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कार-बाइक्स में दिखेगा Flex Fuel का जादू, नहीं बचेगा पेट्रोल-डीजल में काबू

Updated at : 25 Apr 2024 1:34 PM (IST)
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कार-बाइक्स में दिखेगा Flex Fuel का जादू, नहीं बचेगा पेट्रोल-डीजल में काबू

फ्लेक्स फ्यूल वाली टोयोटा इनोवा हाईक्रॉस कार. फोटो: सोशल मीडिया

Flex Fuel: केंद्रीय सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने जुलाई 2023 में कहा था, 'गाड़ियों में अगर 60 फीसदी इथेनॉल और 40 फीसदी बिजली का इस्तेमाल किया जाता है, तो पेट्रोल 15 रुपये प्रति लीटर पर उपलब्ध हो सकता है. इससे प्रदूषण को खात्म करने में मदद तो मिलेगी ही. साथ ही, ईंधन के आयात को भी कम किया जा सकेगा और देश आत्मनिर्भर बनेगा.'

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Flex Fuel: भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने के लिए वाहन निर्माता कंपनियों और सरकार का अब फ्लेक्स फ्यूल और वैकल्पिक ईंधन पर पूरा जोर है. फ्लेक्स फ्यूल तकनीक की सफलता और इससे मिलने वाले लाभ को लेकर लंबे अरसे से बहस जारी है. इस बीच, जापानी कार निर्माता कंपनी टोयोटा किर्लोस्कर मोटर ने पिछले साल सौ फीसदी फ्लेक्स फ्यूल की मदद से चलने वाली इनोवा हाईक्रॉस के कॉन्सेप्ट मॉडल को पेश भी कर दिया है. इतना ही नहीं, देश के आम आदमी के लिए कार बनाने वाली कंपनी मारुति सुजुकी ने भी फ्लेक्स फ्यूल से चलने वाली कार को दिसंबर 2023 में दिल्ली में आयोजित ऑटो एक्सपो में शोकेस किया है. इसके अलावा, फ्लेक्स फ्यूल से चलने वाली मोटरसाइकिलों को भी बाजार में पेश किया जा रहा है. इसे देखने के बाद ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में कार-बाइक्स में फ्लेक्स फ्यूल तकनीक का ही जादू दिखेगा. आइए, जानते हैं कि यह फ्लेक्स फ्यूल तकनीक कैसे काम करती है और यह ईंधन कैसे बनता है. इसके लाभ क्या हैं.

फ्लेक्स फ्यूल क्या है?

फ्लेक्स फ्यूल भी पेट्रोल-डीजल की तरह ही आंतरिक दहन ईंधन है, जो गैसोलीन, मीथेनॉल या इथेनॉल से तैयार किया जाता है. मूल रूप से फ्लेक्स फ्यूल अल्कोहल बेस्ड ईंधन है. भारत में यह इथेनॉल से तैयार होता है. इथेनॉल गन्ना, मक्का, शलगम, शकरकंद आदि से बनता है. खासकर, चीनी मिलों में इसका उत्पादन अधिक होता है. इस ईंधन को पेट्रोल-डीजल के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है. इसे बनाने के लिए स्टार्च और शुगर का फर्मेंटेशन किया जाता है. भारत में गन्ने की फसल बहुत बड़ी मात्रा में होती है, इसलिए ऐसे ईंधन को बड़े स्तर पर बनाने में किसी तरह की परेशानी नहीं आएगी.

केंद्रीय सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने जुलाई 2023 में कहा था, ”गाड़ियों में अगर 60 फीसदी इथेनॉल और 40 फीसदी बिजली का इस्तेमाल किया जाता है, तो पेट्रोल 15 रुपये प्रति लीटर पर उपलब्ध हो सकता है. इससे प्रदूषण को खात्म करने में मदद तो मिलेगी ही. साथ ही, ईंधन के आयात को भी कम किया जा सकेगा और देश आत्मनिर्भर बनेगा.”

कैसा होता है फ्लेक्स फ्यूल इंजन

फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियों के इंजन को पेट्रोल और इथेनॉल के मिश्रण से चलाने के लायक बनाया जाता है, जिसे हाइब्रिड इंजन कहा जाता है. इसमें इथेनॉल की मात्रा 80 फीसदी और पेट्रोल की मात्रा 20 फीसदी होती है. हाइब्रिड वाले इंजन को पावर जेनरेट करने के लिए बैटरी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तरह की पहल से कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है. देश में टोयोटा, टाटा, मारुति सुजुकी और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसी कंपनियां फ्लेक्स फ्यूल से चलने वाली कारों का निर्माण कर रही हैं, जबकि हीरो मोटोकॉर्प, बजाज ऑटो और टीवीएस जैसी कंपनियां फ्लेक्स फ्यूल बाइक बना रही हैं.

