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राजीव गांधी के पुण्यतिथि पर वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई का विशेष आलेख

Updated at : 21 May 2015 7:51 AM (IST)
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राजीव गांधी के पुण्यतिथि पर वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई का विशेष आलेख

पारिवारिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियों के बीच पायलट से प्रधानमंत्री तक की राजीव गांधी की जीवन-यात्रा, क्षितिज पर एक युवा संभावना के उदय और उसके असमय अवसान की त्रसदी की गाथा है. देश में आर्थिक उदारीकरण तथा सूचना-तकनीक के व्यापक उपयोग का पहला अध्याय उनके नेतृत्व में ही लिखा गया था. शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार की […]

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पारिवारिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियों के बीच पायलट से प्रधानमंत्री तक की राजीव गांधी की जीवन-यात्रा, क्षितिज पर एक युवा संभावना के उदय और उसके असमय अवसान की त्रसदी की गाथा है. देश में आर्थिक उदारीकरण तथा सूचना-तकनीक के व्यापक उपयोग का पहला अध्याय उनके नेतृत्व में ही लिखा गया था.
शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार की भयावहता के प्रारंभिक रुझानों का सामने आना भी उनके खाते में ही है, जिसके कारण उन्हें भारी जीत के बाद एक बड़ी हार का भी सामना करना पड़ा. राजनीतिक तात्कालिकता से परे अगर राजीव गांधी का मूल्यांकन किया जाये, तो एक ऐसे राजनेता की छवि उभरती है, जिसनेनये भारत की प्रस्तावना लिखी थी. आज पुण्यतिथि के मौके पर राजीव गांधी के जीवन और योगदान पर एक नजर.
राशिद किदवई
वरिष्ठ पत्रकार
राजीव का झुकाव शुरू से ही तकनीक की ओर था और वे समझते थे कि विज्ञान और तकनीक देश की कई पुरानी समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं. बेहद कठिन हालात में जब इंदिरा की जगह राजीव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने तेजी से देश के इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण और क्षमता विकास पर पैसा खर्च करना शुरू कर दिया. आर्थिक पुनरुद्धार के लिए उन्होंने निजी क्षेत्र से निवेश के महत्व को समझ लिया था.
संजय गांधी के हवाई हादसे में मारे जाने के कई महीने बाद तक इंदिरा गांधी इस दुविधा में रहीं कि राजीव गांधी को राजनीति में लाया जाये या नहीं. वर्ष 1981 में इंदिरा ने केन्या का दौरा किया और उनके साथ राजीव के बेटे राहुल, बेटी प्रियंका और वरुण गांधी के साथ मेनका गांधी भी थीं.
उनका अगला दौरा मैक्सिको का था, जहां उन्हें अंतरराष्ट्रीय इकोनॉमिक कॉन्फ्रेंस में भाग लेना था. राजीव और सोनिया भी साथ में थे. नवंबर, 1981 में इटली, फ्रांस और रोमानिया के दौरे के दौरान सोनिया और मेनका, दोनों साथ थीं. प्रधानमंत्री दिल्ली में भी भेदभाव नहीं करती थीं और सामाजिक कार्यक्रमों में सोनिया या मेनका उनके साथ जाते थे.
संजय की मृत्यु के बाद इंदिरा राजीव पर अधिक निर्भर रहने लगीं. अगस्त, 1980 में कांग्रेस के नेताओं ने इंदिरा पर दबाव बनाना शुरू किया कि राजीव को पार्टी में लाया जाये. शिवराज पाटिल के नेतृत्व में अधिकतर संसद सदस्यों ने राजीव गांधी से अपील की कि वे संजय गांधी का काम संभालें. जब पाटिल ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की तो उन्होंने गुस्से से कहा कि वह राजनीति में नहीं हैं. लेकिन, इससे पाटिल को फर्क नहीं पड़ा.
पाटिल की पहल का असर कुछ महीने बाद दिखा जब इंदिरा ने उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया. साईंबाबा के भक्त पाटिल बाद में लोकसभा के अध्यक्ष, केंद्रीय गृह मंत्री और राज्यपाल भी बने. लेकिन वामदलों के विरोध के कारण राष्ट्रपति नहीं बन पाये. डिप्लोमैट और नेहरू- गांधी परिवार के करीबी टीएन कौल के मुताबिक, संजय गांधी की मृत्यु के बाद इंदिरा अकेली और सदमे में थीं.
