‘कैनेडी ने भारत के लिए 50 करोड डॉलर की सैन्य सहायता की योजना बनाई थी''

Updated at : 15 Oct 2015 2:27 PM (IST)
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‘कैनेडी ने भारत के लिए 50 करोड डॉलर की सैन्य सहायता की योजना बनाई थी''

वाशिंगटन : 1962 के युद्ध के बाद भारत पर चीन के हमले की आशंका से चिंतित जॉन एफ कैनेडी प्रशासन ने भारत को 50 करोड अमेरिकी डॉलर की सैन्य सहायता की योजना बनायी थी, जिसमें हथियार उत्पादन बढाने में मदद के अलावा छह पर्वतीय इकाइयां बनाने जैसे प्रावधान शामिल थे. एक नयी किताब में यह […]

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वाशिंगटन : 1962 के युद्ध के बाद भारत पर चीन के हमले की आशंका से चिंतित जॉन एफ कैनेडी प्रशासन ने भारत को 50 करोड अमेरिकी डॉलर की सैन्य सहायता की योजना बनायी थी, जिसमें हथियार उत्पादन बढाने में मदद के अलावा छह पर्वतीय इकाइयां बनाने जैसे प्रावधान शामिल थे. एक नयी किताब में यह खुलासा किया गया है. कैनेडी की हत्या के कारण यह योजना सिरे नहीं चढ सकी. इसमें एक अन्य कार्यक्रम के तहत 12 करोड डालर की सहायता भी शामिल थी, जो अमेरिका और ब्रिटेन आधी आधी देने वाले थे. किताब में उस दौर में भारत और अमेरिका के संबंधों में जबर्दस्त सुधार आने का दावा करते हुए कहा गया है कि यह करार न होने के कारण दोनो देशों ने संबंधों को बेहतर बनाने का एक अवसर गंवा दिया.

किताब के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व में भारत सरकार 1.3 अरब डालर का सहायता पैकेज मांग रही थी. नयी दिल्ली और वाशिंगटन के बीच गहन विचार विमर्श के बाद दोनों देश 50 करोड डॉलर के सैन्य सहायता पैकेज पर राजी हुए. सीआईए के पूर्व अधिकारी बू्रस रिडेल ने अपनी नयी किताब में यह बात कही है. ‘जेएफकेज फोरगॉटन क्राइसेस : तिब्बत, द सीआईए एंड द साइनो इंडियन वॉर’ शीर्षक की यह किताब नवंबर में उपलब्ध होगी. इसमें कहा गया है कि भारत को दिये जाने वाले इस भारी सैन्य सहायता पैकेज के बारे में अंतिम फैसला 26 नवंबर 1963 को कैनेडी के साथ व्हाइट हाउस में होने वाली एक बैठक में लिया जाना था, लेकिन इससे कई दिन पहले ही डलास में कैनेडी की हत्या कर दी गई.

किताब के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा कार्य परिपत्र सं 209 में भारत को जेएफके द्वारा 10 दिसंबर 1962 को सैन्य सहायता योजना को मंजूरी दी गई थी. किताब में रिडेल ने लिखा है, ‘ऐसी योजना थी कि अमेरिका भारत को हिमालयी क्षेत्र की हिफाजत के लिए छह नयी पर्वतीय सैन्य इकाइयां बनाने और उन्हें साजो सामान से लैस करने में मदद देगा, भारत को अपनी उत्पादन क्षमता बढाने और यूएस-यूके वायु सुरक्षा कार्यक्रम के लिए तैयार होने में मदद देगा.’ इसके अनुसार, ‘पहले दो मिशन भारत को उसकी क्षमता निर्माण में मदद देने के लिए थे, जबकि तीसरा भारत में संयुक्त अमेरिकी ब्रिटिश सेना अभ्यास के लिए था.’

रिडेल लिखते हैं कि कैनेडी चाहते थे कि 12 करोड डालर का यह वित्तीय कार्यक्रम ब्रिटेन और उसके राष्ट्रमंडल सहयोगियों के साथ आधा-आधा बांटा जाए. रिडेल लिखते हैं कि नेहरु इस प्रस्तावित सहायता पैकेज से निराश थे ‘क्योंकि वह इससे कहीं अधिक सैन्य सहायता और दीर्घावधि पैकेज चाहते थे. मई 1963 में रक्षा उत्पादन के लिए नये भारतीय मंत्री टी टी कृष्णमाचारी वाशिंगटन आए थे और भारत की तरफ से 1.3 अरब डालर का सहायता कार्यक्रम संबंधी प्रस्ताव उनके सामने रखा था.’ रिडेल लिखते हैं कि इस बारे में दोनों पक्षों के बीच बातचीत के बाद पांच वर्ष की अवधि में 50 करोड डॉलर के सहायता पैकेज पर सहमति बनी, लेकिन इसकी घोषणा की जाती इससे पहले ही कैनेडी की हत्या कर दी गई.

इस किताब में रिडेल लिखते है कि कैनेडी के शासन के अंतिम वर्ष में भारत के साथ अमेरिका के संबंधों, जिनमें सैन्य क्षेत्र भी शामिल था, में नाटकीय रूप से सुधार आया था. वह लिखते हैं कि 1963 में अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और कनाडा के पायलट भारत में बमवर्षक और जेट लडाकू विमानों का प्रशिक्षण ले रहे थे, जिनकी आपूर्ति इन्ही देशों द्वारा की गयी थी. रिडेल लिखते हैं, ‘योजना के अनुसार छह भारतीय पर्वतीय इकाइयों को अमेरिकी और ब्रिटिश हथियारों से सुसज्जित किया जाना था और अन्य तरह के सैन्य सहयोग पर भी बातचीत जारी थी.’

उनके अनुसार कैनेडी की हत्या के बाद यह प्रस्तावित सैन्य सहायता पैकेज अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच पाया. पाकिस्तानी लॉबी के भारी दबाव के चलते राष्ट्रपति लिंडल बी जानसन के नेतृत्व वाले नये प्रशासन ने फैसले को टाल दिया और कई महीने तक प्रस्तावों की समीक्षा की बात चलती रही. रिडेल लिखते हैं कि लंबे इंतजार के बाद आखिरकार 28 फरवरी 1964 का दिन तय किया गया जब व्हाइट हाउस में इस संबंध में अंतिम मंजूरी के लिए बैठक बुलायी गयी, लेकिन इससे एक ही दिन पहले खबर आई कि नेहरु का निधन हो गया है और समझौते पर बात करने वाशिंगटन आई टीम वापस लौट गई.

किताब कहती है, ‘एक बार फिर फैसला टाल दिया गया. राष्ट्रपति जॉनसन चाहते थे कि नयी दिल्ली में माहौल ठीक हो जाए और अमेरिका में भी शीर्ष स्तर पर इस बात को लेकर भ्रम और आशंका की स्थिति थी कि अगर भारत के साथ इस तरह का कोई करार होता है तो हो सकता है कि पाकिस्तान पेशावर हवाई ठिकाने पर हुए समझौते को रद्द कर दे. इस सहायता पैकेज के सिरे न चढ पाने की बेशक यह एक बडी वजह थी. किताब कहती है कि नये प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अगुवाई में भारत ने रूस के साथ अपने रक्षा सहयोग संबंध बढाए. लेखक मानते हैं कि भारत और अमेरिका के बीच उस समय शस्त्र करार न हो पाने से दोनों देशों ने संबंधों को प्रगाढ बनाने का एक अवसर गंवा दिया.

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