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आठ वर्षों में खत्म हो जायेंगे डीजल-पेट्रोल वाहन!

Updated at : 23 May 2017 6:02 AM (IST)
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आठ वर्षों में खत्म हो जायेंगे डीजल-पेट्रोल वाहन!

इलेक्ट्रिक वाहनों का आ रहा है जमाना रीथिंक्स ट्रांसपोर्टेशन 2020- 2030 एक दशक के बाद दुनियाभर में पेट्रोल और डीजल आदि जीवाश्म ईंधनों से चलनेवाली कारों, बसों व ट्रकों की बिक्री बंद हो जायेगी. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने व्यापक शोध अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें बताया गया है कि ट्रांसपोर्ट […]

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इलेक्ट्रिक वाहनों का आ रहा है जमाना
रीथिंक्स ट्रांसपोर्टेशन 2020- 2030
एक दशक के बाद दुनियाभर में पेट्रोल और डीजल आदि जीवाश्म ईंधनों से चलनेवाली कारों, बसों व ट्रकों की बिक्री बंद हो जायेगी. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने व्यापक शोध अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें बताया गया है कि ट्रांसपोर्ट सेक्टर में तकनीक के जरिये भविष्य में कितना बड़ा बदलाव आयेगा. क्या है यह रिपोर्ट और कैसे होगा यह परिवर्तन व इसके प्रमुख वाहक के तौर पर कौन-कौन से संभावित कारक हो सकते हैं, इन्हें रेखांकित कर रहा है आज का साइंस टेक्नोलॉजी पेज …
स्वायत्त इलेक्ट्रिक वाहनों की क्षमता बढ़ने से दुनियाभर में इसका उत्पादन तेजी से बढ़ेगा. साथ ही तेल की कीमतों में भारी गिरावट आने और पेट्रोलियम इंडस्ट्री के दम तोड़ने की आशंकाओं के बीच समूचे सड़क परिवहन यानी जमीन पर चलनेवाले तकरीबन सभी वाहन बिजली से चलाये जायेंगे.
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री प्रोफेसर टाेनी सीबा ने भविष्य को लेकर यह अनुमान व्यक्त किया है. दरअसल, प्रोफेसर टाेनी सीबा और जेम्स अरबीब के द्वारा ‘रीथिंक्स ट्रांसपोर्टेशन 2020- 2030’ नाम से जारी की गयी एक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है कि पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरुकता को देखते हुए वर्ष 2020- 2030 के दौरान ट्रांसपोर्टेशन की दुनिया में भ्रामक तौर पर बदलाव आ सकता है.
इससे जहां एक ओर अनेक स्थापित उद्योगों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो सकता है, वहीं दूसरी ओर इस चुनौती का सामना करने में उन्हें मुश्किल हालात से गुजरना होगा. इस संदर्भ में प्रोफेसर सीबा का एक तर्क यह भी है कि सेल्फ- ड्राइविंग इलेक्ट्रिक वाहनों के आने से लोगों में वाहन ड्राइव करने की रुचि कम हो जायेगी. इसका एक बड़ा कारण यह भी होगा कि जीवाश्म कारों के मुकाबले सेल्फ-ड्राइविंग इलेक्ट्रिक वाहन की संचालन लागत 10 गुना तक कम हो जायेगी.
कम होगा कार रखने का क्रेज
रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में कार रखने का क्रेज कम हो जायेगा. ऑन-डिमांड कार मुहैया करानेवाली कंपनियों के सामने आने के कारण ज्यादातर लोग इसी प्रवृत्ति को अपनायेंगे और अपनी स्वयं की कार रखने यानी कार मालिक होने के बजाय किराये पर मुहैया करायी जानेवाली सेवाओं का उपयोग करेंगे. इन कारणों से पेट्रोल पंपों की संख्या कम हो जायेगी. साथ ही, किसी व्यक्ति को बाजार में कार के पार्ट्स को तलाशना मुश्किल हो जायेगा. वर्ष 2024 के बाद से आपको इसके डीलर भी नहीं दिखेंगे.
एक बार जब ये भयावह आंकड़े सामने आयेंगे और उनका विश्लेषण किया जायेगा कि इनसानी ड्राइवर्स के होने से सड़क पर कितना जोखिम पैदा होता है, तो शहरों में उन पर पाबंदी लगा दी जायेगी.