सदमा इतना गहरा था कि वे सार्वजनिक जगहों पर अपने आंसू दबा कर रखती थीं. लेकिन इसका असर उन पर दिखने लगा था और वे पहले के मुकाबले असुरक्षित और अकेलापन महसूस करने लगी थीं. कौल ने एक बार अकेले में उनसे कहा कि आप राजीव को अपने साथ खड़ा होने के लिए क्यों नहीं कहती हैं, भले ही वह सरकार में शमिल नहीं हो, लेकिन पार्टी में शामिल हो जाये? इंदिरा ने कहा कि मैं राजीव में फैसले में दखल नहीं दूंगी और वे जो चाहते हैं करें. अगर आप चाहते हैं तो उनसे बात करें. इसके बाद कौल ने राजीव और सोनिया दोनों को इंदिरा गांधी की उम्मीदों को पूरा करने की बात कही. काफी साल बाद राजीव गांधी ने अपनी मां के कदमों पर चलते हुए अपनी पेशेवर जिंदगी को छोड़ कर पार्टी और देश सेवा को चुना.
राजनीति में आने से पहले राजीव गांधी ने कौल और अन्य से कई दौर की मुलाकातें की. कांग्रेस और गांधी परिवार में तेजी से हालात बदल रहे थे. मेनका गांधी पार्टी और घर में अकेली पड़ गयीं. राजीव समझ गये कि देश को क्या जरूरत है. कई मायनों में वे गांधी परिवार के अन्य सदस्यों के मुकाबले पेशेवर थे, क्योंकि वे इंडियन एयरलाइंस में काम कर चुके थे.
संजय के अनुभव से वे समझ गये कि राजनीति सत्ता और पैसे के इतर दूसरी चीज है. अपने कार्यकाल के दौरान वे पार्टी में संजय के समर्थकों को दरकिनार कर शिक्षा और अन्य क्षेत्र के विशेषज्ञों को आगे बढ़ाने लगे. सैम पित्रोदा, अरुण सिंह, अरुण नेहरू, मणिशंकर अय्यर इसके उदाहरण हैं. शुरू से ही राजीव का झुकाव तकनीक की ओर था और वे समझते थे कि विज्ञान और तकनीक देश की कई पुरानी समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं. बेहद कठिन हालात में जब इंदिरा की जगह राजीव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने तेजी से देश के इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण और क्षमता विकास पर पैसा खर्च करना शुरू कर दिया. आर्थिक पुनरुद्धार के लिए उन्होंने निजी क्षेत्र से निवेश के महत्व को समझ लिया था.
राजीव उद्योगों के लिए नियंत्रण की मौजूदा व्यवस्था की खामियों को समझ गये. यही कारण है कि प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने लाइसेंस राज की व्यवस्था को खत्म करना शुरू कर दिया. जब राजीव गांधी ने आर्थिक सुधार और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश की, तो पार्टी में इसे लेकर बेहस नहीं होती थी. शुरुआत में कांग्रेस के नेता राजीव को इंदिरा गांधी के प्रमुख सलाहकार और फिर उनके उत्तराधिकारी के तौर पर देखने लगे. राजीव को पहली बार 1982 के एशियन गेम्स की जिम्मेवारी देकर परखा गया. इंदिरा के लिए एशियन गेम्स का आयोजन दु:स्वप्न बन गया था. 1981 के अंत तक कई समस्या सामने आ गयी थी. पंजाब में अलगाववाद की समस्या से एशियाइ खेलों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गये थे. लेकिन राजीव गांधी की कोशिशों से यह आयोजन सफल रहा.
राजीव शीर्ष अधिकारियों और मंत्रियों को तय समय में काम करने का आदेश देते थे. राजीव अलग तरीके से सोचते थे. उनकी सोच थी कि इस खेल को सभी भारतीयों तक पहुंचाया जाना चाहिए. इसके लिए उन्हें टेलीविजन से बेहतर कोई चीज नहीं लगी. इंदिरा सरकार ने रंगीन टेलीविजन पर आयात शुल्क घटा दिया और इसके बाद दूरदर्शन का गठन किया गया. अगले दो महीने में देश में 21 ट्रांसमीटर स्थापित कर दिये गये. ब्रिटेन, अमेरिका और जापान से विशेषज्ञों को बुलाकर दूरदर्शन के कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी गयी. राजीव गांधी और उनकी टीम ने खेल पर हुए 150 करोड़ रुपये खर्च को खेल गांव को नीलाम कर हासिल कर लिया.
कांग्रेस महासचिव और फिर अध्यक्ष बनने के बाद वे पार्टी दफ्तर को काफी महत्व देते थे.