कहां मिलता है फ्लेक्स फ्यूल

अब सवाल यह पैदा होता है कि जब देश में फ्लेक्स फ्यूल से चलने वाली हाइब्रिड गाड़ियां आने लगी हैं, तो यह ईंधन कहां मिलेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि इलेक्ट्रिक वाहन की तरह इन हाइब्रिड गाड़ियों को खरीदने के बाद लोगों को फ्लेक्स फ्यूल के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा? इसका आसान से उत्तर है, ‘नहीं’. अब आप कहिए कि क्यों? इसका जवाब यह है कि हाइब्रिड गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाला फ्लेक्स फ्यूल भी पेट्रोल-डीजल की तरह पेट्रोल पंप पर ही मिलेगा और मिलेगा नहीं, बल्कि यह मिल रहा है. हालांकि, अभी 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल बेचा जा रहा है, लेकिन हाइब्रिड गाड़ियों की संख्या बढ़ने के बाद पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा 80 फीसदी तक बढ़ जाएगी. धीरे-धीरे इथेनॉल की मात्रा 100 फीसदी तक पहुंच जाएगी और पेट्रोल गायब हो जाएगा.

फ्लेक्स फ्यूल तकनीक के लाभ

फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के आने से भारत में ईंधन के दाम घट जाएंगे. फ्लेक्स फ्यूल वाहन चालक को पेट्रोल-डीजल के दाम में उतार-चढ़ाव होने पर अपनी मर्जी के ईंधन चुन सकेंगे. मान लीजिए कि अगर इथेनॉल का दाम पेट्रोल से कम है, तो चालक इथेनॉल मिश्रण का अधिक अनुपात का विकल्प चुन सकता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके इस्तेमाल से वायु प्रदूषण कम होगा और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा. यह पारंपरिक पेट्रोल के मुकाबले कार्बन मोनोऑक्साइड कम उत्सर्जित करता है. इसके अलावा, ईंधन के मामले में देश आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ेगा. हमें आयातित कच्चे तेल पर आश्रित नहीं रहना पड़ेगा. इसके साथ ही, गन्ना, मकई, शकरकंद के उत्पादक किसानों की आमदनी बढ़ेगी और देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे.

फ्लेक्स फ्यूल क्या है और यह कैसे बनता है?

फ्लेक्स फ्यूल एक आंतरिक दहन ईंधन है जो गैसोलीन, मीथेनॉल या इथेनॉल से बना होता है। भारत में, यह मुख्य रूप से इथेनॉल से बनाया जाता है, जो गन्ना, मक्का, शलगम आदि से फर्मेंटेशन द्वारा प्राप्त किया जाता है।

फ्लेक्स फ्यूल तकनीक के क्या लाभ हैं?

फ्लेक्स फ्यूल के उपयोग से ईंधन की लागत कम हो सकती है, वायु प्रदूषण में कमी आएगी, और देश आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ेगा। यह पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में कम कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जित करता है।

फ्लेक्स फ्यूल इंजन कैसे काम करता है?

फ्लेक्स फ्यूल इंजन पेट्रोल और इथेनॉल के मिश्रण से काम करता है, जिसमें आमतौर पर 80% इथेनॉल और 20% पेट्रोल होता है। यह हाइब्रिड इंजन पावर जेनरेट करने के लिए बैटरी का भी उपयोग कर सकता है।

फ्लेक्स फ्यूल कहां मिलेगा?

फ्लेक्स फ्यूल पेट्रोल पंप पर उपलब्ध होगा, जैसे कि 20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल अभी बेचा जा रहा है। जैसे-जैसे हाइब्रिड गाड़ियों की संख्या बढ़ेगी, इथेनॉल का अनुपात बढ़ेगा और अंततः पेट्रोल का उपयोग कम हो जाएगा।

क्या फ्लेक्स फ्यूल से चलने वाली गाड़ियों के लिए कोई विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है?

नहीं, फ्लेक्स फ्यूल से चलने वाली गाड़ियों के लिए वर्तमान पेट्रोल पंपों पर ही ईंधन उपलब्ध होगा। इससे उपभोक्ताओं को किसी अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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