धर्म और आदमी का रिश्ता
Updated at : 10 Jan 2020 4:24 AM (IST)
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सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार drsureshkant@gmail.com अपने सभी पर्यायों के साथ धर्म और आदमी का रिश्ता अंडे और मुर्गी के रिश्ते जैसा है. पता ही नहीं चलता कि किसने किसे बनाया. वैसे दिमाग से काम लिया जाये, हालांकि धर्म के मामले में कोई दिमाग से काम लेता नहीं है, फिर भी अगर ले लिया जाये, तो […]
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सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
drsureshkant@gmail.com
अपने सभी पर्यायों के साथ धर्म और आदमी का रिश्ता अंडे और मुर्गी के रिश्ते जैसा है. पता ही नहीं चलता कि किसने किसे बनाया. वैसे दिमाग से काम लिया जाये, हालांकि धर्म के मामले में कोई दिमाग से काम लेता नहीं है, फिर भी अगर ले लिया जाये, तो साफ पता चल जाता है कि आदमी ने ही धर्म को बनाया होगा अपनी सुविधा के लिए.
लेकिन फिर धर्म आदमी की सबसे बड़ी असुविधा बन गया, और वह इसलिए कि वह भूल गया कि उसी ने धर्म को बनाया है. उसे यह संदेह होने लगा कि कहीं धर्म ने ही तो उसे नहीं बनाया? संदेह गहराते-गहराते विश्वास बन गया कि उसने धर्म को अपने लिए नहीं, बल्कि धर्म ने उसे अपने लिए बनाया है, और इसलिए उसे धर्म के काम आना जरूरी लगने लगा.
और तब से धर्म की सारी व्याख्याएं भी उलट गयीं. पहले समझा जाता था कि धर्म वह है, जो धारण करता है- धारयतीति धर्म:. बाद में समझदारों ने समझाया, मतलब जिन्होंने भी समझाया, वे समझदार कहलाये, कि जो धारण करता है, वह धर्म नहीं है, बल्कि जिसे धारण किया जाता है, वह धर्म होता है. धर्म ने भी सोचा होगा कि जब ऐसा है, तो मैं क्यों इसे धारण करूं. लिहाजा उसने आदमी को अपने ऊपर से उतारा और खुद उसके ऊपर चढ़ बैठा.
सिंदबाद की पांचवीं यात्रा वाले उस बूढ़े की तरह, जो देखने में तो कमजोर नजर आता है और सिंदबाद से कंधे पर बैठाकर नदी पार करा देने की गुजारिश करता है, पर फिर उतरने का नाम नहीं लेता और पैरों से उसके गले को इस तरह जकड़ लेता है कि सिंदबाद के उससे पीछा छुड़ाने के सारे प्रयत्न विफल हो जाते हैं.
फिर तो वह रात-दिन उठते-बैठते, सोते-जागते उसकी गरदन पर सवार रहता है. अंतत: सिंदबाद किस तरकीब से अपने ऊपर लदे और जी का जंजाल बने उस बूढ़े को उतार फेंकता है, यह आप मूल किताब में ही पढ़कर जानें और उससे धर्म के संबंध में भी प्रेरणा ग्रहण करें.
धर्म की दूसरी व्याख्या यह की जाती थी कि रक्षा किये जाने पर धर्म भी रक्षा करता है- धर्मो रक्षति रक्षित:. तो पहले तो आदमी ने धर्म की रक्षा इसलिए की, ताकि धर्म भी उसकी रक्षा कर सके, पर फिर वह इस बात को भी भूल गया. उसने समझा कि बीच-बीच में धर्म की ही रक्षा करनी जरूरी होती है, वरना वह खतरे में पड़ जाता है.
और धर्म की रक्षा करने का सबसे सरल उपाय उसकी नजर में है दलितों को पीटना, या स्वाद बदलने के लिए छात्रों को ‘घर में घुसकर मारने’ की तर्ज पर ‘हॉस्टल में घुसकर’ मारना. इससे कमजोर पड़े धर्म में जान आ जाती है. लेकिन फिर, रक्षा किये जाने से तो अधर्म भी रक्षा कर देता है, बल्कि धर्म से कहीं ज्यादा कर देता है.
इस धर्म का पाखंड से भी नाता है. पहले धर्म के ही एक पंथ या संप्रदाय को ‘पाखंड’ कहा जाता था. यानी ‘पाखंड’ का मूल अर्थ ढकोसला नहीं है, वह अर्थ तो ‘पाखंड’ में तब आया, जब उसमें पाखंड आ गया. धर्म का असर देखकर उसकी तुलना अफीम से भी की जाने लगी, तो क्या आश्चर्य?
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