महाशिवरात्रि को पांच दिन शेष : शिवरात्रि के तीन मुख्य कृत्य उपवास, पूजन, रात्रि-जागरण, जानें पूजन विधि के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk
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महाशिवरात्रि को पांच दिन शेष रह गये हैं. यह महापर्व 21 फरवरी को मनाया जायेगा. वैसे तो हिंदू धर्मावलंबी पूरे साल प्रात:काल शिव की आराधना करते हैं, उन्हें जल अर्पित करते हैं. इसके अलावा प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवाराधन होता है. लेकिन महाशिवरात्रि का एक अलग ही महत्व है. इस दिन शिवालयों में सर्वत्र भक्त उमड़ पड़ते हैं. दरअसल, शिव को इस पूरी सृष्टि का प्राणतत्व माना जाता है. भक्त शिव-सेवा को सांसारिक पाप-ताप के हरण और मोक्ष, मुक्ति, कृपा, दया प्राप्ति का मूल मानते हैं. महाशिवरात्रि के माहात्म्य को ही समर्पित है यह विशेष पृष्ठ.
मार्कंडेय शारदेय
प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि होती है. शास्त्रों के अनुसार यह शिव को विशेष प्रिय रात्रि है, इसीलिए शिवाराधन में इसका अधिक महत्व है. कहते हैं, आकाश रूपी विष्णु और आधार रूपी ब्रह्मा से परे या उन्हीं का अंतर्भूत लिंगाकार हो आदि में आदिदेव महादेव इसी तिथि को मध्यरात्रि में प्रगटे थे. सूक्ष्मतम का प्रथमतः स्थूल होना, ठीक वैसा ही है, जैसे अंडे में एक जीव का सम्पूर्णतः होना. पहली बार फाल्गुन की चतुर्दशी को ही मध्यरात्रि में निराकार ईश्वर साकार हुए थे, इसीलिए यह महाशिवरात्रि है. अन्य मास की चतुर्दशी तिथियां मात्र शिवरात्रि हैं. फल में समानता है, पर फाल्गुनी शिवरात्रि का तो कहना ही क्या यह पापों के समूल नाश एवं जीवन में सुख-समृद्धि के साथ ही आत्यन्तिक दुःख की निवृत्ति देने में बढ़-चढ़कर है :
शिवरात्रि-व्रतं नाम सर्वपाप-प्रणाशनम्।
आचांडाल-मनुष्याणां भुक्ति-मुक्ति-प्रदायकम्।।
अजन्मा का जन्मदिन क्या हो सकता है! पर अवतरण दिवस तो कह ही सकते हैं. इसीलिए उपासना, साधना, आराधना और जागरण का सभी शिवरात्रियों में समान महत्व के बावजूद इसका मूल्य अधिकाधिक है. यह विशिष्ट व्रतोत्सव, महोत्सव भी है, इसलिए आप भले वैष्णव हों, शाक्त हों या किसी अन्य सम्प्रदाय में दीक्षित हों, तो भी सबको यह व्रत करने का शास्त्रीय निर्देश है. आखिर सबमें अभेद ही तो है! सम्भवतःइसीलिए सभी शिवरात्रियों में लोगों को व्रतादि का पालन सम्भव न हो सकने पर भी इसे अवश्य करने का निर्देश है :
वर्षे वर्षे महादेवि नरो नारी पतिव्रता।
शिवरात्रौ महादेवं कामं भक्त्या प्रपूजयेत्।।
यह व्रतोत्सव असामान्य एवं अक्षय कारक है. तभी तो स्कन्दपुराण का नागरखंड कहता है कि उपवास, रात्रि-जागरण एवं शिवलिंग के पूजन में मन के न मानने पर हठ का भी सहारा लेना नाजायज नहीं है. थोड़े से कष्ट से बेशकीमती खजाना मिल जाए तो भला कौन होगा जो भागेगा! धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा की बात कौन करे,यह तो अक्षय लोक, शिव-सान्निध्य तक को सहज कर देनेवाला है :
उपवास-प्रभावेण बलादपि च जागरात्।
शिवरात्रेः तथा तस्य लिंगस्यापि प्रपूजया।
अक्षयान् लभते लोकान् शिव-सायुज्यमाप्नुयात्।
अनेक व्रतों की तरह शिवरात्रि भी प्रथमतः व्रतोपवास ही है, अर्थात् एक विशिष्ट नियम के साथ आहार का त्याग है. भले ही इसमें रात्रिकाल में पूजा का महत्व हो, पर प्रातःकाल स्नान आदि कर निराहार सूर्यार्घ्य देकर, पंचदेवों की पूजा करना, संकल्पपूर्वक व्रतारम्भ करना आवश्यक है.
