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जलवायु परिवर्तन : भारत पर जलवायु परिवर्तन का ग्रहण, प्राकृतिक आपदाओं की भयावह विभीषिका

Updated at : 09 Jan 2020 3:56 AM (IST)
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जलवायु परिवर्तन : भारत पर जलवायु परिवर्तन का ग्रहण, प्राकृतिक आपदाओं की भयावह विभीषिका

जलवायु परिवर्तन के भयानक परिणाम दिखने लगे हैं. भारत उन देशों में हैं, जो इससे सर्वाधिक प्रभावित है. अभी देश के अनेक हिस्से कई दिनों से शीतलहर से त्रस्त हैं. वर्ष 2019 के सभी चार मौसमों में धरातल का वार्षिक मध्य तापमान सामान्य से ऊपर रहा तथा विभिन्न आपदाओं से देश को जूझना पड़ा. जान-माल […]

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जलवायु परिवर्तन के भयानक परिणाम दिखने लगे हैं. भारत उन देशों में हैं, जो इससे सर्वाधिक प्रभावित है. अभी देश के अनेक हिस्से कई दिनों से शीतलहर से त्रस्त हैं. वर्ष 2019 के सभी चार मौसमों में धरातल का वार्षिक मध्य तापमान सामान्य से ऊपर रहा तथा विभिन्न आपदाओं से देश को जूझना पड़ा. जान-माल का भारी नुकसान तो हो ही रहा है, इसके इतर बीमारियों, भू-क्षरण और जंगल व पानी के संकट का भी सामना करना पड़ रहा है. समस्या की गंभीरता पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है.
दिसंबर में रिकॉर्ड नीचे रहा उत्तर भारत का तापमान
दिसंबर और जनवरी के महीने में तापमान का गिरना, बारिश और घना कोहरा उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत के लिए कोई नयी बात नहीं है.
लेकिन बीते दिसंबर उत्तर भारत में समय से पहले ही सर्दी ने लोगों को ठिठुरने पर मजबूर कर दिया. आमतौर पर दिसंबर के उत्तरार्ध और जनवरी के पूर्वार्ध में उत्तर और उत्तर पश्चिम भारत के कई हिस्सों में प्रतिवर्ष दिन का तापमान दो से चार डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता है.
पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिसंबर के महीने में अधिकतम तापमान 16 से 18 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच जाता है. जबकि दिल्ली और उत्तरी राजस्थान में दिसंबर का अधिकतम तापमान आमतौर पर 20 से 22 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाता है. लेकिन इस दिसंबर की सर्दी में, इस क्षेत्र के अनेक हिस्सों में कई दिनों तक अधिकतम तापमान सामान्य से 10 डिग्री नीचे रिकॉर्ड किया गया. दिल्ली में बीते दिसंबर का अधिकतम औसत तापमान 20 डिग्री से नीचे (19.8 डिग्री) ही बना रहा. बीते 118 वर्षों में महज चार बार ही दिसंबर के तापमान में इतनी गिरावट देखी गयी है.
भारतीय मौसम विज्ञान का कहना है कि 1901 के बाद बीता दिसंबर दिल्ली का दूसरा सबसे सर्द दिसंबर रहा. वर्ष 1901 के दिसंबर में औसत अधिकतम तापमान 17.3 डिग्री रहा था. बीते दिसंबर दिल्ली एनसीआर में 14 से लेकर 27 तारीख तक लगातार चौदह दिन लोगों को बेहद सर्द दिन का सामना करना पड़ा. दिसंबर 1997 के बाद दिल्ली में लगातर ठंड पड़ने की यह सबसे लंबी अवधि रही.
अनिश्चित मौसमी बदलाव के कारक
जलवायु परिवर्तन
बीते वर्ष दिसंबर में पड़ी असामान्य ठंड का एक कारण जलवायु परिवर्तन भी माना जा सकता है. ऐसा मानने का कारण मौसम के मिजाज में बारंबार बदलाव का आना है. जलवायु परिवर्तन के कारण दुनियाभर में लोग अत्यधिक गर्मी और शीतलहर झेलने को विवश हैं. मौसम में आया यह बदलाव पिछले कुछ वर्षों में गंभीर रूप ले चुका है और भविष्य में इसमें और वृद्धि का अनुमान है.