अक्सर उन्हें पार्टी दफ्तर में लोगों से मिलते हुए देखा जाता था. राजीव ने कहा कि वे भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते हैं. लेकिन विषम परिस्थितियों में उन्हें यह पद संभालना पड़ा. प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालते ही उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था को ठीक करना शुरू कर दिया. सबसे पहले उन्होंने चुनावी सुधार की दिशा में कदम उठाया और दलबदल कानून में बदलाव किया. यह कानून इस मायने में महत्वपूर्ण था कि कई राज्यों में दल-बदल कराने का आरोप कांग्रेस पर ही था.
पार्टी में दबाव के बावजूद उन्होंने इसमें भी सुधार की कोशिश की. अंतरराष्ट्रीय मोरचे पर भी उन्होंने काफी अच्छा काम किया. फिलीस्तीन के पक्ष में खुल कर वकालत की. वे रंगभेद और मानवाधिकार हनन के सख्त खिलाफ थे. राजीव गांधी के प्रयासों से ही दक्षिण अफ्रीका में लोकतंत्र स्थापित हुआ और नेल्सन मंडेला को रिहा किया गया. उनका सबसे अहम योगदान टेलीकॉम क्षेत्र में रहा. लेकिन बोफोर्स घोटाले का राजीव की छवि पर बुरा असर पड़ा. इसका खामियाजा उन्हें वर्ष 1989 के लोकसभा चुनावों में उठाना पड़ा. अगली लोकसभा के मध्यावधि चुनावों के दौरान 21 मई, 1991 को बम धमाके में देश ने एक उभरते और दूरदर्शी नेता को खो दिया.
आर्थिक एवं तकनीकी प्रगति की रखी नींव
प्रधानमंत्री के रूप में उपलब्धियां
प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी अपनी माता इंदिरा गांधी से अधिक व्यावहारिक और उदार थे तथा इसका प्रभाव उनकी पहलों में दृष्टिगोचर होता है.
पंजाब में उग्रवाद और स्वर्ण मंदिर में इंदिरा गांधी के ब्लू स्टार ऑपरेशन की पृष्ठभूमि में इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी. हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगों ने माहौल को और भी अधिक विषाक्त कर दिया था. राजीव गांधी ने पंजाब समस्या के समाधान को प्राथमिकता देते हुए 24 जुलाई, 1985 को अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के साथ एक अहम समझौता किया.
राजीव गांधी ने आर्थिक नीतियों को जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की परंपरागत समाजवादी नीतियों के प्रभाव से मुक्त करते हुए आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की. उन्होंने अमेरिका से भी संबंधों को बेहतर करते हुए आर्थिक और वैज्ञानिक-तकनीकी सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाया.
लालफीताशाही पर लगाम लगाकर और नीतिगत बदलाव के जरिये उन्होंने निजी क्षेत्र को औद्योगिक और वाणिज्यिक गतिविधियों के विस्तार की अनुमति दी. कालांतर में यही दिशा 1990 के दशक में व्यापक आर्थिक उदारवाद और मुक्त व्यापार का आधार बनी.
1986 में उन्होंने उच्च शिक्षा के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की. ग्रामीण भारत में शिक्षा की बेहतरी के लिए जवाहर नवोदय विद्यालयों की श्रृंखला स्थापित करने का काम शुरू हुआ. सूचना तकनीक और टेलीकॉम के व्यापक प्रसार पर उनके जोर ने देश में सूचना क्रांति का सूत्रपात किया तथा संचार-व्यवस्था गांवों तक पहुंचनी शुरू हुई.
वर्ष 1985 में पंचायती राज अधिनियम के द्वारा राजीव गांधी सरकार ने पंचायतों को महत्वपूर्ण वित्तीय और राजनीतिक अधिकार देकर सत्ता के विकेंद्रीकरण तथा ग्रामीण प्रशासन में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल किया था. यह उनकी सरकार की अन्यतम उपलब्धि थी.
वर्ष 1986 में मिजोरम में लालडेंगा के नेतृत्व में दशकों से चल रहे अलगाववादी हिंसक आंदोलन को मिजोरम समझौते के द्वारा खत्म कर राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली राजीव गांधी की बड़ी सफलता मानी जाती है. पूवरेत्तर में भारतीय राज्य के प्रति भरोसे की बहाली में इस समझौते का उल्लेखनीय योगदान है.
कई विवादों से भी घिरे राजीव
सिख-विरोधी दंगे : इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख समुदाय पर हुए हिंसक हमलों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के शामिल होने तथा केंद्र सरकार की कथित लापरवाही राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल की प्रारंभिक चुनौती थी. सिख समुदाय तथा कुछ मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इन दंगों में भले राजीव गांधी की सीधी भूमिका न हो, लेकिन बतौर प्रधानमंत्री वे हजारों सिखों की जान और उनके कारोबार की बर्बादी रोक पाने में असफल रहे.
