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आत्मशुद्धि का महापर्व है पर्यूषण

Updated at : 10 Sep 2016 6:53 AM (IST)
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आत्मशुद्धि का महापर्व है पर्यूषण

भारत एकता में विविधता वाला देश है. भारत को पर्वों और त्योहारों का भी देश कहा जाता है. उनमें न केवल भौतिक आकर्षण बल्कि आत्म साधना और त्याग से जुड़े पर्व भी हैं. एक ऐसा ही अनूठा पर्व है पर्यूषण महापर्व. यह मात्र जैनों का पर्व नहीं है, यह एक सार्वभौम पर्व है, मानव मात्र […]

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भारत एकता में विविधता वाला देश है. भारत को पर्वों और त्योहारों का भी देश कहा जाता है. उनमें न केवल भौतिक आकर्षण बल्कि आत्म साधना और त्याग से जुड़े पर्व भी हैं. एक ऐसा ही अनूठा पर्व है पर्यूषण महापर्व. यह मात्र जैनों का पर्व नहीं है, यह एक सार्वभौम पर्व है, मानव मात्र का पर्व है. पूरे विश्व के लिए यह एक उत्तम और उत्कृष्ट पर्व है, क्योंकि इसमें आत्मा की उपासना की जाती है. जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे. वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है. जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं.
जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहार मनाये जाते हैं, लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है. पर्यूषण सभी पर्वों का राजा है. इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है. पर्यूषण पर्व को आध्यात्मिक दीवाली की भी संज्ञा दी गयी है. जिस तरह दीवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय-−व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ-−सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्यूषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य- पाप का पूरा हिसाब करते हैं. वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ−-सफाई करते हैं.
संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है. संपूर्ण जैन समाज का यह महाकुंभ पर्व है. यह जैन एकता का प्रतीक पर्व है. जैन लोग इसे सर्वाधिक महत्व देते हैं. संपूर्ण जैन समाज इस पर्व के अवसर पर जागृत एवं साधनारत हो जाता है. दिगंबर परंपरा में इसकी ‘दशलक्षण पर्व’ के रूप में पहचान है. उनमें इसका प्रारंभिक दिन भाद्र व शुक्ल पंचमी और संपन्नता का दिन चतुर्दशी है. दूसरी तरफ श्वेतांबर जैन परंपरा में भाद्र व शुक्ल पंचमी का दिन समाधि का दिन होता है. वर्षभर में कभी समय नहीं निकाल पाने वाले लोग भी इस दिन जागृत हो जाते हैं.
कभी उपवास नहीं करने वाले भी इस दिन धर्मानुष्ठान करते नजर आते हैं. पर्यूषण पर्व मनाने के लिए भिन्न-भिन्न मान्यताएं उपलब्ध होती हैं. आगम साहित्य में इसके लिए उल्लेख मिलता है कि संवत्सरी चातुर्मास के 49 या 50 दिन व्यतीत होने पर व 69 या 70 दिन अवशिष्ट रहने पर मनायी जानी चाहिए. दिगंबर परंपरा में यह पर्व 10 लक्षणों के रूप में मनाया जाता है. ये 10 लक्षण पर्यूषण पर्व के समाप्त होने के साथ ही शुरू होते हैं. पर्यूषण पर्व आठ दिन तक मनाया जाता है जिसमें किसी के भीतर में ताप, उत्ताप पैदा हो गया हो, किसी के प्रति द्वेष की भावना पैदा हो गयी हो तो उसको शांत करने का यह पर्व है. धर्म के 10 द्वार बताये हैं उसमें पहला द्वार है- क्षमा. क्षमा यानी समता. क्षमा जीवन के लिए बहुत जरूरी है. जब तक जीवन में क्षमा नहीं, तब तक व्यक्ति अध्यात्म के पथ पर नहीं बढ़ सकता.
यह पर्व अध्यात्म की यात्रा का विलक्षण उदाहरण है जिसमें यह दोहराया जाता है- ‘संपिक्खए अप्पगमप्पएणं’ अर्थात आत्मा के द्वारा आत्मा को देखो. यह उद्घोष, यह स्वर सामने आते ही आत्मा के अतिरिक्त दूसरे को देखने की बात ही समाप्त हो जाती है. आत्मा के द्वारा आत्मा को देखो’- यह उद्घोष इस बात का सूचक है कि आत्मा में बहुत सार है, उसे देखो और किसी माध्यम से नहीं, केवल आत्मा के माध्यम से देखो.
भौतिकवादी परिवेश में अध्यात्म यात्रा के इस पथ पर जो नये-नये पथिक आगे बढ़ते हैं, उन्हें इस पथ पर चलने में कठिनाई का अनुभव हो सकता है, कुछ बाधाएं भी सामने आ सकती हैं.
यह उलझन जैसी लगती है, पर कोई उलझन नहीं है. यह उलझन तब तक ही प्रतीत होती है, जब तक कि अध्यात्म की यात्रा प्रारंभ नहीं होती. इस पथ पर जैसे-जैसे चरण आगे बढ़ते हैं, उलझन सुलझती चली जाती है. समाधान होता जाता है. जब हम अंतिम बिंदु पर पहुंचते तब वहां समस्या ही नहीं रहती. सब स्पष्ट हो जाता है. एक अपूर्व परिवेश निर्मित हो जाता है और इस पर्व को मनाने की सार्थकता सामने आ जाती है.
जैन धर्म की त्याग-प्रधान संस्कृति में पर्यूषण पर्व का अपना और भी अपूर्व एवं विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है. यह एकमात्र आत्मशुद्धि का प्रेरक पर्व है इसीलिए यह पर्व ही नहीं, महापर्व है.
पर्यूषण पर्व जप, तप, साधना, आराधना, उपासना, अनुप्रेक्षा आदि अनेक प्रकार के अनुष्ठानों का अवसर है. पर्यूषण पर्व अंतरआत्मा की आराधना का पर्व है, आत्मशोधन का पर्व है, निद्रा त्यागने का पर्व है. सचमुच में पर्यूषण पर्व एक ऐसा सवेरा है, जो निद्रा से उठाकर जागृत अवस्था में ले जाता है. अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाता है.
पर्यूषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है- आत्मा में अवस्थित होना. पर्यूषण शब्द परि उपसर्ग व वस् धातु इसमें अन् प्रत्यय लगने से पर्यूषण शब्द बनता है. पर्यूषण यानी ‘परिसमन्तात-समग्रतया उषणं वसनं निवासं करणं’- पर्यूषण का एक अर्थ है- कर्मों का नाश करना. कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी अत: यह पर्यूषण-पर्व आत्मा का आत्मा में निवास करने की प्रेरणा देता है.
पर्यूषण महापर्व आध्यात्मिक पर्व है. इसका जो केंद्रीय तत्व है, वह है आत्मा. आत्मा के निरामय, ज्योतिर्मय स्वरूप को प्रकट करने में पर्यूषण महापर्व अहम भूमिका निभाता रहता है.
अध्यात्म यानी आत्मा की सन्निकटता. यह पर्व मानव-मानव को जोड़ने व मानव हृदय को संशोधित करने का पर्व है. यह मन की खिड़कियों, रोशनदानों व दरवाजों को खोलने का पर्व है.
पर्यूषण पर्व प्रतिक्रमण का प्रयोग है. पीछे मुड़कर स्वयं को देखने का ईमानदार प्रयत्न है. वर्तमान की आंख से अतीत और भविष्य को देखते हुए कल क्या थे और कल क्या होना है, इसका विवेकी निर्णय लेकर एक नये सफर की शुरुआत की जाती है.
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