अत्यधिक बारिश और सूखे की बारंबारता भी इसी का परिणाम माना जा रहा है. बीते वर्ष अगस्त व सितंबर में भारत में अत्यधिक बारिश हुई. सितंबर में इतनी ज्यादा बारिश इस सदी में कभी नहीं हुई थी. इस बात पर वैज्ञानिक भी सहमत हैं कि जलवायु में आये बदलाव के कारण ही मौसम का बदलाव अत्यधिक अनिश्चित हो चला है, जिससे इसका अनुमान लगा पाना मुश्किल होता जा रहा है.
पश्चिमी विक्षोभ
पिछले वर्ष दिसंबर में समूचे उत्तर भारत को कंपाने वाली ठंड का एक कारण लगातार उत्पन्न होनेवाली मध्यम से लेकर तीव्र पश्चिमी विक्षोभ भी है.
इतना ही नहीं, उत्तर-पश्चिमी भारत में बहने वाली उत्तर-पश्चिमी हवा का बहुत ज्यादा निचले स्तर पर रहना भी ठंड को और बढ़ा गया. नतीजा, दिसंबर की सामान्य सर्दी में कई गुना वृद्धि हो गयी. दिसंबर में हर बार पश्चिमी विक्षोभ के गुजरने के बाद धुंध, कोहरा और बारिश से दो-चार होना पड़ा, जिससे उत्तर भारत में सर्दी बहुत ज्यादा बढ़ गयी.
लो क्लाउड
दिसंबर में लगातार कई दिनों तक पड़ी अत्यधिक ठंड काे बढ़ाने में निम्न स्ट्रेटस बादलों का भी हाथ रहा जो पाकिस्तान से लेकर भारत व बांग्लादेश तक, विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर छाये रहे. ये बादल 500 किमी से लेकर 800 किली उत्तर-दक्षिण तक फैले हुए हैं, जिससे पूरा उत्तर भारत प्रभावित हो रहा है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत के गंगा नदी क्षेत्र वाले मैदानी इलाकों में इस तरह के बादलों का बनना अनूठी बात है और इस तरह के बादल 1997 के बाद से ही इन इलाकों में देखे जा रहे हैं.
चूंकि ये बादल सतह से 300 से 400 मीटर की ऊंचाई पर बनते हैं, इस कारण बड़ी मात्रा में सूर्य की किरणें धरती पर पहुंचने से पहले ही रोक ली जाती हैं, नतीजा सर्द दिन के रूप में सामने आता है. भारत मौसम विज्ञान विभाग का यह भी मानना है कि दिन का सर्द बने रहना अधिक खतरनाक साबित हो सकता है.
जलवायु परिवर्तन से 1659 जानें गयीं 2019 में
सबसे अधिक मौतें तेज बारिश और बाढ़ से जुड़ी घटनाओं में हुई थीं. इनमें 850 से अधिक लोग मारे गये थे.
सरकार के मौसम विभाग द्वारा जारी 2019 की जलवायु रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक मौतें बिहार में हुईं, जहां 650 लोगों की जान गयी. इनमें से 306 लोग तेज बारिश से आयी बाढ़ में मारे गये.
गर्मी में पारा बहुत अधिक चढ़ने से 350 लोग मारे गये. इनमें से 292 लोग केवल बिहार में मौत के शिकार हुए. इसके
बाद महाराष्ट्र में 44 और झारखंड में 13 जानें गयीं.
अनेक राज्यों में शीतलहर से लोग मरे हैं. दिसंबर में अकेले उत्तर प्रदेश में 28 मौतें हुई थीं. वर्ष 1980 से 2018 के बीच 38 में से 23 सालों में लू की तुलना में अधिक मौतें शीतलहर से हुई हैं. साल 1992 में यह आंकड़ा 41 गुना अधिक था. लेकिन 2010 के बाद (2011 को छोड़कर) से अधिक लोग लू से मरे हैं. साल 2011 में लू से करीब 60 गुना ज्यादा लोग शीतलहर का शिकार हुए है. साल 2018 के बाद फिर अधिक मौतें शीतलहर से होने लगी हैं.बर्फबारी और बर्फीले पहाड़ों के टूटने से 2019 में जम्मू-कश्मीर में 33 और लेह में 18 जानें गयी थीं.
भारत में अबतक के सबसे गर्म 15 सालों में 11 सिर्फ बीते 15 सालों (2005-2019) में रिकॉर्ड हुए हैं. साल 2019 तो लगातार 22वां साल ऐसा है, जब सामान्य से अधिक तापमान रहा. बीता दशक (2010-19) सबसे अधिक गर्म दशक भी रहा है.बीते साल भारतीय समुद्र में आठ चक्रवात भी आये, जबकि सामान्य स्थिति में इनकी संख्या पांच होती है. वैश्विक स्तर पर 2019 दूसरा या तीसरा सबसे गर्म साल हो सकता है. धरती का तापमान पिछले साल के पहले 10 महीनों में औद्योगिक दौर से पूर्व के स्तर से 1.1 डिग्री सेल्सियस रहा था.
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