तारिक रहमान बोले- मेरे भाई के खून से रंगा 21 फरवरी, क्या मैं इसे कभी भूल सकता हूँ? यूनुस के जाते ही बदला बांग्लादेश!

बांग्लादेश के पीएम तारिक रहमान. फोटो- एक्स.
Bangladesh 21 February: बांग्लादेश के इतिहास में 21 फरवरी आम तारीख नहीं है. इस दिन बांग्ला भाषा के मतवालों ने न केवल अपनी जान देकर भाषा की रक्षा की, बल्कि पश्चिमी पाकिस्तान से खुद की आजादी की नींव भी डाली थी. 2026 में तारिक रहमान ने अपने उन्हीं शहीदों को याद करते हुए मीनार पर पुष्पांजलि दी.
Bangladesh 21 February: 1999 में यूनेस्को (UNESCO) ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया गया है. दुनिया भर के लोगों की तरह बांग्लादेश भी इस दिन भाषा आंदोलन के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देता है और उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करता है. बांग्लादेश ने भाषा आंदोलन के अमर शहीदों को गहरी श्रद्धा और सम्मान अर्पित किया है. 1952 में 21 फरवरी के दिन, ढाका की सड़कों पर उतरे युवा छात्रों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला की गरिमा स्थापित करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी.
1947 में भारत से अलग हुए पाकिस्तान में बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) भी शामिल था. लेकिन भाषा के लिहाज से वह पश्चिमी पाकिस्तान से पूरी तरह अलग था. केवल भाषा ही नहीं संस्कृति भी अलग थी. उस समय पश्चिमी पाकिस्तान की सरकार ने 27 जनवरी 1952 उर्दू को पाकिस्तान की एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया था. इसके विरोध में ढाका के छात्रों ने आंदोलन शुरू किया, जिस पर शासन ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी कर दी. इसके बावजूद आंदोलन और तेज होता गया और अंततः पश्चिमी पाकिस्तानी हुकूमत को बांग्ला को राजभाषा के रूप में मान्यता देनी पड़ी.
कितने लोग मारे गए प्रदर्शनों में
इस आंदोलन के दौरान मरने वालो की संख्या को लेकर हमेशा डिबेट रहा. ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, कुछ आंकड़ों में 5 लोग मारे गए, अमेरिकी कांसुलेट ने यह संख्या 14 बताई वहीं, निर्वासित पाकिस्तानी राइटर लाल खान ने 26 लोगों के मारे जाने की सूचना दी है. पश्चिमी पाकिस्तान की आर्मी ने पूर्वी पाकिस्तान में क्रूरता और दमन का ही सहारा लिया. इसलिए 1971 तक आते-आते बांग्लादेश, पाकिस्तान से अलग होकर नए राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया.
तारिक रहमान के आने से बदला बांग्लादेश का माहौल
खैर, 1971 से 2026 तक बांग्लादेश के इतिहास में बहुत कुछ हो चुका है. इस साल के विहान में तारिक रहमान नाम का तारा चमक रहा. शेख हसीना गुजरे दिनों की बात हो चुकी हैं. हालांकि, हसीना के सत्ता से बेदखल किए जाने के बाद से बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के शासन में कट्टरता बढ़ती रही, भारत से संबंध खराब करने की नीति बढ़ती रही, भड़काऊ बयान आते रहे. लेकिन, तारिक रहमान 2.0 बदले हुए नजर आ रहे हैं. वह 12 फरवरी को हुए 13वें जातीय संसद के आम चुनाव में लैंडस्लाइड विक्ट्री दर्ज कर बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने हैं.
‘मेरे भाई के खून से रंगा 21 फरवरी, क्या मैं इसे कभी भूल सकता हूँ?’