उन्हें छोटे शहरों और दूरदराज के इलाकों में ही वाहन चलाने की मंजूरी दी जायेगी. सेकेंड हैंड कारों की कोई कीमत नहीं रह जायेगी. इतना ही नहीं, पुराने वाहनों को डिस्पोज करने के लिए आपको भुगतना करना पड़ सकता है. फोर्ड और जनरल मोटर्स समेत दुनियाभर की अनेक मोटर वाहन निर्माण कंपनियों के समक्ष इससे एक बड़ी चुनौती पैदा हो गयी है. अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए उन्हें इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर रुख करना होगा.
कंप्यूटर्स ऑन व्हील्स
कारों के नेक्स्ट जेनरेशन को ‘कंप्यूटर्स ऑन व्हील्स’ कहा जायेगा. गूगल, एप्पल और फॉक्सकॉन जैसी कंपनियां इस बदलाव के पीछे अहम भूमिका में होंगी. इस ऑटो एक्शन में डेट्रॉयट या टोयोटा सिटी का नहीं, बल्कि सिलिकॉन वैली का बड़ा योगदान होगा. इस बदलाव का बड़ा वाहक तकनीक होगी, न कि जलवायु नीतियां.
बाजार की ताकतें इसे ज्यादा स्पीड और निष्ठुरता से सामने ला रही हैं, जिसके बारे में सरकारों से कभी उम्मीद नहीं की जा सकती है.हम इतिहास में ट्रांसपोर्ट के सबसे तेज, सबसे सघन और अवरोधक नतीजों के मुहाने पर खड़े हैं. आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों का निर्माण करनेवाली कंपनियां इसकी कीमतों में बढ़ोतरी जारी रखेंगी. लेकिन, अगले दो से तीन सालों में इस परिदृश्य में एकदम से बदलाव आना शुरू हो जायेगा. दरअसल, दो-तीन साल के बाद इलेक्ट्रिक वाहनों की गति और भारवहन क्षमता में वृद्धि होने से इन वाहनों की मांग बढ़ जायेगी.
सभी वाहन होंगे विद्युत चालित
इस रिपोर्ट में इस बात की पूरी-पूरी संभावना जतायी गयी है कि वर्ष 2025 के बाद दुनियाभर में तैयार की जानेवाली सभी बसों, कारों, ट्रैक्टरों और अन्य वाहनों को विद्युत चालित बनाया जायेगा. वर्ष 2030 में अमेरिका में 95 फीसदी वाहन ऑटोनोमस यानी स्वचालित होंगे.
मौजूदा वाहनों और तेल सप्लाइ चेन में नाटकीय रूप से 10 खरब डाॅलर तक की कमी आ सकती है. कुछ उच्च-लागत वाले देशों को यह दिन देखना होगा कि उनका तेल उत्पादन पूरी तरह से खत्म कर दिया गया. हालांकि, प्रोफेसर द्वारा जतायी गयी संभावनाओं में समय के लिहाज से थोड़ा-बहुत बदलाव दिख सकता है, लेकिन अन्य संभावनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता है.
भारत में भी आयेगी तेजी
भारत सरकार वर्ष 2032 तक पेट्रोल और डीजल कारों को खत्म करने की योजना बना रही है. हालांकि, सरकारी योजनाओं में ज्यादा जोर प्रदूषण की समस्या और आयातित तेल पर निर्भरता को कम करने से जुड़ा है, लेकिन एक बार जब यह प्रक्रिया शुरू होगी, तो बाजार अपने तरीके से इसे तेजी प्रदान करेगा.
चीन भी पीछे नहीं
इस मामले में चीन भी पीछे नहीं है. वर्ष 2025 तक यहां भी 70 लाख से अधिक वाहन विद्युत चालित निर्मित हो जायेंगे. हालांकि, इससे चीन के वाहन निर्माताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा, लेकिन तकनीक इस मामले में व्यापक बदलाव लायेगी.