बाद में भी सिख-विरोधी दंगों में कथित रूप से शामिल नेताओं को सरकार और पार्टी में महत्वपूर्ण पद देकर तथा जांच प्रक्रिया में सुस्ती दिखा कर राजीव गांधी ने उचित संकेत नहीं दिया था. लेकिन लोगोंवाल समझौते में उनकी सक्रिय भूमिका और उसकी सकारात्मकता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.
बोफोर्स घोटाला : राजीव गांधी के वित्त मंत्री के रूप में कार्यरत विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सरकारी और राजनीतिक भ्रष्टाचार की परतें खंगालनी शुरू की थी. कुछ समय के बाद उन्हें इस मंत्रलय से हटा कर रक्षा मामलों का प्रभार दिया गया. बतौर रक्षा मंत्री सिंह ने बोफोर्स तोप की खरीद में हुई कथित दलाली की जांच का काम प्रारंभ कर दिया. इस प्रकरण में बाद में राजीव गांधी और उनके करीबियों का नाम भी आया था.
इसी मुद्दे पर विश्वनाथ प्रताप सिंह समेत कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार का मामला उठाते हुए राजीव गांधी सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंक दिया. कई विपक्षी पार्टियों ने सिंह की अगुवाई में जनता दल की स्थापना की और दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी तथा वाम दलों के सहयोग से 1989 के चुनाव में राजीव गांधी और उनकी पार्टी को पराजित कर दिया. यह विवाद उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहा, किंतु इस मामले में किसी को पकड़ा नहीं जा सका और राजीव गांधी को भी बेदाग करार दिया गया.
श्रीलंका नीति : श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों को परोक्ष समर्थन देने की भारतीय नीति में बदलाव करते हुए राजीव गांधी ने 29 जुलाई, 1987 को तत्कालीन श्रीलंकाई राष्ट्रपति जयवर्धने के साथ भारत-श्रीलंका समझौता कर विद्रोहियों के खिलाफ भारतीय सेना भेज दी.
एक तरफ तमिल विद्रोहियों के श्रीलंकाई और भारतीय समर्थकों ने इसका विरोध कर सेना वापस बुलाने की मांग की, वहीं दूसरी तरफ प्रभाकरण के छापामार लड़ाकों के हाथों बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक मारे गये. दो वर्ष के बाद राष्ट्रपति बने प्रेमदासा ने सैनिकों को हटाने की घोषणा कर दी. राजीव गांधी के बाद भारत के प्रधानमंत्री बने विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वापसी की प्रक्रिया पूरी की. इस प्रकरण में 1100 से अधिक भारतीय सैनिक तथा 5000 तमिल विद्रोही व नागरिक मारे गये थे और भारी मात्र में धन की बर्बादी हुई थी.
वर्ष 1991 में राजीव गांधी तमिल विद्रोहियों के एक गिरोह द्वारा किये गये आत्मघाती हमले में मारे गये थे.शाहबानो मसला और राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद प्रकरण : सर्वोच्च न्यायालय ने 1985 में एक फैसले में शाहबानो नामक तलाकशुदा महिला के पति को उसके भरण-पोषण के लिए भत्ता देने का आदेश किया. कई मुसलिम संगठनों ने इसे मुसलिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप कह कर इसका विरोध किया. राजीव गांधी ने इस फैसले को संसद में एक प्रस्ताव के द्वारा उलट दिया.
हिंदुत्ववादी संगठनों की मांग के अनुरूप 1986 में एक विवादित निर्णय लेते हुए सरकार ने दशकों से बंद अयोध्या स्थित रामजन्म भूमि-बाबरी मसजिद का ताला खोल कर वहां पूजा की अनुमति दे दी. इन दोनों निर्णयों को दोनों धर्मों के सांप्रदायिक तत्वों के तुष्टिकरण की कोशिश के रूप में देखा जाता है.
मृत्यु : 21 मई, 1991 को लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक सभा में आत्मघाती बम विस्फोट में राजीव गांधी की मृत्यु हो गयी थी. जांच में इस हमले में तमिल विद्रोहियों को शामिल पाया गया था. दिल्ली में यमुना के किनारे वीर भूमि में उनकी समाधि है.
तमाम आलोचनाओं और खामियों के बावजूद राजीव गांधी को एक उत्साही और प्रगतिवादी प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है. उनकी आर्थिक नीतियों तथा सूचना क्रांति में किये गये कार्य वर्तमान भारत के विकास और उपलब्धियों के आधार हैं.
प्रकाश कुमार रे
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Prabhat Khabar Digital Desk

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