इस दिन खाना-पीना एकदम मना है. परन्तु अशक्त लोगों एवं गर्भिणी स्त्रियों को कायिक उपवास न कर पति, पुत्रादि से कराने का समान पुण्य बताया गया है. निराहार रहने की असमर्थता पर मध्यम मार्ग में जल, दूध, दही, फल का अल्प सेवन किया जा सकता है.
शिवरात्रि के तीन ही मुख्य कृत्य हैं- उपवास, पूजन एवं रात्रि जागरण. व्यापकता से देखा जाए तो इनमें अभिन्नता है. उपवास व उपासना के दो तात्पर्य हैं, एक तो मन, वाणी, कर्म से आराध्य के करीब रहना और दूसरा ‘सर्वभोग-विवर्जितः’, अर्थात् समस्त सुख-साधनों से दूर होना. अपने इष्ट के समीप रहना ही तो पूजा-पाठ, जप-योग है!
देवस्थान को साफ करना, उनकी प्रिय वस्तुओं का संचय, विधिवत् उन वस्तुओं का समर्पण, मंत्रों-स्तोत्रों का पाठ व जप करना एवं उनको स्वयं में उतारना और उनमें स्वयं भी उतरना; यही तो साधना है, आराधना है, उपासना है. इन्हीं पांच कृत्यों को परिभाषित करते हुए क्रमशः अभिगमन, उपादान, इज्या, अभ्यास तथा योग कहा गया है. ये ही तो सत्यरूपी ब्रह्म की ओर ले जानेवाले कायिक, वाचिक एवं मानसिक सात्विक कर्म हैं.
व्याध की कथा से समझें शिव का औघड़ दानी रूप
कहते हैं, एक भूखा-प्यासा व्याध शिकार की तलाश में तीर-धनुष लिये वन-वन भटकता रहा. पूरा दिन बीत गया, कोई शिकार हाथ नहीं लगा.
वह खाली हाथ घर जाए तो जाए कैसे! अपने बाल-बच्चों को क्या खाना देगा? उपाय यही कि वह जंगल में ही रात गुजार दे. कहीं कोई पशु मिल जाए तो काम बन जाए. वह एक पेड़ का आश्रय ले टोह में लगा रहा. सूर्यास्त होते एक हिरनी दिखी. वह ज्यों ही निशाना साधने चला कि वह फुर्र हो गयी. वह मौका खोना नहीं चाहता था.
वह लक्ष्य साधे रहा. लगभग पहर बाद फिर वह आयी, पर पलक झपकते गायब. प्रायः पहर-पहर के अंतराल में यही खेल चलता रहा और अब तो सुबह ही हो चली. व्याध के पास थोड़ा सा पानी था. लेकिन वह पी भी नहीं पाया था. बिन खाये-पीये आठों पहर बीत गये. बाणों के साधने में पहर-पहर जल गिरता गया. अब तो पीने का पानी भी पास नहीं. कहते हैं, जिस पेड़ का वह आश्रय लिया था, वह बेल का था.
वहीं कोई शिवलिंग था. शर-संधान में बेलपत्र टूटकर गिर जाया करते और पात्र का जल भी शिवजी पर चढ़ जाया करता था. इसी को दैवयोग कहा जाता है. अच्छा होना होता है तो अनजाने भी हो जाता है. भोले-भंडारी औढरदानी उसके इस कृत्य को अपनी पूजा मान बैठे. प्रकट हो गये और उसे दुर्लभ सुख देकर निहाल कर दिया. उस दिन फागुन की कृष्ण चतुर्दशी यानी यही महाशिवरात्रि थी. हम सांसारिक जीव भी तो उस व्याध की तरह ही तो पेट-परिवार के चक्कर में लगे रहते हैं. कहीं-कभी हमारा भी कल्याण हो जाये, इसी आस में हम शिवरात्रि का उपवास करते आ रहे हैं.
