चीन के एक फैसले ने ऑस्ट्रेलिया को मुश्किल में डाला, ईरान युद्ध के बीच ड्रैगन का दांव
चीन ने तेल एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया है.
China ban Fuel Exports: ईरान युद्ध ने पूरे विश्व में मुश्किलें पैदा कर दी हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने की वजह से तेल संकट पैदा हो गया है. हालांकि, चीन तेल का इंपोर्टर है, लेकिन उसने अपनी रिफाइन किए गए तेल को एक्सपोर्ट करने पर बैन लगा दिया है, इसने ऑस्ट्रेलिया को मुश्किल में डाल दिया है.
China ban Fuel Exports: चीन द्वारा तेल रिफाइनरियों को सभी ईंधन निर्यात रोकने के निर्देश दिए जाने की खबरों ने ऑस्ट्रेलिया में चिंता बढ़ा दी है. यह तनाव पैदा हुआ तरल ईंधन (लिक्विड फ्यूल) की कमी और कीमतों में संभावित बढ़ोतरी को लेकर. इससे ईरान संघर्ष के चलते वैश्विक तेल आपूर्ति पर पहले से बनी अनिश्चितता और गहरी हो सकती है. ऑस्ट्रेलियाई अखबार ऑस्ट्रेलियन फाइनेंशियल रिव्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने रिफाइनरियों को निर्यात रोकने के निर्देश दिए हैं, जिससे ऑस्ट्रेलिया जाने वाले कम से कम दो ईंधन मालवाहक जहाजों की स्थिति को लेकर संदेह पैदा हो गया है.
दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दो परिवहन जहाजों के नष्ट होने की खबर ने भी स्थिति को और गंभीर बना दिया है. यदि संघर्ष जारी रहता है, तो इस रास्ते से गुजरने वाले तेल और ईंधन के जहाजों की सुरक्षा को लेकर आशंका बनी रहेगी. इसका असर एशिया की रिफाइनरियों पर पड़ सकता है, जिन्हें तेल की आपूर्ति में कमी का सामना करना पड़ सकता है.
एशियाई रिफाइनरियों पर निर्भर है ऑस्ट्रेलिया
एशियाई देशों को अपने तेल की लगभग 90 प्रतिशत आपूर्ति पश्चिम एशिया से मिलती है. ऑस्ट्रेलिया खुद तरल ईंधन का बड़ा आयातक है और वह एशियाई रिफाइनरियों से होने वाले निर्यात पर काफी हद तक निर्भर करता है. विमानन विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि यदि जेट ईंधन की आपूर्ति बाधित होती है तो ऑस्ट्रेलिया की विमानन व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. वर्ष 2025 में ऑस्ट्रेलिया ने अपने कुल जेट ईंधन का लगभग 32 प्रतिशत चीन से आयात किया था.
अन्य देशों से ईंधन लेने की मजबूरी
यदि चीन निर्यात रोकता है तो ऑस्ट्रेलिया को जेट ईंधन के लिए दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर, मलेशिया और भारत जैसे देशों की ओर रुख करना पड़ेगा. हालांकि, ये देश भी पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति से जुड़े जोखिमों का सामना कर रहे हैं.
सीमित रणनीतिक भंडार भी चिंता का कारण
ऐसी स्थिति में ऑस्ट्रेलिया को अपने रणनीतिक जेट ईंधन भंडार पर निर्भर होना पड़ सकता है, लेकिन यह भंडार बहुत अधिक नहीं है. उद्योग, विज्ञान और संसाधन विभाग के अनुसार मार्च 2026 के मध्य तक ऑस्ट्रेलिया के पास केवल 29 से 32 दिनों का जेट ईंधन भंडार मौजूद था, जो लगभग 80.2 करोड़ लीटर के बराबर है.
लगातार आपूर्ति पर निर्भर है ईंधन व्यवस्था
ऑस्ट्रेलिया की जेट ईंधन आपूर्ति व्यवस्था दीर्घकालिक भंडारण के बजाय लगातार आने वाले टैंकरों पर आधारित है. बड़े हवाई अड्डों पर टैंक फार्मों में ईंधन जमा किया जाता है, जो पाइपलाइन से जुड़े कई स्टोरेज टैंकों से मिलकर बने होते हैं. इन जगहों पर आमतौर पर कुछ हफ्तों का ही ईंधन स्टोर किया जाता है. इसका मतलब है कि अगर नई आपूर्ति समय पर नहीं पहुंची तो हवाई अड्डों में ईंधन जल्दी खत्म हो सकता है.
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घरेलू रिफाइनरी क्षमता में गिरावट
ऑस्ट्रेलिया में तरल ईंधन के बड़े सुरक्षा भंडार नहीं होने के पीछे कई कारण हैं. इनमें घरेलू रिफाइनरी क्षमता में गिरावट, सस्ते वैश्विक स्रोतों पर बढ़ती निर्भरता और ईंधन भंडारण से जुड़ी लागत व जगह की कमी शामिल हैं.
हवाई किराए बढ़ने की आशंका
ऑस्ट्रेलिया की सबसे बड़ी एयरलाइन क्वांटस ने संकेत दिया है कि ईंधन महंगा होने पर किराए बढ़ाने पड़ सकते हैं, हालांकि फिलहाल उड़ानों को रद्द नहीं किया गया है. वहीं एयर न्यूजीलैंड पहले ही ईंधन की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति संबंधी समस्याओं के कारण अपनी सेवाओं से लगभग 1100 उड़ानें कम कर चुका है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो आने वाले समय में हवाई किराए में बढ़ोतरी, ईंधन अधिभार, उड़ानों में कटौती और रद्द होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती है.
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By अनन्त नारायण शुक्ल
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