बीमा लागत में 90 फीसदी तक होगी कटौती
इलेक्ट्रिक वाहनों की संचालन लागत पेट्रोल के मुकाबले बहुत कम होगी. बीमा की लागत में 90 फीसदी तक कमी आयेगी. यदि अमेरिका की ही बात करें, तो इस कारण से वहां के नागरिक सालाना 5,600 डॉलर तक की बचत कर पायेंगे. ईंधन टैक्स के तौर पर अमेरिकी सरकार को सालाना 50 अरब डॉलर का नुकसान होगा. ब्रिटेन का खजाना तो इससे बुरी तरह से प्रभावित होगा.
ज्यादा ताकतवर होंगे बिजली चालित वाहन
आप यह जानते होंगे कि बिजली चालित ट्रेन ज्यादा ताकतवर होते हैं. गैसाेलीन और डीजल कारों के मुकाबले शायद बिजली चालित वाहन ज्यादा ताकतवर होंगे. बाजार में डिजिटल प्रतिस्पर्धा शुरू होते ही कैमरा फिल्म बनानेवाली कंपनी ‘कोडक’ के साथ क्या हुआ, यह सब जानते हैं.
शून्य लागत वाली चीजों के साथ प्रतिस्पर्धा करना बेहद मुश्किल होता है. और यह असर केवल कारों तक सीमित नहीं रहेगा. ट्रकों में भी इससे बदलाव आयेगा. यदि अमेरिका की बात करें, तो सामान ढुलाई के करीब 70 फीसदी रूटों पर बैटरी चालित वाहन चलाये जा रहे हैं.
संबंधित प्रमुख तथ्य : एक नजर में
– स्वायत्त वाहनों की मंजूरी से बाजार में उच्च-स्तर की प्रतिस्पर्धा का दौर शुरू होगा, जिससे उन अवसरों को हासिल करने की कंपनियों में होड़ लगेगी. नतीजन, सड़क यातायात के संचालन लागत में उल्लेखनीय रूप से कमी आयेगी.
– मौजूदा वाहनों के मुकाबले विद्युत-चालित स्वायत्त वाहनों का जीवनकाल ज्यादा होगा, लिहाजा इनकी लोकप्रियता बढ़ेगी.
– इसकी शुरुआत शहरों से होगी, लेकिन धीरे-धीरे यह गांवों तक फैल जायेगा.
आर्थिक असर
– यातायात की लागत में कमी आने से जीडीपी पर पड़ेगा इसका व्यापक असर.
– आर्थिक लागत ज्यादा होने के कारण दुनियाभर में आगामी एक दशकों में 10 करोड़ से ज्यादा मौजूदा वाहनों की उपयोगिता खत्म हो जायेगी.
– तेल की मांग वर्ष 2020 में 100 मिलियन बैरल प्रति दिन होगी, जो अपने उच्चतम स्तर पर होगी, लेकिन वर्ष 2030 में यह 70 मिलियन बैरल प्रति दिन पर आ जायेगी. तेल उद्योग पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा, जिससे अनेक देशों की समूची अर्थव्यवस्था के प्रभावित होने का जाेखिम पैदा हो सकता है.
– वर्ष 2021 से ही इस बदलाव को तेल उद्योग में महसूस किया जा सकेगा.
सामाजिक असर
यातायात की लागत कम होने से जाहिर तौर पर गंतव्य तक लोगों के पहुंचने, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर व्यापक असर पड़ेगा. सुरक्षित यात्रा होने का व्यापक सामाजिक असर देखने में आयेगा. पब्लिक और प्राइवेट ट्रांसपोर्ट में एक तरीके का विलय देखने का मिलेगा. पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन प्राधिकरणों की भूमिका में बदलाव आयेगा और लोगों को बहुत ही कम खर्च में कार्यालय तक पहुंचाने में ये
सक्षम हो पायेंगे.
कार्बन-मुक्त सड़क परिवहन प्रणाली
इस बदलाव से पर्यावरण पर नाटकीय रूप से असर पड़ेगा. ट्रांसपोर्ट सेक्टर से बड़े पैमाने पर पैदा हो रहे प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों को कम करने में मदद मिलेगी. इससे परिवहन के साधनों से पैदा होने वाले उत्सर्जन में 90 फीसदी तक की कमी आयेगी. उम्मीद की जा सकती है कि वर्ष 2030 तक कार्बन-मुक्त सड़क परिवहन प्रणाली मुहैया करायी जा सकती है.
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