लगातार तीसरी बार मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किये जाने को उद्योग जगत ने उम्मीद के अनुरूप बताया है. रिजर्व बैंक के इस कदम पर अपनी मुहर लगाते हुए उद्योग जगत के लोगों का कहना है कि मुद्रास्फीति को लेकर चिंता तथा राजकोषीय घाटा बढ़ने के अनुमान के बीच मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत दर में कटौती की गुंजाइश नहीं थी. हालांकि, उद्योग मंडलों का मानना है कि यदि नीतिगत दर में कटौती की जाती, तो इससे निजी निवेश बढ़ाने में मदद मिलती.

रिजर्व बैंक ने बुधवार को चालू वित्त वर्ष की आखिरी मौद्रिक समीक्षा में रेपो दर को छह फीसदी पर कायम रखा है. रिवर्स रेपो दर को 5.75 फीसदी पर बरकरार रखा गया है. उद्योग मंडल एसोचैम के अध्यक्ष संदीप जाजोदिया ने कहा कि एक तरह के रिजर्व बैंक का फैसला उद्योग जगत के लिए राहत वाला है. मुद्रास्फीति के पांच फीसदी के पार जाने, कच्चे तेल की कीमतों को लेकर अनिश्चितता को लेकर रिजर्व बैंक ने जो चिंता जतायी है, वह उचित है.

पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष अनिल खेतान ने रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में बदलाव नहीं करने को एक सोचा-समझा रुख बताया. उन्होंने कहा कि बाजार में यह विचार था कि राजकोषीय मोर्चे पर चूक तथा बढ़ती मुद्रास्फीति के मद्देनजर केंद्रीय बैंक सख्त कदम उठा सकता है. हालांकि, फिक्की के अध्यक्ष राशेष शाह का मानना है कि रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में उल्लेखनीय कटौती का मौका गंवा दिया है. उन्होंने कहा कि पिछले वित्त वर्ष के दौरान रिजर्व बैंक ने सिर्फ एक बार ब्याज दर में चौथाई फीसदी की कटौती की है.

हाल में पेश आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि 2017-18 के दौरान मुद्रास्फीति औसतन छह साल के निचले स्तर पर है. शाह ने उम्मीद जतायी कि आगे चलकर केंद्रीय बैंक वृद्धि की चिंताओं को भी उतना ही महत्व देगा. विशेषकर यह देखते हुए कि भारत में मुद्रास्फीतिक दबाव मुख्य रूप से कृषि के मोर्चे पर आपूर्ति पक्ष कारकों से है.

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