ऑटो रिक्शा को क्यों कहते हैं टेम्पो, पहली बार किसने किया इस्तेमाल?

भारत के आम आदमी की सवारी टेम्पो. फोटो: सोशल मीडिया
Bizarre News: थ्री-व्हीलर को कहीं पर ऑटो रिक्शा कहा जाता है, तो कहीं पर टेम्पो. आम तौर पर देश के अधिकांश जगहों पर टेम्पो ही कहा जाता है. आखिर, इसका टेम्पो नाम किसने रखा.
अक्सरहां, आप सड़कों पर तीन पहियों वाली गाड़ी को चलते हुए देखते होंगे. इस वाहन को कहीं पर टेम्पो और कहीं-कहीं ऑटो रिक्शा कहा जाता है. देश के अधिकांश जगहों पर इसे टेम्पो ही कहा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर तीन पहिए वाली इस ऑटो रिक्शा को टेम्पो क्यों कहते हैं. इसके बारे में जब आप जानेंगे, तो चौंक जाएंगे और आपको इससे जुड़ी कई अच्छी जानकारियां हासिल हो सकती हैं. आइए, तो फिर इसके बारे में कुछ रोचक बातें जानते हैं.
टेम्पो क्या है?
मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, टेम्पो जर्मन वाहन निर्माता कंपनी का नाम है. इसके विडाल एंड सन टेम्पो वर्क जीएमबीएच के नाम से भी जाना जाता है. यह कंपनी हैम्बर्ग में स्थापित थी. जर्मन नागरिक ऑस्कर विडाल ने साल 1924 में टेम्पो नामक कंपनी की शुरुआत की थी. उस जमाने में यह जर्मनी की सबसे लोकप्रिय कंपनियों में से एक थी. यह कंपनी उस समय मैटाडोर वैन और हैनसीट थ्री व्हीलर बनाती थी. हैनसीट थ्री व्हीलर को ही ऑटो रिक्शा या फिर टेम्पो कहा जाता है. साल 1930-40 के दौरान इस कंपनी ने सेना के लिए छोटी मिलिट्री गाड़ियों का भी उत्पादन किया है.
भारत में कब शुरू हुआ टेम्पो का उत्पादन
जर्मनी के ऑस्कर विडाल के थ्री व्हीलर टेम्पो साल 1958 के दौरान भारत आया. यहां पर इसका उत्पादन फिरोदिया ग्रुप किया करता था. 1960 के दशक में यह गाड़ी भारत में काफी पॉपुलर हो गई. फिरोदिया ग्रुप इस गाड़ी का उत्पादन मुंबई के गोरेगांव स्थित प्लांट में किया करता था. हालांकि, मुंबई में इस थ्री-व्हीलर को आज भी ऑटो रिक्शा कहा जाता है, लेकिन देश के दूसरे हिस्से में इसे टेम्पो ही कहते हैं.
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अब आने लगा सीएनजी और इलेक्ट्रिक टेम्पो
भारत के छोटे शहरों में लोकप्रिय सार्वजनिक सवारी टेम्पो अब सीएनजी और इलेक्ट्रिक इंजन के साथ भी आने लगा है. इसका कारण यह है कि पेट्रोल और डीजल इंजन वाले टेम्पो से वायु प्रदूषण काफी अधिक होता है. इसलिए सबसे पहले इसे सीएनजी इंजन के साथ बाजार में उतारा गया. अब यह इलेक्ट्रिक इंजन के साथ भी आने लगा है. इन दोनों प्रकार के टेम्पो से वायु प्रदूषण नहीं होता है.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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