21 फरवरी 2026 के दिन की शुरुआत में राष्ट्रपति शहाबुद्दीन अहमद और प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने केंद्रीय शहीद मीनार पर पुष्पांजलि अर्पित की. बाद में बड़ी संख्या में लोग शहीद मीनार पर एकत्र हुए और अमर गीत, “आमार भाईयेर रोक्ते रंगानो एकुशे फरवरी, आमी की भूलिते पारी?” (मेरे भाई के खून से रंगा 21 फरवरी, क्या मैं इसे कभी भूल सकता हूँ?) का सामूहिक गायन किया. हजारों लोग नंगे पांव शहीद मीनार पहुंचे और पुष्प अर्पित किए. विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और सांस्कृतिक समूहों से जुड़े पुरुषों और महिलाओं ने भाषा आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी.
राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने अपने संदेश में कहा, ‘मातृभाषा को दबाने का यह अन्यायपूर्ण प्रयास एक गहरे राष्ट्रीय संकल्प का कारण बना. तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान, आज के बांग्लादेश के छात्रों और नागरिकों ने दृढ़ प्रतिरोध किया. सर्वोच्च बलिदान के माध्यम से उन्होंने अपनी मातृभाषा का अधिकार हासिल किया और हमारी विशिष्ट राष्ट्रीय चेतना का जन्म हुआ. 1999 में शहीद दिवस को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में वैश्विक मान्यता मिलना हमारे राष्ट्र के लिए गर्व का क्षण है. आज ‘एकुशे’ की भावना दुनिया भर के लोगों को अपनी भाषाओं और संस्कृतियों की रक्षा के लिए प्रेरित करती है.’
प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भी भाषा आंदोलन के नायकों को याद करते हुए कहा, “भाषा आंदोलन ने न केवल हमारी मातृभाषा का अधिकार स्थापित किया, बल्कि एक साझा भाषा, लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और सांस्कृतिक पहचान पर आधारित राष्ट्रीय संप्रभुता की मजबूत नींव भी रखी.” उन्होंने अपनी पत्नी और बेटी के साथ मीनार पर पुष्प गुच्छ भी अर्पित किए.
सकल बांग्लादेश ने 1952 के शहीदों को किया नमन
एएनआई से बातचीत में कर्मोजीबी नारी की अतिरिक्त कार्यकारी निदेशक सुनजीदा सुल्तान ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हमें उस संघर्ष की याद दिलाता है, जिसके जरिए बांग्ला को मातृभाषा के रूप में मान्यता मिली. उन्होंने बताया कि पाकिस्तान काल में उर्दू थोपने की कोशिशों का लोगों ने विरोध किया और बांग्ला के सम्मान के लिए व्यापक आंदोलन खड़ा किया.
निजी कर्मचारी ताजवार महमूद ने कहा कि 1952 में छात्रों और आम लोगों ने भाषा उत्पीड़न के खिलाफ खड़े होकर बांग्ला भाषा, संस्कृति और विरासत की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, और 74 साल बाद भी देशभर के लोग इस पवित्र स्थल पर उन्हें श्रद्धांजलि देने आते हैं. उनके मुताबिक, 21 फरवरी अब सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि दुनिया की सभी भाषाओं और संस्कृतियों के सम्मान का प्रतीक बन चुका है, जो सभी मातृभाषाओं की समान गरिमा का संदेश देता है.
वहीं, बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के महासचिव मनींद्र कुमार नाथ ने भी ANI से कहा, ‘आज हम भाषा शहीद दिवस पर श्रद्धांजलि देने आए हैं. इस अवसर पर हम बांग्लादेश में सभी समुदायों के लिए समानता, न्याय और निष्पक्ष व्यवहार की उम्मीद करते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘लंबे समय से अल्पसंख्यक समुदायों को कई तरह की पीड़ाएं झेलनी पड़ी हैं. मौजूदा सरकार और हालिया चुनावों के बाद हमें आशा है कि सभी समुदायों मुसलमान, हिंदू, बौद्ध, ईसाई, आदिवासी और अन्य को समान अधिकार और सुरक्षा मिलेगी.’
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By Anant Narayan Shukla
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
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