जो पूजा सामग्री उपलब्ध हो, उसी से तुष्ट हो जाते हैं
इस दिन रुद्राभिषेक की भी महिमा अधिक है. संतान-सुख के लिए दूध से, धनप्राप्ति के लिए ईख के रस से, शत्रुबाधा शमन के लिए सरसों तेल से, असाध्य रोगों से निवृत्ति के लिए कुश-मिश्रित जल से, ज्वरशांति हेतु गंगाजल से एवं बौद्धिक विकास हेतु शर्बत से शिवाभिषेक का शास्त्रीय मूल्य है. मूल बात कि इस दिन आप जैसे भी, जो पूजा-सामग्री उपलब्ध हो, उसी से भगवान के हो सकते हैं. भजन करें, कीर्तन करें या ‘नमः शिवाय’ का जप ही करें; आशुतोष आशु तुष्ट हो जायेंगे.
गृहस्थों के लिए पूजन विधि
मुहूर्त
इस बार महाशिवरात्रि 21 फरवरी यानी शुक्रवार को है. पंचांगानुसार इस दिन फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी सायं 5.12 तक है, और उसके उपरांत चतुर्दशी है. पुनः पूर्वाह्ण 9.28 तक उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, उपरांत श्रवण, प्रातः 7.09 तक व्यतीपात योग, उपरांत वरीयान् योग, सायं 5.12 तक वणिज करण, उपरांत विष्टि करण है. संध्या काल से स्थायी जययोग है तथा पूर्वाह्ण 9.28 से ही सर्वार्थ-सिद्धियोग है. यानी इस दिन पंचांगीय स्थिति मनोकामनाएं पूरी करनेवाली हैं.
पूजन
शिवरात्रि को प्रातः नित्यकर्म से निवृत्त, स्नानादि से शुद्ध हो, सूर्यार्घ्य देकर दैनिक पूजा कर लें. इसके बाद व्रत-संकल्प कर पूजन निर्विघ्न समाप्ति हेतु भगवान से प्रार्थना करें-
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येsहं महाफलम्।
निर्विघ्नम् अस्तु मे चात्र त्वत् प्रसादात् जगत्पते।।
इसके बाद कायिक, वाचिक एवं मानसिक शुद्धि अपनाएं. यथाविधि शिवाराधन करें. आप आनुष्ठानिक रूप में मन्त्रजप, स्तोत्रपाठ व शिवपुराण आदि का अध्ययन कर सकते हैं. सूर्यास्त के पूर्व सूर्य को अर्घ्य समर्पित कर अब शिवपूजन में विशेष लग जाएं. सूर्यास्त के बाद के चारों प्रहरों (तीन घंटों का एक मान) में चार बार पूजा का विधान है- ‘प्रहरे प्रहरे स्नानं पूजां चैव विशेषतः’. इस पूजन के अंतर्गत स्नानीय द्रव्यों में पहले पहर में दूध से, दूसरे में दही से, तीसरे में घी से तथा चौथे में शहद से शिव को स्नान कराने का विशिष्ट शास्त्र-निर्देश है :
दुग्धेन प्रथमं स्नानं दध्ना चैव द्वितीयके।
तृतीये च तथाज्येन चतुर्थे मधुना तथा।।
पहले पहर में ‘हौं ईशानाय नमः’ मंत्र के साथ दूध से, दूसरे पहर में ‘हौं अघोराय नमः’ मंत्र के साथ दही से, तीसरे पहर में ‘हौं वामदेवाय नमः’ मंत्र के साथ घी से तथा चौथे पहर में ‘हौं सद्योजाताय नमः’ मंत्र के साथ शहद से अभिषेक करें. चूंकि इस दिन सभी शिवलिंगों में शिवजी का निवास माना गया है, इसलिए सुविधानुसार कहीं भी; कुछ नहीं तो मिट्टी का लिंग बनाकर भी रातभर पूजाराधना में तत्पर रहें. अगले दिन प्रातः सूर्यार्घ्य दे शिवपूजन कर व्रतफल शिवार्पण कर पारण करें.
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