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चंद्रमा पर न्यूक्लियर रिएक्टर क्यों लगाना चाहता है अमेरिका? नासा-DoE 2030 तक पूरा करेंगे लक्ष्य

Updated at : 21 Feb 2026 2:52 PM (IST)
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US wants to Put Nuclear Reactor on Moon NASA DoE targets 2030 Power Tussle China Russia.

चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर की सांकेतिक तस्वीर. फोटो- एआई जेनरेटेड.

Nuclear Reactor on Moon: अमेरिका 2030 तक चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर लगाना चाहता है. इसमें उसके दो सबसे अहम संस्थाएं NASA और ऊर्जा विभाग पूरा जोर लगा रहे हैं. लेकिन अमेरिका इतनी जल्दी और इतना बड़ा कदम क्यों उठा रहा है?

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Nuclear Reactor on Moon: अंतरिक्ष की रेस एक ऐसी दौड़ है, जो मानव इतिहास के साथ ही शुरू हो गई. हर सभ्यता को इस स्पेस के पार कहीं स्वर्ग नजर आया है. सूर्य दिन के देवता बने, तो चंद्रमा रात का प्रकाश लेकर आए. सूर्य पृथ्वी से 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर किमी दूर है. आज तक मानव (नासा का पार्कर सोलर प्रोब) सूर्य के सबसे नजदीक 61 लाख किलोमीटर तक ही पहुंच पाया है. आप समझते ही हैं क्यों. गर्मी. सूर्य का हॉट-हॉट होना बड़ा कारण है. लेकिन मनुष्य ठंडे-ठंडे चंद्रमा पर जरूर कदम रख चुका है. अब बात चंद्रमा पर कदम रखने से कहीं आगे पहुंच चुकी है. कुछ दार्शनिक वैज्ञानिक सोच वाले खरबपति (एलन मस्क) तो वहां पर कॉलोनी बसाने की बातें भी करने लगे हैं. खैर, अभी वह दूर की कौड़ी है. फिलहाल चंद्रमा पर न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने की योजना पर काम चल रहा है. लेकिन क्यों? आइये जानते हैं. 

नासा और अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DOE) ने चंद्रमा की सतह पर परमाणु विखंडन (न्यूक्लियर फिशन) रिएक्टर विकसित करने की अपनी संयुक्त परियोजना को फिर से पुष्ट किया है. दोनों का यह मिशन आर्टेमिस अभियान और फ्यूचर के मंगल मिशन का एक चरण है. अंतरिक्ष एजेंसी की घोषणा के अनुसार, दोनों संस्थाएं 2030 तक इस सुविधा के विकास चरण को पूरा करने की उम्मीद कर रही हैं. 

चंद्रमा पर न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने से क्या हासिल होगा?

यह रिएक्टर प्रस्तावित चंद्र सतह मिशनों के लिए वर्षों तक लगातार बिजली उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया जाएगा, जिससे पृथ्वी से बार-बार ईंधन भेजने की आवश्यकता नहीं रहेगी. चंद्र बेस, वैज्ञानिक प्रयोग, संचार सिस्टम और जीवन रक्षक सुविधाएं 24×7 चल सकेंगी. नासा के प्रशासक जैरेड इसाकमैन को उम्मीद है कि इससे अंतरिक्ष अन्वेषण और खोज के स्वर्ण युग की शुरुआत के लिए आवश्यक क्षमताएं विकसित की जा सकेंगी. 

इसके साथ ही अमेरिका चंद्रमा पर न्यूक्लियर फिशन रिएक्टर इसलिए लगाना चाहता है क्योंकि भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए चंद्रमा लांच पैड की तरह बनेगा. न्यूक्लियर रिएक्टर भरोसेमंद और लगातार ऊर्जा सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है. NASA और अमेरिकी DOE मानते हैं कि चांद पर मानव और रोबोटिक मौजूदगी को स्थायी बनाने के लिए सौर ऊर्जा पर्याप्त नहीं है, क्योंकि वहां लंबे समय तक अंधेरा, अत्यधिक ठंड और कठिन पर्यावरणीय हालात रहते हैं.

