Explainer: आर्थिक बदहाली नहीं, बौद्ध भिक्षुओं के गुस्से ने श्रीलंका के राष्ट्रपति को किया सत्ता से बेदखल!

Explainer: श्रीलंका में आंदोलन तेज हो रहा है. अब तक किसी को समझ नहीं आ रही थी कि इतना बड़ा आंदोलन कैसे चल रहा है. अब इसका खुलासा हो गया है. मामले की तह में जायेंगे, तो पायेंगे कि सिर्फ आर्थिक बदहाली नहीं, श्रीलंका के बौद्ध भिक्षुओं के गुस्से ने गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता से बेदखल किया है.
Explainer: श्रीलंका के प्रभावशाली बैद्ध भिक्षुओं के गुस्से ने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता से बेदखल कर दिया. बौद्ध संन्यासियों ने 7 जुलाई को कोलंबो में आमरण अनशन शुरू किया था. इनकी एक ही मांग थी कि गोटाबाया राजपक्षे राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दें, क्योंकि वह कई मोर्चे पर विफल साबित हुए हैं. इसके बाद पता चला कि सिर्फ अर्थव्यवस्था की बदहाली नहीं, बौद्ध भिक्षुओं के गुस्से ने उन्हें सत्ता से बेदखल किया है.
पिछले सप्ताह सरकार के खिलाफ उपजे आक्रोश के बाद लोगों का जो गुस्सा सड़क पर दिखा, वह ऐसे ही नहीं था. सोशल मीडिया के जरिये लोगों को तैयार किया जा रहा था कि वे प्रदर्शन के लिए तैयार हों और राष्ट्रपति आवास गाले फेस के पास एकत्र हों.
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बौद्ध भिक्षु वटाला से 12 किलोमीटर पैदल चलकर कोलंबो फोर्ट तक पहुंचे. राष्ट्रपति राजपक्षे अप्रैल से यहीं रह रहे थे. बता दें कि आम लोगों ने राष्ट्रपति के आवास का घेराव किया, तो वह कोलंबो फोर्ट पहुंच गये थे. हालांकि, तब कोर्ट के आदेश से प्रदर्शन थम गया था. श्रीलंका की वेबसाइट economynext.com के मुताबिक, प्रदर्शन में कम से कम 100 बौद्ध संन्यासी शामिल थे.
श्रीलंका में ईंधन संकट के बावजूद देश के कोने-कोने से बौद्ध भिक्षु यहां तक पहुंचे और उलापाने सुमंगला थेरो ने भीड़ को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि यह संन्यासियों की जिम्मेदारी है कि वे अपने देश को सुरक्षित रखें. इसलिए कोर्ट का आदेश दिखाकर हमें रोकने की कोशिश न करें.
बता दें कि नवंबर 2019 में जब श्रीलंका में चुनाव हुए थे, तब हजारों बौद्ध भिक्षुओं ने राजपक्षे का समर्थन किया था. हालांकि, राजपक्षे देश की उम्मीदों पर खड़े नहीं उतरे. देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गयी. 2.2 करोड़ आबादी मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. विदेशी मुद्रा भंडार में कमी की वजह से ईंधन, गैस और केरोसिन के दाम आसमान छूने लगे.
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि श्रीलंका में अल्पसंख्यक मुस्लिमों और तमिलों को दरकिनार करने के उद्देश्य से बौद्ध भिक्षुओं ने राजपक्षे के खिलाफ उपजे असंतोष को भुनाना शुरू कर दिया है. सुमंगला थेरो ने कहा कि बौद्ध समुदाय से आने के बावजूद राष्ट्रपति ने बौद्ध भिक्षुकों की परवाह नहीं की. यहां तक कि प्रभावशाली बौद्ध समाज की ओर से लिखी गयी चिट्ठी का संज्ञान तक नहीं ले रहे थे.
सुमंगला थेरो ने कहा कि अभी तो यह शुरुआत है. आने वाले दिनों में इस संख्या में तेजी से वृद्धि होगी. उन्होंने कहा कि यह लड़ाई राष्ट्रपति और इस सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए शुरू हुई है. प्रदर्शनकारी भिक्षुओं ने कहा कि ईंधन संकट चल रहा है. बच्चों की शिक्षा ठप हो गयी है. अगर यही हाल रहा, तो हमारी आने वाली पीढ़ी अनपढ़ होगी.
बता दें कि श्रीलंका की अर्थव्यवस्था अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. इसके लिए राजपक्षे प्रशासन की गलत आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. वर्तमान में विदेशी मुद्रा संकट की वजह से ईंधन का संकट उत्पन्न हो गया है, दवाओं और रसोई गैस की किल्लत का सामना श्रीलंका को करना पड़ रहा है. कई व्यापारिक संस्थान बंद हो गये हैं. कई उद्योग बंद होने की कगार पर हैं.
श्रीलंका में लगातार तीन महीने से राष्ट्रपति के खिलाफ प्रदर्शन ‘गोटा गो होम’ चल रहा है. अब तक यह आंदोलन अहिंसक तरीके से चल रहा है. हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ये विरोध प्रदर्शन और तेज हुए, तो आंदोलन हिंसक भी हो सकता है, क्योंकि सरकार तत्काल कोई समाधान लोगों को नहीं दे पा रही है.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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