अमेरिका यह भी मानता है कि चीन और रूस जैसे देश चंद्रमा पर न्यूक्लियर तकनीक को आगे बढ़ा रहे हैं, ऐसे में अंतरिक्ष में रणनीतिक बढ़त बनाए रखना जरूरी है. चंद्रमा पर न्यूक्लियर रिएक्टर न सिर्फ अमेरिकी अंतरिक्ष नेतृत्व को मजबूत करेगा, बल्कि गहरे अंतरिक्ष अभियानों, अंतरिक्ष वाणिज्य और भविष्य की खोजों के लिए एक स्थायी और शक्तिशाली ऊर्जा आधार भी तैयार करेगा.

लेकिन! जैसा बड़ा लक्ष्य वैसी ही चुनौतियां भी. 

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क्या-क्या बाधाएं होंगी?

पृथ्वी पर ही सुरक्षित और भरोसेमंद परमाणु रिएक्टर बनाना कठिन होता है, जबकि चंद्रमा तो कहीं ज्यादा जटिल जगह है. वहां की पर्यावरणीय परिस्थितियां फिशन रिएक्टर के डिजाइन में बड़ी बाधाएं पैदा करती हैं. सबसे बड़ी चुनौती अपशिष्ट ऊष्मा (वेस्ट हीट) का प्रबंधन है.

पृथ्वी पर रिएक्टर कूलिंग टावर पानी का उपयोग करते हैं, जो भाप बनकर अतिरिक्त ऊर्जा को वातावरण में छोड़ देता है. लेकिन कम गुरुत्वाकर्षण और कम दाब की स्थितियों में तरल पदार्थ अलग तरह से व्यवहार करते हैं. चंद्रमा लगभग निर्वात है और वहां कोई घना वातावरण नहीं है जो गर्मी को फैलाने में मदद कर सके. 

संभावित समाधानों में ठोस-अवस्था (सॉलिड-स्टेट) कंडक्शन और तरल धातु कूलेंट शामिल हैं, लेकिन इनमें से हर विकल्प डिजाइन को और जटिल बना देता है.

चंद्रमा की सतह धूल से ढकी है. चंद्र धूल बेहद खुरदरी होती है और सौर विकिरण से विद्युत-आवेशित रहती है. यह मंगल की तरह यह धूल-आंधियों वाली नहीं है. यह हर चीज से चिपक जाती है, इसलिए चंद्रमा पर इस्तेमाल होने वाली किसी भी मशीनरी को इस तरह डिजाइन करना होगा कि धूल उसके काम में बाधा न बने.

साथ ही, पास में काम करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त विकिरण-रोधक (रेडिएशन शील्डिंग) भी जरूरी होगी. इन सभी प्रणालियों को इतना मजबूत होना चाहिए कि रखरखाव और मरम्मत न्यूनतम रहे.

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मिशन का रिसर्च एडवांस फेज में पहुंच चुका है

चंद्रमा पर एक फिशन रिएक्टर स्पेस रिसर्च के लिए एक असाधारण संसाधन साबित हो सकता है.  वैज्ञानिक इन तकनीकी समस्याओं पर वर्षों से काम कर रहे हैं, इसलिए नासा और ऊर्जा विभाग बिल्कुल शुरुआत से नहीं शुरू कर रहे हैं. नासा और अमेरिकी ऊर्जा विभाग बीते करीब 50 वर्षों से अंतरिक्ष के लिए न्यूक्लियर सिस्टम विकसित करने में मिलकर काम कर रहे हैं. शुरुआती दौर में दोनों एजेंसियों का जोर रेडियोआइसोटोप पावर सोर्स पर रहा. 

ताजा अपडेट में इससे आगे बढ़ते हुए दोनों ने मिलकर किलोपावर परियोजना के तहत छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर का सफल परीक्षण कर लिया है. अब नासा और DOE के द्वारा ऐसा रिएक्टर डिजाइन और विकसित किया जा रहा है जो कम से कम 40 किलोवाट बिजली पैदा कर सके. इतनी ऊर्जा कि जिससे लगभग 30 घरों को 10 वर्षों तक लगातार चलाया जा सके. 

नासा और DOE के द्वारा इस रिएक्टर का विकास, उसमें ईंधन भरना, जरूरी मंजूरियां हासिल करना और उसे लॉन्च के लिए पूरी तरह तैयार करने का काम तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा. हालांकि, इसे वास्तव में चंद्रमा पर कब तैनात किया जाएगा, इसकी कोई पक्की समयसीमा अभी तय नहीं है. प्रारंभिक डिजाइन चरण पूरा हो चुका है, लेकिन उस डिजाइन को उड़ान-योग्य हार्डवेयर में बदलना एक धीमी प्रक्रिया है.

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Anant Narayan Shukla

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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